चुनाव-दर-चुनाव बदहाली का सबक यही है कि नरेंद्र मोदी सरकार और भाजपा के विरुद्ध मोर्चेबंदी के साथ ही कांग्रेस आलाकमान अपनी पार्टी की भी कुछ सुध ले। पलायन करने वालों में पुराने निष्ठावान कांग्रेसियों से लेकर टीम राहुल का सदस्य बताए गए युवाओं तक शामिल हैं।
राज कुमार सिंह - वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक
चुनाव प्रत्यक्ष हों या अप्रत्यक्ष, राजग के चक्रव्यूह में विपक्ष फंसकर रह गया हे। उच्च सदन का चुनाव संख्या गणित का खेल है। मतदान भी ईवीएम के बजाय बैलेट पेपर से होता है। फिर भी हाल के राज्यसभा चुनाव में सत्तापक्ष के चक्रव्यूह की काट विपक्ष नहीं खोज पाया। राज्यसभा की 37 सीटों के लिए हुए हालिया चुनाव में 26 उम्मीदवार तो निर्विरोध निर्वाचित हो गए थे, लेकिन 11 सीटों के लिए हुए चुनाव में विपक्ष की दरारें साफ उजागर हो गईं। विपक्ष अपने विधायकों को एकजुट रखने में भी नाकाम रहा, जबकि सत्तापक्ष अपने संख्या बल से ज्यादा उम्मीदवार जिता ले गया। राजग 37 में से 22 सीटें जीतने में सफल हो गया। भाजपा ही अकेले 12 सीटें जीत गई।
परिणामस्वरूप संसद के उच्च सदन में भी अब राजग को स्पष्ट बहुमत मिल गया है। 245 सदस्यीय राज्यसभा में राजग के सदस्यों की संख्या बढ़कर अब 141 हो गई है। हालांकि भाजपा के निर्वाचित राज्यसभा सांसदों की संख्या 98 से बढ़कर 101 ही हुई है, पर अन्नाद्रमुक के पांच, जनता दल यू और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के चार-चार, यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी, तेलुगु देशम् और शिवसेना के दो-दो तथा राष्ट्रीय लोकदल, असम गण परिषद, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया, राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मोर्चा, जनता दल सेक्यूलर, मिजो नेशनल फ्रंट, एनपीपी और पीएमके के एक-एक सांसद भी राजग का हिस्सा हैं। तीन निर्दलीय सांसदों का समर्थन भी भाजपा के साथ है। 12 मनोनीत सांसदों में से पांच बाकायदा भाजपा में शामिल हो चुके हैं, जबकि जरूरत पडऩे पर बाकी सात भी सरकार का समर्थन कर सकते हैं। राज्यसभा में अपने दम पर बहुमत हासिल करने के लिए भाजपा को 16 सदस्य और चाहिए। इसके लिए उसे 2028 तक इंतजार करना पड़ सकता है, लेकिन राजग को बहुमत मिल जाने के बाद सरकार को विधेयक पारित करवाने के लिए अन्य छोटे-छोटे दलों की मान-मनौव्वल नहीं करनी पड़ेगी।
संसद के उच्च सदन में विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' की सीटें घटकर 74 रह गई हैं। कांग्रेस के 28 सांसद हैँ, जबकि तृणमूल कांग्रेस के 13। वैसे राजग और 'इंडिया' गठबंधन से इतर दलों के भी राज्यसभा में 28 सांसद हैं, जिनमें सबसे ज्यादा 10 आम आदमी पार्टी के हैं, जबकि जगन मोहन रेड्डी की वाइएसआरसीपी के सात। कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल का दर्जा और इसीलिए नेता प्रतिपक्ष का पद तो बचाने में सफल रही है, लेकिन राज्य-दर-राज्य विधायकों का उससे मोहभंग उजागर हो गया है। लोकसभा और विधानसभा चुनावों की स्वतंत्रता एवं निष्पक्षता पर संदेह जताने वाले विपक्ष के विधायकों ने जिस तरह हरियाणा से लेकर बिहार और ओडिशा तक क्रॉसवोटिंग या मतदान से दूर रहकर राजग की राह आसान बनाई है, उससे विपक्ष, खासकर कांग्रेस के नेतृत्व पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। कांग्रेस पर अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति करने के आरोप भाजपा अरसे से लगा रही है। तेलंगाना और कर्नाटक विधानसभा चुनाव परिणामों से अल्पसंख्यक मतदाताओं के कांग्रेस की ओर लौटने के संकेत भी मिले, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से हाल के राज्यसभा चुनाव में अल्पसंख्यक विधायकों ने भी उसे दगा दिया। इनमें से दो तो हरियाणा के हैं, जहां सत्ता में वापसी की कांग्रेस की उम्मीदें अभी तक जिंदा हैं। हरियाणा में दो कांग्रेसी मुस्लिम विधायकों- मोहम्मद इलियास और मोहम्मद इजरायल ने बाकायदा भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार के पक्ष में क्रॉसवोटिंग की। ओडिशा में भी कांग्रेस विधायक सोफिया फिरदौस ने भाजपा समर्थित उम्मीदवार दिलीप रे को वोट दिया।
कांग्रेस ही नहीं, मुस्लिम-यादव समीकरण के सहारे बिहार में दशकों से राजनीति कर रहे लालू यादव के राष्ट्रीय जनता दल के मुस्लिम विधायक फैजल रहमान ने भी भाजपा उम्मीदवार शिवेम राम की अप्रत्यक्ष मदद की। अपनी मां की बीमारी के कारण वह वोट डालने ही नहीं आए। हालांकि हरियाणा में कांग्रेस अपने उम्मीदवार कर्मवीर बौद्ध को जितवाने में सफल रही, लेकिन उसके नौ विधायकों द्वारा पालाबदल भविष्य की राजनीति के लिए गंभीर संकट का संकेत है। इनमें से चार विधायकों के वोट रद्द हो गए, जबकि पांच विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की। गुटबाजी के लिए बदनाम हरियाणा कांग्रेस में हैरानी की बात यह है कि पार्टी को दगा देने वाले विधायक अलग-अलग गुटों के हैं, जबकि कर्मवीर बौद्ध को राज्यसभा उम्मीदवार बनाने का फैसला खुद राहुल गांधी का था। वैसे पिछले कई बार से राज्यसभा चुनाव में अपने विधायक ही कांग्रेस की फजीहत करवाते रहे हैं।
हरियाणा के अलावा बिहार और ओडिशा में भी कांग्रेस विधायकों ने पार्टी को धता बताई। बिहार में तीन कांग्रेस विधायकों- सुरेंद्र कुशवाहा, मनोज विश्वास और मनोहर प्रसाद सिंह ने मतदान में भाग न लेकर भाजपा के संख्या बल से अतिरिक्त पांचवें उम्मीदवार शिवेम राम की जीत में अप्रत्यक्ष योगदान दिया। ओडिशा में फिरदौस के अलावा रमेश जेना और दशरथ गमांगो ने भी कांग्रेस से दगा किया। दरअसल हाल के राज्यसभा चुनावों से कांग्रेस समेत विपक्षी दलों का कमजोर राजनीतिक प्रबंधन भी बेनकाब हो गया है। चुनाव-दर-चुनाव बदहाली का सबक यही है कि नरेंद्र मोदी सरकार और भाजपा के विरुद्ध मोर्चेबंदी के साथ ही कांग्रेस आलाकमान अपनी पार्टी की भी कुछ सुध ले। पलायन करने वालों में पुराने निष्ठावान कांग्रेसियों से लेकर टीम राहुल का सदस्य बताए गए युवाओं तक शामिल हैं। कांग्रेस के पास सत्ता के आदी अपने नेताओं को देने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है, लेकिन अन्य विपक्षी दलों में ऐसी भगदड़ नजर नहीं आती। कांग्रेस आलाकमान को बेहतर संवाद और संपर्क के जरिये कारणों को समझ कर अपने संगठन का मनोबल बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए।