ट्रंप अब जॉर्ज बुश युग के 'सत्ता परिवर्तन' वाले जाल में फंस गए हैं। ट्रंप इस दलदल से निकलने की छटपटाहट में हैं, लेकिन नेतन्याहू के अडिय़ल रुख और संपूर्ण सत्ता परिवर्तन की जिद ने उनकी सुरक्षित वापसी के विकल्पों को सीमित कर दिया है।
हर्ष काबरा - वरिष्ठ पत्रकार एवं विश्लेषक,
पहली बार 1996 में इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से मिलने के बाद अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने झल्लाकर अपने सलाहकारों से पूछा था- आखिर यहां 'सुपरपावर' है कौन? यह 'बीबी' खुद को समझता क्या है? उनके बाद आए सभी अमरीकी राष्ट्रपति 'बीबी' की सख्त, बेबाक मांगों से परेशान रहे, लेकिन डॉनल्ड ट्रंप के अपेक्षाकृत अधिक असंयत दूसरे कार्यकाल ने पूरी तस्वीर ही बदल दी है। युद्धों से किनारा करने के आश्वासन पर चुने गए ट्रंप ने नेतन्याहू के साथ मिलकर समूचे विश्व को तबाही भरे ऐसे युद्ध में झोंक दिया है जिसका न तो स्पष्ट लक्ष्य है और न ही बाहर निकलने की रणनीति। महीनों की मशक्कत के बाद नेतन्याहू ने ट्रंप को उस युद्ध के लिए राजी कर ही लिया जिसे वे अपना '40 साल पुराना सपना' बताते हैं। उन्होंने एक साल में ट्रंप से सात बार मुलाकात की, जो किसी भी विदेशी नेता के लिए एक रिकॉर्ड है। ट्रंप के इजरायल-ईरान युद्ध में कूदने को नेतन्याहू की अब तक की सबसे बड़ी जीत के तौर पर देखा जा रहा है। पर ट्रंप के लिए यह एक खतरनाक जुए से कम नहीं है।
नए साल के जश्न के दौरान जब नेतन्याहू ने ईरानी मिसाइल ठिकानों पर हमले की अनुमति मांगी, तब ट्रंप हिचकिचा रहे थे। लेकिन 23 फरवरी के उस फोन कॉल ने सब बदल दिया जिसमें अली खामेनेई के ठिकाने की सटीक जानकारी इजरायली खुफिया तंत्र के हाथ लगने की बात ट्रंप को बताई गई। हमला मार्च के अंत में होना था, पर जिनेवा से परमाणु वार्ता में गतिरोध की खबर आते ही नेतन्याहू की जिद में ट्रंप ने 26 फरवरी को हमले का आदेश दे डाला। आज दोनों नेता इस संघर्ष के सूत्रधार तो हैं परंतु बराबर के साझेदार नहीं। वाशिंगटन जहां सैन्य समाधान के जरिए स्थिरता चाहता है, वहीं तेल अवीव के लिए यह अराजकता एक सुनहरा अवसर है। इजरायल का लक्ष्य है ईरानी शासन को सीरिया की भांति पूरी तरह पंगु बनाना, जबकि अमरीका को डर है कि इससे अस्थिर होने वाले तेल बाजार उसकी आर्थिक महत्वाकांक्षा को कमजोर न बना दे।
रणनीतिक स्तर पर ट्रंप और नेतन्याहू के बीच तालमेल की कमी नजर आती है। ट्रंप 'सर्जिकल स्ट्राइक' के जरिए केवल समर्पण चाहते थे, इसलिए जब इजरायल ने ईरानी तेल रिफाइनरियों को निशाना बनाया, तो रिपब्लिकन खेमे में भी हड़कंप मच गया। ट्रंप को तेल की कीमतों में उछाल कतई पसंद नहीं है, क्योंकि यह सीधे घरेलू राजनीति को प्रभावित करता है। ट्रंप इस युद्ध के मूल उद्देश्य को लेकर शुरू से ही अस्पष्ट रहे हैं। उन्होंने युद्ध समाप्ति का फैसला भी नेतन्याहू के साथ मिलकर लेने की बात कही है। यह पहली बार है जब किसी अमरीकी राष्ट्रपति ने किसी विदेशी नेता को अपनी सैन्य कार्रवाई पर इतना अधिकार दिया हो। इस युद्ध को लेकर अमरीकी जनता का रुख भी हिचकिचाहट भरा रहा है।
1941 में द्वितीय विश्वयुद्ध में शामिल होने तथा 2001 में अफगानिस्तान में युद्ध छेडऩे को अमरीका में 90 प्रतिशत से अधिक जनसमर्थन इसलिए प्राप्त था क्योंकि पर्ल हार्बर और 11 सिंतबर 2001 के आतंकी हमलों के जरिये देश पर सीधा प्रहार हुआ था। यहां तक कि पनामा, कोसोवो और लीबिया जैसे छोटे सैन्य हस्तक्षेपों को भी ईरान संघर्ष से कहीं अधिक जनसमर्थन प्राप्त था। कोरिया और इराक जैसे बड़े युद्धों में तो राष्ट्रपतियों द्वारा जनता के समक्ष युद्ध के स्पष्ट कारण रखे जाने पर तीन-चौथाई से अधिक अमरीकियों ने सरकार का साथ दिया था। इस बार ट्रंप की ईरान नीति को लेकर केवल 39 प्रतिशत स्वीकृति दर्ज की गई है क्योंकि इस युद्ध का संदर्भ शायद ही किसी के पल्ले पड़ा है।
धर्म और राष्ट्रवाद के जटिल ताने-बाने से बुनी ईरान की वास्तविकता को समझना वाशिंगटन के लिए एक चुनौती है। तेल की बढ़ती कीमतों और महंगाई के खतरे ने ट्रंप की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। अमरीकी करदाताओं के अब तक करीब 6.5 अरब डॉलर स्वाहा हो चुके हैं। अमरीकी सेना को सीधे युद्ध के मैदान में भी उतरना पड़ सकता है, इस आशंका से अमरीका में बेचैनी बढ़ रही है। प्रशासन ने इस युद्ध से पहले कांग्रेस को भरोसे में नहीं लिया, लेकिन अब वित्तीय संसाधनों के लिए सांसदों के सामने हाथ फैलाने की नौबत आ गई है। शुरू में न कोई ठोस गठबंधन बनाया गया, न सहयोगी देशों से सलाह ली गई, लेकिन अब जब ईरान की जवाबी कार्रवाई उम्मीद से कहीं अधिक तीखी साबित हो रही है और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर जोखिम मंडरा रहा है, तब उन्हीं देशों से हॉर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए सहयोग की गुहार लगाई जा रही है।
नेतन्याहू इस पूरे घटनाक्रम के असली विजेता बनकर उभरे हैं। भ्रष्टाचार के आरोपों और हमास के खिलाफ पुरानी विफलताओं को पीछे छोड़ते हुए 93 प्रतिशत यहूदी इजरायली और 74 प्रतिशत आम जनता आज उनके साथ खड़ी है। इजरायलियों के लिए रोज गूंजते सायरन और हवाई हमले उस साझा नियति का हिस्सा हैं, जिसे वे ईरान के परमाणु खतरे को जड़ से मिटाने के लिए जरूरी मानते हैं। ट्रंप अब जॉर्ज बुश युग के 'सत्ता परिवर्तन' वाले जाल में फंस गए हैं। इजरायल इसे अपने अस्तित्व की लड़ाई मानकर एकजुट है, लेकिन अमरीकी जनता इसमें एक और अंतहीन युद्ध देख रही है। ट्रंप इस दलदल से निकलने की छटपटाहट में हैं, लेकिन नेतन्याहू के अडिय़ल रुख और संपूर्ण सत्ता परिवर्तन की जिद ने उनकी सुरक्षित वापसी के विकल्पों को सीमित कर दिया है। ट्रंप एक ऐसे गहराते संकट में धंसे जा रहे हैं जहां से निकलना उनकी राजनीतिक प्रतिष्ठा और आर्थिक स्थिरता दोनों के लिए बड़ी चुनौती होगी।