
AlgorithmicAccountability
डॉ. डी.पी. शर्मा
यूनाइटेड नेशंस से जुड़े डिजिटल डिप्लोमेट
यूं तो आज न्यायिक प्रणाली में तकनीकी हस्तक्षेप अब कोई दूर की कल्पना नहीं रह गया है। दुनिया भर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) और बड़े एआइ भाषा मॉडल (एलएलएम) का उपयोग न्यायालयीन प्रक्रियाओं को सुगम बनाने के लिए किया जा रहा है। हालांकि, जहां यह तकनीक न्यायिक प्रशासन एवं प्रबंधन में क्रांति लाने की क्षमता रखती है, वहीं इसके साथ जुड़ी चुनौतियों और प्रतिकूलताएं भी उतनी ही गंभीर हैं, जिन पर हमें गहन चिंतन करने की आवश्यकता है।
कानूनी निर्णय की अंतिम शक्ति न्यायाधीशों के पास
भारत और अन्य देशों में एआइ का उपयोग मुख्यत: ई-गवर्नेंस, ई प्रशासन, ई न्यायिक प्रबंधन एवं प्रशासनिक सहायता के रूप में किया जा रहा है। इसमें मुख्यत: न्यायिक फैसलों की सर्च, न्यायिक उदाहरण एवं दलीलों व कानूनी दस्तावेजों का सारांश तैयार करना शामिल हैं। कुछ प्रयोगों में, एलएलएम का उपयोग जटिल कानूनी भाषा को सरल बनाने या पिछले न्यायिक निर्णयों के आधार पर संभावित परिणामों का पूर्वानुमान लगाने के लिए किया जाता है । हालांकि, यह स्पष्ट करना महत्त्वपूर्ण है कि अधिकांश न्यायिक प्रणालियों में, विशेष रूप से भारत में, संवैधानिक व्याख्या एवं कानूनी निर्णय की अंतिम शक्ति न्यायाधीशों के पास ही रहती है।
एआइ सहायक बने विकल्प नहीं
अभी हाल में भारत के सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय इसलिए महत्त्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि इस निर्णय में न्यायिक दलीलों एवं उदाहरण में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के अत्यधिक उपयोग के ऊपर प्रश्नवाचक चिह्न लगाया गया है। मानवीय न्यायिक निर्णय में न्यायाधीशों या वकीलों द्वारा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उदाहरण उनकी व्याख्या मैं अगर कुछ गलत हुआ तो उसकी जिम्मेदारी कोई भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का सिस्टम नहीं ले सकता और न उसे दंडित किया जा सकता है। यहां पर यह स्पष्ट होना चाहिए कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एवं एलएलएम के सिस्टम जैसे चैटजीपीटी एवं जैमिनाई के एल्गोरिथम कैसे काम करते हैं? यह जनरल पब्लिक की जानकारी से परे है। उनकी ऑडिट प्रक्रिया पर भी अभी कोई स्पष्ट अंतरराष्ट्रीय दिशा निर्देश नहीं है कि ये सिस्टम निर्णय कैसे लेते हैं, पुराने केसों को कैसे ढूंढते है, उदाहरण कैसे बनाते हैं और सारांश कैसे तैयार करते हैं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि एआइ को विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि एक सहायक उपकरण के रूप में उपयोग में लिया जाना चाहिए यानी एआइ से तैयार किए हुए ही डॉक्यूमेंट में मानवीय हस्तक्षेप बहुत जरूरी। उदाहरण के लिए, कुछ अदालतों में एआइ का उपयोग बेल आवेदनों की प्रारंभिक जांच के लिए किया जा रहा है, ताकि लंबित मामलों की संख्या कम की जा सके, लेकिन अंतिम आदेश मानवीय विवेक पर ही निर्भर करता है।
एआइ के आउटपुट को बिना सत्यापित किए स्वीकार न करें
सनद रहे कि सारे एआइ सिस्टम ‘ब्लैक बॉक्स’ की तरह काम करते हैं जिनमें पारदर्शिता बहुत कम होती है। एलएलएम की कार्यप्रणाली तो अत्यंत जटिल होती है। जब कोई मॉडल कोई सुझाव देता है, तो यह जानना कठिन होता है कि वह किस डेटा या तर्क के आधार पर उस निष्कर्ष तक पहुंचा है। इसके साथ-साथ उसकी एक्यूरेसी भी आपके द्वारा पूछे गए प्रश्न की सटीकता एवं तर्क पर भी निर्भर करती है जिसे ‘प्रॉम्ट’ कहते हैं। न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता सर्वोपरि है। यदि एआइ का उपयोग निर्णयन में किया जाता है, तो ‘एल्गोरिदमिक पारदर्शिता’ सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती होगी, क्योंकि पारंपरिक न्यायिक प्रक्रिया के विपरीत, एआइ के तर्क को डिबग करना या उस पर सवाल उठाना संभव नहीं है।
एआइ मॉडल उस डेटा से ट्रेन होते हैं या सीखते हैं जिस पर उन्हें प्रशिक्षित किया जाता है। यदि ऐतिहासिक न्यायिक डेटा में सामाजिक या आर्थिक पूर्वाग्रह मौजूद हैं, तो एआइ उन्हें और मजबूत कर सकता है। इससे हाशिए पर खड़े समुदायों जैसे अफ्रीकी या एशियाई लोगों के विरुद्ध भेदभावपूर्ण परिणाम आ सकते हैं, जो न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत है ।
बड़े भाषा मॉडल जैसे चैटजीपीटी एवं जैमिनाई कभी-कभी ऐसे उत्तर देते हैं जो तथ्यात्मक रूप से गलत होते है, जिसे ‘हैलुसिनेशन’ कहा जाता है। कानूनी क्षेत्र में, जहां हर शब्द का महत्त्व होता है, ऐसी त्रुटियां विनाशकारी हो सकती हैं। न्यायिक अधिकारियों को सतर्क रहना होगा कि वे एआइ के आउटपुट को बिना सत्यापित किए स्वीकार न करें ।
गलत निर्णय पर जवाबदेह कौन?
सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यदि कोई एआइ मॉडल की सहायता प्राप्त कर गलत निर्णय लेता है, तो उसके लिए कौन जवाबदेह होगा? क्या यह जिम्मेदारी न्यायाधीश की है, डवलपर की है, या सरकार अथवा वकील की? इस संबंध में स्पष्ट नीति और नियामक ढांचे का अभाव आज भी एक बहुत बड़ी चुनौती बना हुआ है क्योंकि दुनिया के पास अभी तक इसके कोई कानूनी फ्रेमवर्क नहीं हैं। यद्यपि एआइ का उपयोग न्यायपालिका में दक्षता बढ़ा सकता है और देशव्यापी मामलों के बोझ को कम करने में सहायक हो सकता है, लेकिन यह न्यायाधीशों का विकल्प नहीं हो सकता। भारत जैसे विशाल और विविध देश में, जहां कानूनी प्रणाली सामाजिक जटिलताओं से ग्रस्त है, एआइ को लागू करते समय अत्यधिक सतर्कता बरतनी होगी।
हमें सबसे पहले, एक मजबूत नियामक ढांचे का निर्माण करना होगा जो एआई के उपयोग के दायरे और सीमाओं को स्पष्ट कर सके। दूसरे, पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए ओपन-सोर्स या व्याख्या योग्य एआइ मॉडल्स को प्राथमिकता देनी होगी ताकि उनके निर्णय लेने की क्षमता और प्रक्रिया को पारदर्शिता के साथ जाना जा सके तीसरे, न्यायाधीशों और कानूनी पेशेवरों को तकनीकी रूप से सक्षम बनाना आवश्यक है, ताकि वे एआई के आउटपुट की आलोचनात्मक समीक्षा कर सकें।
एआइ एक उपकरण, न्याय की आत्मा तर्क और विवेक में
तकनीक का लक्ष्य न्याय को अधिक सुलभ बनाना होना चाहिए, न कि उसे यंत्रीकृत कर और अधिक कॉम्पलेक्स बनाना। एआइ केवल एक उपकरण है, न्याय की आत्मा मानवीय करुणा, तर्क और विवेक में निहित है, जिसे कोई मशीन कभी प्रतिस्थापित नहीं कर सकती। इसलिए, इस यात्रा में हमें बुद्धिमत्ता के साथ-साथ सावधानी भी बरतनी होगी।
हालांकि, यह स्पष्ट करना महत्त्वपूर्ण है कि अधिकांश न्यायिक प्रणालियों में, विशेष रूप से भारत में, निर्णयन की अंतिम शक्ति न्यायाधीशों के विवेक पर निर्भर करती है और यह विवेक किसी तंत्र या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा हैक नहीं किया जाना चाहिए।
Updated on:
16 Jul 2026 07:22 pm
Published on:
16 Jul 2026 06:43 pm
