
बच्चा विद्यालय में प्रवेश लेने के दिन से सीखना प्रारंभ नहीं करता। वह अपने गर्भधारण के क्षण से ही सीखना प्रारंभ कर देता है। उसके बाद औपचारिक शिक्षा के लिए विद्यालय में प्रवेश से पूर्व पहला विद्यालय उसका घर और उसके प्रथम शिक्षक उसके अभिभावक होते हैं। शिक्षक दिवस के अवसर पर हम शिक्षकों के योगदान को सम्मानपूर्वक स्मरण करते हैं।शिक्षक नि:सन्देह राष्ट्र निर्माण की आधारशिला है। लेकिन इस अवसर पर शिक्षा से जुड़े एक ऐसे शिक्षक को याद करना और उसकी भूमिका पर भी विचार करना आवश्यक है, जिसके हाथ में बच्चे की शिक्षा सबसे पहले आती है। बच्चा बोलना, सुनना, प्रश्न, व्यवहार, प्रेम, सहयोग करना और आसपास की दुनिया को समझना सबसे पहले परिवार से सीखता है। विद्यालय आने तक उसके व्यक्तित्व की अनेक बुनियादी प्रवृतियां आकार लेने लगती हैं, जो उसके जीवन पर्यन्त काम आती है। यह एक विडंबना है कि हमारी औपचारिक शिक्षा व्यवस्था में इस प्रथम शिक्षक/ अभिभावक की भूमिका अभी तक स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं हो सकी है।
शिक्षा को एक त्रिकोण के रूप में देखा जा सकता है जिसके तीन कोण- विद्यार्थी, शिक्षक एवं अभिभावक हैं। इसमें विद्यार्थी शिक्षा का केंद्र है। गुणवत्तापूर्ण एवं उद्देश्यपरख शिक्षा के लिए इस कोण का संतुलित होना अत्यंत आवश्यक है। वर्तमान में ये तीनों कोण समन्वित रूप से कार्य नहीं कर पा रहे हैं। विद्यालयों में शिक्षक पढ़ाता है, विद्यार्थी सीखता है और अभिभावक की भूमिका सामान्यत: उपेक्षित और उदासीन रहती है। अभी उसकी भूमिका केवल विद्यार्थी को विद्यालय भेजना और कभी-कभार अभिभावक-शिक्षक बैठक (पीटीएम) में उपस्थित होना है। विद्यार्थी की शिक्षा को सबसे बड़ा हितधारक होने के बावजूद भी अभिभावक की भूमिका सहभागी की न होकर दर्शक की रह जाती है। विशेष रूप से सरकारी विद्यालयों में अभिभावक-शिक्षक बैठक (पीटीएम) की अवधारणा तो है लेकिन अनेक स्थानों पर उसकी नियमितता, उद्देश्यपरखता और वास्तविक शैक्षिक उपयोगिता सुनिश्चित करना अब भी चुनौती है। केवल बैठक आयोजित कर देने को अभिभावक सहभागिता नहीं माना जा सकता। आवश्यकता यह है कि अभिभावक बच्चे की अधिगम, शिक्षण का सक्रिय भागीदार बने।
दुनिया तेजी से बदल रही है। एआइ, रोबोटिक्स, कोडिंग, मशीन लर्निंग और नई वैज्ञानिक खोजें बच्चों के भविष्य को पुर्नपरिभाषित कर रही हैं। अब शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी याद करवाना नहीं, बल्कि बच्चों में पहल की प्रवृति विकसित करना है। विडंबना यह है कि हमारे सरकारी विद्यालयों के विद्यार्थी वर्तमान अधिगत स्तर पर ही नहीं है। आज बच्चे को क्रिटिकल थिंकिंग, क्रिएटिविटी, कम्युनिकेशन, कॉलेब्रेशन, क्यूरोसिटी, प्रॉब्लम सोल्विंग और इमोशनल इंटेलिजेंस जैसी क्षमताओं की आवश्यकता है। भरत में, विशेषकर सरकारी विद्यालयों के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर हमें बच्चों में बुनियादी भाषा और गणितीय दक्षताएं मजबूत करनी है, दूसरी ओर उन्हें तेजी से बदलती तकनीकी दुनिया के लिए भी तैयार करना है। अत: नामांकन और विद्यालयों में उपस्थिति से आगे बढक़र सीखने के परिणाम और दक्षता पर ध्यान देना आवश्यक हो गया है।
औपचारिक ढांचे में ऐसा व्यावहारिक और संस्थागत परिवर्तन करना आवश्यक है, जिससे अभिभावक की भूमिका और उनका उत्तरदायित्व बढ़े। वे ये जान सकें कि उनका बच्चा क्या सीख रहा है? उसमें कौनसी दक्षताएं विकसित हो रही हैं? अभिभावक अपने बच्चे की शिक्षा में क्या योगदान दे सकते हैं? बच्चे में जिज्ञासा की गतिविधि कैसे बढ़ाई जा सकती है? वर्तमान मॉडल अभिभावक-शिक्षक बैठक (पीटीएम) को अभिभावक-शिक्षक सहभागिता (पीटीटी) में बदलने की आवश्यकता है। ऐसा एक प्रयोग राजस्थान में झुंझुनूं जिले की पहल के आधार पर वर्ष 2019 में पूरे प्रदेश में लागू किया गया था। विद्यालय अपनी नियमित गतिविधि बाल सभा को गांव की चौपाल, सार्वजनिक स्थल या समुदाय के बीच प्रस्तुत करता था। इससे विद्यालय स्वयं समाज के बीच पहुंच जाता था। बिना किसी वित्तीय भार के इस पहल का मनोवैज्ञानिक प्रभाव यह था कि अभिभावक और गांव के लोग अपने बच्चे को सीखते हुए देखने लग गए थे। सामुदायिक बाल सभा की यह एक मात्र गतिविधि ऐसी है जो शिक्षा के त्रिकोण को न केवल संतुलित करती है बल्कि सभी हितधारकों की भूमिका और उत्तरदायित्व को पुर्नपरिभाषित भी करती है। यह गतिविधि परोक्ष रूप से प्रथम शिक्षक को प्रशिक्षित भी करती है। यह प्रशिक्षण अभिभावक को शिक्षा की निरंतरता-विद्यालय में जो पढ़ाया गया है उसे व्यवहार में लाने के लिए, संस्कार और नैतिक शिक्षा देने के लिए, सामाजिक और भावनात्मक विकास करने के लिए और शिक्षकों के सहयोग के लिए प्रशिक्षित करता है। प्रथम शिक्षक के इस प्रशिक्षण के लिए वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता नहीं है बल्कि राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है।
अभिभावक की भूमिका को बढ़ाने की दृष्टि से राजस्थान के शिक्षा विभाग में विद्यार्थियों की स्कूल डायरी में अभिनव प्रयोग किया है। इस डायरी के माध्यम से पहली बार अभिभावक को अपने बच्चे के दैनिक क्रियाकलापों को देखने का अवसर मिला है। इस डायरी में विद्यार्थी को भी अपने आप को व्यक्त करने का अवसर भी दिया गया है। इस डायरी का प्रभावी क्रियान्वयन प्रशासनिक व्यवस्था के लिए एक प्रश्न है।
इसी प्रकार पाठ्यपुस्तकों की संरचना पर भी पुर्नविचार किया जा सकता है। अभी पुस्तक केवल शिक्षक को एक निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुरूप विद्यार्थियों को सूचनापरक ज्ञान देने का माध्यम है। इस पाठ्यपुस्तक में अभिभावक और स्वयं विद्यार्थी को अपनी विचारशीलता और नवाचार करने के लिए स्थान नहीं है। हर अध्याय के अंत में अभिभावक और विद्यार्थी के लिए कुछ व्यावहारिक और नवाचारपरक गतिविधियां जोड़ी जा सकती हैं। यह गतिविधियां माता-पिता को पाठ्यक्रम पूरा करने की अपेक्षा से नहीं, बल्कि अपने बच्चे में जिज्ञासा जगाना, संवाद करना, अनुभव देना, प्रश्न पूछना, सुनना, प्रोत्साहित करना और मूल्यों को व्यवहार में उतारने की भूमिका के लिए अभिभावक को तैयार करना है।
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का संकट केवल अधिक संसाधन, बेहतर भवन, डिजिटल बोर्ड से हल नहीं होगा इसका समाधान शिक्षा के त्रिकोण को संतुलित करने में है। जब शिक्षक विद्यालय में बच्चे का हाथ पकड़े और माता-पिता घर में उसकी जिज्ञासा को जीवित रखें, जब पाठ्यपुस्तक घर तक पहुंचे और घर का अनुभव कक्षा तक आए। शिक्षक और अभिभावक विद्यार्थी को सूचनाओं का संग्रहालय बनाने के बजाय दोनों मिलकर एकरूपता से विद्यार्थी में जीवन पर्यन्त लगातार सीखने की क्षमता विकसित कर दे तो शिक्षा का उद्देश्य पूर्ण हो जाता है। यह संतुलित त्रिकोण शिक्षा की नीव बने तभी विद्यालय एक संस्था से आगे बढक़र राष्ट्र निर्माता की भूमिका में आ सकता है।