
education
शिक्षा क्षेत्र की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की रिपोट्र्स में एक बात समान है कि प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक शैक्षिक संस्थाओं में नामांकन अनुपात बढ़ा है। इस दिशा में कुछ उत्साहजनक आंकड़े सामने आए हैं। यूनेस्को की जीइएम रिपोर्ट 2026 के अनुसार वर्ष 2000-2024 के बीच दुनिया में स्कूली शिक्षा में बच्चों की भागीदारी काफी बढ़ी है। लगभग 327 मिलियन अतिरिक्त बच्चे प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा में आए। समग्र शिक्षा अभियान और राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान जैसे कार्यक्रमों की सफलता उत्साहजनक है। हालांकि नामांकन दर में सुधार की अभी बहुत गुंजाइश है। इन आंकड़ों में एक तरफ उत्साह तो है, लेकिन दूसरी तरफ एक बड़ी चिंता भी छिपी हुई है।
उत्साह इस बात का है कि बच्चे समुदाय से निकलकर विद्यालय की तरफ जाने लगे हैं। साथ ही एक गहरी चिंता यह है कि पढऩे के नाम पर समुदाय से निकले बच्चे दुबारा समुदाय में वापस क्यों नहीं आते हैं अर्थात जो बच्चे समुदाय को समझने के लिए विद्यालय ले जाए गए वे कभी लौट के अपने समुदाय से नहीं जुड़ पाए। शैक्षिक संस्थाओं का नामांकन अनुपात बढ़ाते हुए बच्चे शिक्षा पूरी करने के बाद पलायन अनुपात को भी बढ़ा रहे हैं। बाहरी प्रवासन और ब्रेन ड्रेन के बढ़ते आंकड़े समुदाय को कुशल युवाओं से खाली करते जा रहे हैं।
ऐसे में सामुदायिक लोक संस्कृति न केवल संकट में है, बल्कि विकास की मुख्य धारा और समुदाय के बीच एक बड़ा फासला बनता जा रहा है। शैक्षिक प्रावधानों की बात की जाए तो समुदाय के प्रति जिम्मेदारी और जवाबदेही को पाठ्यचर्या के मुख्य उद्देश्यों में शामिल किया गया है। इक्कीसवीं सदी में शिक्षा के अंतरराष्ट्रीय आयोग के रिपोर्ट 'लर्निंग : द ट्रेजर विद इन' के अनुसार शिक्षा के प्रमुख चार सिद्धांतों में दो महत्वपूर्ण सिद्धांत है 'होने के लिए सीखना' और 'साथ रहने के लिए सीखना'- इन दोनों सिद्धांतों का मुख्य थीम यह है कि शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति की स्वतंत्रता एवं उसके सम्पूर्ण विकास और सामाजिक/ सामुदायिक हितों के लिए व्यक्तिगत जिम्मेदारियों को समझने पर जोर देना, दूसरों के दृष्टिकोण को समझना, समाज को समझना, समाज के रीति रिवाज, नियम कायदों को समझना- नई शिक्षा नीति 2020 भी संवैधानिक और मानवीय मूल्यों के विकास की पैरोकारी करती है।स्पष्ट है सामुदायिक हितों के लिए व्यक्तिगत जिम्मेदारी को संवैधानिक और मानवीय मूल्यों के अनुरूप सहेजने और समझाने का कार्य शैक्षिक नियामक संस्थाओं की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होनी चाहिए। शिक्षा को केवल समुदाय से विद्यालय तक का सफर नहीं, बल्कि विद्यालय से पुन: समुदाय वापसी तक की यात्रा तक जाना होगा। बच्चों को उनके समुदाय में कुछ ऐसी वापसी की जरूरत है कि उन्हें समुदाय में खुशी मिले और उनके परिवार, समाज और राज्य को उनकी पढ़ाई का लाभ।
धनंजय राय, (स्वतंत्र लेखक एवं स्तंभकार)
Updated on:
3 Nov 2026, 5:46 PM IST
Published on:
3 Nov 2026, 5:46 PM IST
Copyright © 2026 Patrika Group. All Rights Reserved.