
ज्ञान, समृद्धि और शक्ति का प्रतीक कहे जाने वाला यूरोप इन दिनों हिंसा और उपद्रव का केंद्र बना हुआ है। शिक्षा बजट में कटौती, बढ़ती महंगाई, आवास संकट और सरकारी नीतियों के खिलाफ यूरोप के विभिन्न देश हिंसक आंदोलन की चपेट में हैं। फ्रांस, इटली, बेल्जियम, स्पेन, अल्बानिया और पुर्तगाल के बड़े शहरों में आगजनी, लूटपाट और पुलिस के साथ झड़पें देखने को मिल रही हैं।जर्मन, ग्रीस और आयरलैंड में भी विभिन्न मुद्दों को लेकर छात्र और नागरिक आंदोलन कर रहे हैं। यूरोप से आ रही हिंसा, आगजनी और लूटपाट की भयावह तस्वीरों ने साल 2010 में हुए मध्यपूर्व और उत्तरी अफ्रीका के विरोध प्रदर्शनों और क्रांतियों (अरब स्प्रिंग) की याद ताजा कर दी है। दुनिया के अन्य किसी भी महाद्वीप की तुलना में यूरोप आर्थिक विकास, लिविंग स्टैंडर्ड और नगरीकरण के मामले में आगे है। वैश्विक धन और समृद्धि का सबसे बड़ा सूचक होने के बावजूद जिस तरह से यूरोप की जनता महंगाई, जीवनयापन के बढ़ते खर्च, महंगे घर, शिक्षा एवं सार्वजनिक सेवाओं की बदहाली के खिलाफ सड़कों पर उतरी है, उसे देखकर दुनिया के अन्य देशों की सरकारों की बैचेनी बढऩा स्वाभाविक है।
फ्रांस की स्थिति सबसे ज्यादा खराब है। स्कूलों की बदहाली के विरोध में शुरू हुआ आंदोलन सरकार विरोधी आंदोलन में बदल गया। 'ब्लॉक एवरीथिंग' आंदोलन के चलते पेरिस, मार्सिले और ल्योन में जबर्दस्त आगजनी और लूटपाट हुई है। छात्र संगठनों, ट्रेड यूनियनों और आम नागरिकों के नेतृत्व में हो रहे प्रदर्शनों ने सरकारों के सामने कानून-व्यवस्था और आर्थिक संतुलन बनाए रखने की कड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। मीडिया रिपोट्र्स के अनुसार फ्रांस सरकार ऐसा कानून लाने की तैयारी कर रही है, जिसके तहत प्रदर्शनों के दौरान सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों पर भारी वित्तीय जुर्माना लगाया जा सकता है। लेकिन सवाल यह है कि लोगों की नाराजगी की वजह क्या है? हालांकि भिन्न-भिन्न देशों में विरोध के कारण भिन्न-भिन्न है, लेकिन सबके मूल में आर्थिक और सामाजिक मोर्चे पर सरकारों की कथित विफलताएं छिपी हुई हैं।
आंदोलन ने फ्रांस को वैचारिक रूप से विभाजित किया है। फ्रांस में अगले साल राष्ट्रपति चुनाव होने हैं। संसद में राष्ट्रपति मैक्रो का मध्यमार्गी गठबंधन अल्पमत में है। दूसरी ओर विपक्ष भी इन प्रदर्शनों को चुनावी हथियार के रूप में देख रहा है। वामपंथी और दक्षिणपंथी दल लगातार सरकार पर विफल रहने का आरोप लगा रहे हैं। कुल मिलाकर कहें तो सरकार का भविष्य फिलहाल सख्त सुरक्षात्मक कार्रवाई, कड़े बजटीय सुधारों और राजनीतिक गतिरोध के बीच संतुलन बनाने पर टिका हुआ है।इसमें कोई दो राय नहीं कि फ्रांस में सुलग रही विरोध प्रदर्शनों की यह आग पूरे यूरोप के लिए एक हाई अलर्ट है। फ्रांस ही नहीं कमोबेश यूरोप के अधिकांश हिस्सों से आने वाली तस्वीरों ने वहां की संवेदनशील व उदारवादी सरकारों की अदूरदर्शिता व मूढ़ता दोनों की पुष्टि कर दी है। ऐसे में यदि वहां की सरकारों ने देश की कथित सर्वोतम शासन पद्धति की सीमाओं का पुन: आकंलन नहीं किया तो शासन का यह तरीका यूरोप के समृद्ध देशों को बड़ा नुकसान पहुंचाएगा।
डॉ. एन.के. सोमानी,डॉ. सुरेश यादव,(अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार)