
(लेखक सामाजिक नीति विशेषज्ञ हैं और जैन दर्शन में गहरी रुचि रखते हैं)
पर्युषण पर्व जैन धर्म का वार्षिक पर्व है, जो उपवास, ध्यान, आत्म-अवलोकन, आत्म-चेतना, जागृति, स्वाध्याय, सभी प्राणियों के प्रति करुणा और क्षमा के माध्यम से स्वयं को उन्नत करने का अवसर है। दिगंबर परंपरा में इसे 'दशलक्षण पर्व' के रूप में मनाया जाता है। इसका प्रारंभ भाद्रव शुक्ल पंचमी को होता है और समृद्धि का दिन चतुर्दशी है। वहीं श्वेतांबर जैन परंपरा में भाद्रव शुक्ल पंचमी का दिन समाधि का दिन होता है, जिसे पूर्ण त्याग, उपवास, स्वाध्याय और संयम के साथ संवत्सरी के रूप में मनाया जाता है।जैन धर्म श्रमण परंपरा है। भगवान महावीर ने एक सामाजिक-आध्यात्मिक, अहिंसक सुधार आंदोलन का नेतृत्व किया। उन्होंने वनस्पतियों और जीवों की सभी प्रजातियों को एक समग्र नैतिक समुदाय का अभिन्न अंग माना। उन्होंने जैव विविधता को मानवीय लालच से बचाने के लिए जीवदया, पशुपालन और अपरिग्रह की अवधारणा पर बल दिया।
जैन धर्मावलंबियों के जीवन में पर्युषण पर्व का विशेष महत्व है। पर्युषण पर्व के दौरान सभी जैन श्रद्धालु तन और मन को आध्यात्मिक बनाने का प्रयास करते हैं। इस पर्व के दौरान प्रत्येक जैन अपनी आत्मा को शुद्ध और उन्नत करने का प्रयास करता है। इसके लिए एक श्रावक को निम्नलिखित पांच कर्तव्य अवश्य करने चाहिए- अमारी प्रवर्तन (पूर्ण अहिंसा), सधार्मिक भक्ति (समान धर्मावलंबियों की सहायता करना), क्षमापना (क्षमा याचना), अ_म तप (उपवास) और चैत्य परिपाटी (स्थानीय जैन मंदिरों में जाना तथा जैन साधु-साध्वी के प्रवचन सुनना)। पर्युषण के दौरान एक सकारात्मक वातावरण का निर्माण होता है, जो हमारे जीवन को शुद्ध करता है। इस दृष्टि से यह पर्व आध्यात्मिकता के साथ-साथ जीवन के उत्थान का भी पर्व माना जाता है। पर्युषण महापर्व अंतरात्मा की आराधना का एक माध्यम है। यह आत्म-शुद्धि और आत्म-ज्ञान का पर्व है। वस्तुत: पर्युषण महापर्व एक ऐसा प्रभात है जो हमें निद्रा से जागृति की ओर ले जाता है। यह हमें अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाता है।
तप, जप और स्वाध्याय करते हुए हम अपनी आंतरिक शक्ति को खोज सकते हैं और सीख सकते हैं कि वास्तविक सुख अहिंसा, क्षमा, करुणा, मैत्री, अपरिग्रह में निहित है। पर्युषण एक ऐसा पर्व है, जिसमें व्यक्ति आत्मलीन होकर आत्मसाक्षात्कार करता है और अलौकिक, आध्यात्मिक आनंद के शिखर पर आरोहण कर मोक्ष प्राप्ति के लक्ष्य की ओर बढ़ता है। इसलिए जैन धर्म की त्याग प्रधान संस्कृति में पर्युषण पर्व का अपना अनूठा एवं विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व है। पर्युषण पर्व का समापन क्षमा दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसलिए इसको एक-दूसरे को करीब लाने के पर्व भी माना जाता है। इस दिन सभी लोग अपने मन की उलझी हुई ग्रंथियों को खोलते हैं, अपने भीतर के क्रोध और द्वेष की गांठों को भूलते हुए, क्षमा के माध्यम से अतीत की गलतियों को दूर करते हैं व जीवन को पवित्र बनाने का प्रयास करते है।
गीता में भी कहा गया है- 'आत्मौपम्येन सर्वत्र, समे पश्यति योर्जुन' श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा, 'हे अर्जुन! मनुष्यों को समान समझो।' भगवान महावीर ने कहा, 'मित्ति मै सव्व भूएसु, वेरंमज्झना केणै।' मेरी सभी प्राणियों से मित्रता है, किसी से शत्रुता नहीं है। मानवीय एकता, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, मैत्री, शोषण रहित समाजवाद, नैतिक मूल्यों की स्थापना, अहिंसक जीवन शैली, आत्मा की उपासना आदि पर्युषण महापर्व के मुख्य आधार हैं। आज के इस परिप्रेक्ष्य में जहां कई देशों के बीच में युद्ध चल रहा है, मानवीय मूल्यों का पतन हो रहा है, परस्पर प्रतिस्पर्धा मैत्री एवं करुणा पर हावी हो रही है, इन परिस्थितियों में पयुर्षण का महत्व ओर अधिक बढ़ गया है। आज पूरे विश्व को अहिंसा और मैत्री की आवश्यकता है। पर्युषण पर्व अहिंसा, सहिष्णुता और स्वैच्छिक सादगी पर जोर देता है। इसकी शिक्षाएं न केवल आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करती हैं, बल्कि 21वीं सदी में नैतिक नीति-निर्माण, विवाद समाधान और ग्रहीय प्रबंधन के लिए व्यावहारिक ढांचे भी प्रदान करती हैं।
पर्युषण पर्व एक प्रेरणा है, मार्ग है, मार्गदर्शन है और अहिंसक जीवनशैली का अभ्यास है। यह पर्व व्यक्ति, समाज, राष्ट्रों को प्रेरित कर सकता है।