ओपिनियन

पाठक पीठ : पाठकों के सराहनीय पत्र First Week Nov 2026

अखबार सिर्फ खबरों का आईना नहीं होता, वह समाज की सोच, सरोकारों और संवाद का मंच भी होता है। और इस मंच को सबसे अधिक जीवंत बनाते हैं आप यानी हमारे पाठक। आपकी राय, आपके सवाल, आपकी असहमति और आपके सुझाव ही लोकतांत्रिक संवाद की असली ताकत हैं। तो आइए लिखिए, सवाल उठाइए, सुझाव दीजिए और स्वस्थ संवाद को आगे बढ़ाइए। आप अपने पत्र हमें ई-मेल edit@epatrika.com पर भेज सकते हैं।
4 min read
• •
Updated: 3 Nov 2026, 6:59 PM IST
Feature image

डिजिटल युग और हमारी जीवनशैली
​आज का युग डिजिटल युग है, जहां तकनीक ने हमारे जीवन को बेहद आसान बना दिया है। सुबह की शुरुआत से लेकर रात की नींद तक, मोबाइल और इंटरनेट हमारे जीवन का अहम हिस्सा बन चुके हैं। इसने हमें दुनिया के किसी भी कोने से जोड़े रखा है, लेकिन इसके साथ ही इसने हमारी जीवनशैली को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। ​स्क्रीन टाइम बढ़ने से शारीरिक श्रम कम हुआ है, जिससे स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ रही हैं। बच्चों और युवाओं में आउटडोर खेलों के प्रति रुचि कम हो रही है। आवश्यकता इस बात की है कि हम तकनीक का उपयोग एक सीमा तक करें और अपने वास्तविक रिश्तों व स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें।
- सी.पी.गोदारा ओसियां

दवाओं की कीमत और गुणवत्ता पर नियंत्रण जरूरी
भारत दुनिया की फार्मेसी कहलाता है, लेकिन देश में दवाओं की महंगाई, नकली और घटिया गुणवत्ता वाली औषधियां गंभीर चिंता का विषय हैं। जिस दवा से मरीज जीवन बचाने की उम्मीद करता है, वही कई बार उसके लिए खतरा बन जाती है। राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) ने कैंसर की 137 दवाओं पर ट्रेड मार्जिन अधिकतम 30 प्रतिशत तय किया है। इससे इनकी कीमतों में 20 से 70 प्रतिशत तक कमी आने की उम्मीद है। यह स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन ऐसी व्यवस्था दूसरी जरूरी दवाओं पर भी लागू होनी चाहिए। दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए निर्माण इकाइयों और मेडिकल स्टोरों का नियमित निरीक्षण तथा संदिग्ध दवाओं की प्रयोगशालाओं में जांच जरूरी है। नकली दवाओं के कारोबारियों पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। जन औषधि केंद्रों का विस्तार भी ग्रामीण क्षेत्रों तक किया जाए। साथ ही दवाओं की कीमत, गुणवत्ता और निर्माण संबंधी जानकारी सार्वजनिक हो। आखिर दवा सामान्य वस्तु नहीं, जीवन बचाने का माध्यम है। मरीजों की मजबूरी को मुनाफाखोरी का जरिया बनने से रोकना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए।
- सुभाष बुड़ावन वाला, रतलाम

एआइ पर निर्भरता मौलिक सोच को प्रभावित करेगी
एआइ के बढ़ते उपयोग से बच्चों की स्वयं सोचने, समझने और तर्क करने की क्षमता प्रभावित होने की आशंका है। तैयार जवाबों पर निर्भरता उनकी मौलिक सोच और बौद्धिक विकास को कुंद करेगी। तकनीक बच्चों की प्रतिभा निखार सकता हैं, बल्कि उन्हें सोचने की प्रक्रिया से दूर करेगी। शिक्षा में एआइ की स्वतंत्र चिंतन करने की आवश्यकता है।
- गोपाल अरोड़ा, जोधपुर


नैतिक मूल्यों में गिरावट चिंताजनक
राजनीति में नैतिक मूल्यों और आपसी सम्मान में गिरावट चिंताजनक है। एक समय था, जब सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेता राजनीतिक मतभेदों के बावजूद एक-दूसरे का सम्मान करते थे। आज स्थिति यह है कि पक्ष और विपक्ष एक-दूसरे के लिए अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करते हैं। राजनीतिक विरोध अब व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप तक पहुंच गया है। लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है, लेकिन उसका आधार शालीनता और मर्यादा होनी चाहिए। सत्ता में बने रहने की राजनीति में नैतिक मूल्यों की अनदेखी लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए उचित नहीं है। सरकार और विपक्ष, दोनों को राजनीतिक संवाद में शिष्टाचार और आपसी सम्मान बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए।
- कैलाश चन्द्र मोदी, सादुलपुर

चार्जिंग बंद करने का सराहनीय फैसला
रेलवे का रात 11 से सुबह 5 बजे तक ट्रेनों में चार्जिंग बंद रखने का फैसला सुरक्षा के लिए बहुत जरूरी है। सस्ते चार्जर से पूरी रात चार्ज करने पर फोन/पावर बैंक गर्म होकर फटने और आग लगने का खतरा रहता है। साथ ही चार्जिंग की लाइट से सह-यात्रियों की नींद खराब होती है और फोन चोरी की घटनाएं भी बढ़ती हैं। यही नियम बसों में भी लागू हो। सभी बसों में रात 11 से सुबह 5 बजे तक चार्जिंग बंद करने का निर्देश देना चाहिए। यात्रियों से अपील है, अपना फोन दिन में ही फुल चार्ज कर यात्रा करें।
- राजेश पी. कारिया, अकोला

पारदर्शिता के साथ काम करें
ग्रामीण क्षेत्रों से चुने गए जनप्रतिनिधि चुनाव से पहले जारी किए गए घोषणा पत्र को धरातल पर शत प्रतिशत लागू करें। ग्रामीण क्षेत्रों में पारदर्शिता से कार्य करे ताकि गांवों का धरातल मजबूत हो। हर गली और घर को मजबूती मिले। गांवों के प्रत्येक परिवार को मूलभूत सुविधाएं जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी, मकान, भूमि, रोजगार समय पर उपलब्ध हो। जनप्रतिनिधियों को ग्रामीण क्षेत्रों में दिनोंदिन बढ़ने वाले विभिन्न प्रकार के नशे को दूर करने के लिए जागरूकता कार्यक्रम चलाना चाहिए, जिससे युवा पीढ़ी को बचाया जा सके। महिला शिक्षा को अधिक से अधिक बढावा देने के लिए जनप्रतिनिधियों को समय समय कार्य करना चाहिए तथा गांवों की प्रतिभाओं को आगे बढ़ने के अवसर उपलब्ध करवाने चाहिए।
- कुमार जितेंद्र जीत, मोकलसर (बालोतरा)

ग्रीन दिवाली मनानी चाहिए
दीपावली प्रकाश और खुशियों का त्योहार है, लेकिन आधुनिक समय में पटाखों के अत्यधिक प्रयोग ने इसे वायु और ध्वनि प्रदूषण का मुख्य कारण बना दिया है। पटाखों को जलाने से सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और भारी धातुएं हवा में मिल जाती हैं, जिससे हवा की गुणवत्ता अत्यंत खतरनाक स्तर पर पहुंच जाती है। इससे सांस के मरीजों, बच्चों और बुजुर्गों को भारी परेशानी होती है। इसके साथ ही, पटाखों से उत्पन्न तेज आवाज (ध्वनि प्रदूषण) इंसानों के कानों और मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाती है, जिससे पालतू जानवर और पक्षी भी बुरी तरह डर जाते हैं। हमें पर्यावरण और स्वास्थ्य की रक्षा के लिए इस बार 'हरित दिवाली' मनानी चाहिए और पटाखों का त्याग करना चाहिए।
- विकास स्वर्णकार, कोटकासिम

जलभराव व लवणता से बर्बाद हो रही खेती
गंगानगर में सतही लवणता का मुख्य कारण भूजल का अत्यधिक लवण-युक्त होना है । गंगानगर, नागौर-गंगानगर बेसिन का भाग है, जहां गहराई में लवण और पोटाश के भंडार मौजूद हैं और इनका संबंध पाकिस्तान की 'सॉल्ट रेंज' (लवण की शृंखला) से जोड़ा जाता है, जो लवण के भंडारों के लिए काफी प्रसिद्ध है। संभवतः, लगभग पांच से नौ हजार वर्ष पूर्व ( होलोसीन कल्प) में अत्यधिक वर्षा के कारण भूजल गंगानगर क्षेत्र में लवण की परतों तक पहुंच गया और कालांतर मे लवण-युक्त भूजल का कारण बना । समय- समय पर अधिक वर्षा में यह लवण - युक्त भूजल ऊपर की ओर उठकर सम्भवत सतह तक आते है । नलकूपों से सिचाई से भी मिट्टी मे लवण की मात्रा बढ़ जाती है । इस कल्प मे बहुत अधिक वर्षा के कारण सिंधु- सरस्वती सभ्यता अपने शिखर पर थी।
- वेद प्रकाश लाल, जयपुर

Updated on:
3 Nov 2026, 6:59 PM IST
Published on: