
बलवंत राज मेहता, वरिष्ठ पत्रकार
भारत की पहचान केवल उसकी जनसंख्या, अर्थव्यवस्था या लोकतांत्रिक व्यवस्था से नहीं बनती। उसकी असली ताकत उसकी विविधता में निहित है। देश का लगभग हर क्षेत्र किसी न किसी विशिष्ट उत्पाद, कला, शिल्प, कृषि उपज या पारंपरिक ज्ञान के लिए जाना जाता है। यही विशिष्टता उसे दुनिया के अन्य देशों से अलग बनाती है। लेकिन विडंबना यह है कि जिन उत्पादों में वैश्विक पहचान और आर्थिक समृद्धि का आधार बनने की क्षमता है, उनमें से अनेक आज भी उचित संरक्षण और पहचान की प्रतीक्षा कर रहे हैं। भौगोलिक संकेतक अर्थात जीआइ टैग के मामले में यही सबसे बड़ी चुनौती है।
जीआइ टैग परंपरा और कौशल की आधिकारिक पहचान
जीआइ टैग किसी उत्पाद को केवल कानूनी संरक्षण नहीं देता, बल्कि यह प्रमाणित करता है कि उसकी गुणवत्ता, प्रतिष्ठा और विशिष्टता उसके भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ी हुई है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह उस मिट्टी, उस जलवायु, उस परंपरा और उस कौशल की आधिकारिक पहचान है, जिसने उस उत्पाद को जन्म दिया है। भारत में पहला जीआइ टैग 2004 में दार्जिलिंग चाय को मिला था। इसके बाद बनारसी साड़ी, कश्मीर पश्मीना, मैसूर सिल्क, नागपुर संतरा, कांचीपुरम सिल्क और सैकड़ों अन्य उत्पादों को यह सम्मान प्राप्त हुआ।
बीते दो दशकों में जीआइ टैग की उपयोगिता लगातार बढ़ी है। मई 2026 तक भारत में 724 जीआइ उत्पाद पंजीकृत हो चुके हैं। साथ ही, देश में जीआइ पंजीकरण के लिए 1800 से अधिक आवेदन दाखिल हो चुके हैं। यह बताता है कि उत्पादों की पहचान को लेकर रुचि बढ़ रही है, लेकिन यह वृद्धि देश की वास्तविक संभावनाओं की तुलना में अभी भी बहुत कम है। राज्यों के आंकड़े भी दिलचस्प कहानी कहते हैं। उत्तर प्रदेश लगभग 77 जीआइ उत्पादों के साथ देश में अग्रणी बन चुका है। बनारसी साड़ी, लखनऊ चिकनकारी, जरी-जरदोजी, आगरा पेठा और काला नमक चावल जैसे उत्पादों ने राज्य को अलग पहचान दी है। तमिलनाडु 65 से अधिक जीआइ उत्पादों के साथ दूसरे स्थान पर है, जबकि कर्नाटक और महाराष्ट्र भी 40 से अधिक जीआइ उत्पादों के साथ मजबूत उपस्थिति रखते हैं। इन राज्यों ने जीआइ को केवल सांस्कृतिक संरक्षण का विषय नहीं माना, बल्कि उसे आर्थिक विकास और निर्यात वृद्धि की रणनीति का हिस्सा बनाया।
कई राज्य नहीं उठा पा रहे संभावनाओं का लाभ
इसके विपरीत कई राज्य अभी भी अपनी संभावनाओं का पूरा लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। अनेक ऐसे क्षेत्र हैं जहां पारंपरिक उत्पाद मौजूद हैं, लेकिन उन्हें जीआइ टैग दिलाने की दिशा में कोई संगठित प्रयास नहीं दिखाई देता। यही कारण है कि विशिष्टता होने के बावजूद वे उत्पाद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान से वंचित रह जाते हैं। राजस्थान का उदाहरण भी विचारणीय है। यह राज्य अपनी लोक कलाओं, वस्त्रों, हस्तशिल्प और पारंपरिक खाद्य उत्पादों के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। कोटा डोरिया, बीकानेरी भुजिया, जयपुर ब्लू पॉटरी, मोलेला टेराकोटा, कठपुतली कला, जोधपुरी बांधेज और उस्ता कला जैसी परंपराएं इसकी सांस्कृतिक समृद्धि का प्रमाण हैं। इसके बावजूद राज्य में जीआइ टैग प्राप्त उत्पादों की संख्या लगभग 20 के आसपास है। यह संख्या राजस्थान की वास्तविक सांस्कृतिक संपदा की तुलना में बहुत कम प्रतीत होती है।
जीआइ टैग का महत्त्व केवल पहचान तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध रोजगार, आय और निर्यात से भी है। दार्जिलिंग चाय को जीआइ टैग मिलने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में उसकी ब्रांड वैल्यू बढ़ी। कश्मीर पश्मीना और भागलपुरी सिल्क को नकली उत्पादों से राहत मिली। बनारसी साड़ी के कारीगरों को अपनी कला का बेहतर मूल्य मिलने लगा। जब किसी उत्पाद को कानूनी संरक्षण मिलता है तो उसकी नकल पर रोक लगती है और वास्तविक उत्पादकों को आर्थिक लाभ प्राप्त होता है।
पर्यटन के क्षेत्र में भी जीआइ टैग महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। आज पर्यटक केवल ऐतिहासिक स्मारक देखने नहीं जाते, बल्कि स्थानीय संस्कृति और विशिष्ट उत्पादों का अनुभव भी करना चाहते हैं। बनारस की साडिय़ां, कांचीपुरम का रेशम, मैसूर की सिल्क और दार्जिलिंग की चाय अपने-अपने क्षेत्रों के पर्यटन आकर्षण का हिस्सा बन चुकी हैं। इस दृष्टि से जीआइ टैग स्थानीय अर्थव्यवस्था को कई स्तरों पर मजबूती प्रदान करता है।
बड़ा सवाल, क्यों है जागरूकता की कमी?
फिर भी सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि जागरूकता की कमी क्यों बनी हुई है? अधिकांश कारीगरों, किसान समूहों और सहकारी संस्थाओं को यह जानकारी नहीं होती कि उनका उत्पाद जीआइ टैग के योग्य हो सकता है। आवेदन प्रक्रिया, दस्तावेजीकरण और कानूनी औपचारिकताएं भी उन्हें जटिल लगती हैं। कई बार सरकारी विभागों, विश्वविद्यालयों और उत्पादक संगठनों के बीच समन्वय का अभाव भी प्रक्रिया को धीमा कर देता है। केंद्र सरकार ने वर्ष 2030 तक 10,000 जीआइ आवेदन प्राप्त करने का महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। यह लक्ष्य तभी पूरा होगा जब जिला स्तर पर संभावित उत्पादों की पहचान, उनका दस्तावेजीकरण और उत्पादक समूहों का मार्गदर्शन सुनिश्चित किया जाएगा। वोकल फॉर लोकल और वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट जैसे अभियानों को भी जीआइ टैग से जोडऩे की आवश्यकता है। सवाल केवल यह नहीं है कि हमारे पास कितने जीआइ उत्पाद हैं। असली सवाल यह है कि हमारे पास मौजूद हजारों विशिष्ट उत्पादों में से कितनों को हम वैश्विक पहचान दिलाने के लिए तैयार हैं। दुनिया स्थानीय पहचान को अपनाने के लिए तैयार है, अंतरराष्ट्रीय बाजार विशिष्ट उत्पादों की तलाश में है और भारत के पास सांस्कृतिक संपदा का अथाह भंडार है। अवसर हमारे सामने खड़ा है। यदि कुछ कमी है तो वह है जागरूकता, दूरदृष्टि और पहल की। यदि यह कमी दूर नहीं हुई तो आने वाले वर्षों में हम अपनी अनेक पारंपरिक धरोहरों को केवल इतिहास की पुस्तकों में खोजते रह जाएंगे। जीआइ टैग की कहानी दरअसल उत्पादों की नहीं, पहचान की कहानी है। और पहचान वही बचा पाता है जो समय रहते उसकी कीमत समझ लेता है।