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संपादकीय: बच्चों की बौद्धिक क्षमता कुंद होने का खतरा

सबसे बड़ा खतरा यह है कि जब बच्चे एआइ से सीखकर बड़े होंगे तो इसे कैसे नियंत्रित किया जाए, यह सिखाने वाला भी उन्हें कोई नहीं होगा।
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भारत

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Harish Parashar

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Updated: 3 Nov 2026, 5:07 PM IST

child's brain

child's brain

पढ़ाई-लिखाई में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) का बढ़ता इस्तेमाल बच्चों की सोचने-समझने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है। यह चिंता समय-समय पर विभिन्न स्तरों पर जताई जाती रही है। अमरीकी सीनेटर्स ने गूगल के सीईओ को पत्र लिखकर जो सवाल उठाए हैं वे सिर्फ अमरीका से जुड़ी चिंता ही नहीं है। भारत समेत तमाम दूसरे देशों में भी इस पर बहस होने लगी है कि क्या पढ़ाई को आसान बनाने के नाम पर स्कूलों में बच्चों को एआइ के इस्तेमाल की अनुमति दी जानी चाहिए? जाहिर है जब बच्चे रचनात्मक तरीके से सोचना भी बंद कर दें और उनका दिमाग गणित के बुनियादी सवालों को भी बिना एआइ की मदद के हल नहीं कर पाए तो इससे अंदाज लगाया जा सकता है कि बच्चों के बौद्धिक स्तर में वृद्धि का स्तर कैसा रह पाएगा?

केवल एआइ टूल के माध्यम से सवालों के जवाब तलाशना ही काफी नहीं है, बल्कि संबंधित जवाब तक पहुंचने की प्रक्रिया दिमाग के जरिये प्रभावी हो सकती है। गणित का सवाल हल करते समय फार्मूले की समझ जरूरी होती है। यहां तक कि किसी विषय पर लिखते समय भी विचारों के क्रम को ध्यान में रखना जरूरी होता है। वैसे भी सीखने की सतत प्रकिया से ही दिमाग का विकास होता है। यदि शिक्षण में एआइ हावी होने लगे तो दिमाग का विकास भी स्वाभाविक रूप से वैसा ही होगा। अहम तथ्य यह भी है कि एआइ शिक्षक का विकल्प नहीं हो सकता। शिक्षक केवल जानकारी नहीं देता, बल्कि बच्चों के व्यवहार, भावनाओं और जिज्ञासा को समझता है। जबकि एआइ के साथ एक बड़ी चिंता यह है कि छात्र हर सवाल का जवाब खुद खोजने के बजाय तकनीक पर निर्भर होने लगता है। एआइ से गलत जानकारी पर भरोसा करने का खतरा तो अपनी जगह है ही। किसी सवाल का जवाब तलाशने के लिए बच्चे एआइ की मदद तो ले सकते हैं, लेकिन एआइ ने जो जवाब दिया वह सही है या गलत इसे बच्चा शायद ही समझ पाएगा। क्योंकि शिक्षण के इस तरीके ने उसकी बौद्धिक क्षमता पर पहले ही ग्रहण लगा दिया होगा। एआइ बच्चों के हजार सवालों का जवाब दे सकता है, लेकिन उन्हें सपने देखना नहीं सिखा सकता। वह जानकारी दे सकता है, लेकिन समझ नहीं। एआइ रास्ता दिखा सकता है लेकिन मंजिल तो बच्चों को खुद ही चुननी होगी। सबसे बड़ा खतरा यह है कि जब बच्चे एआइ से सीखकर बड़े होंगे तो इसे कैसे नियंत्रित किया जाए, यह सिखाने वाला भी उन्हें कोई नहीं होगा।एआइ ने कहा है तो यह सही ही होगा, ऐसी धारणा बना लेना घातक हो सकता है। एआइ से सवाल कर दवा लेना बंद करने तक के दुष्परिणाम पिछले दिनों सामने आए हैं। सीधे तौर पर हमारा लक्ष्य भी सोचने वालों को तैयार करना है न कि उपयोगकर्ताओं को। एआइ का उपयोग एक हद तक ठीक है, पर यह समझना होगा कि महत्वपूर्ण एआइ नहीं, इंसान ही है।