
प्रसादे सर्वदु:खानां हानिरस्योपजायते।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धि: पर्यवतिष्ठते॥ (गीता 2/65)
कृष्ण के अनुसार प्रसाद उस गहरी आध्यात्मिक अवस्था को इंगित करता है जहां साधक के समस्त दु:खों का नाश हो जाता है और वह परम शान्ति की अवस्था प्राप्त कर लेता है।
हमारे अध्यात्म के चार अंग हैं- शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा। सभी को पोषण के लिए अन्न की आवश्यकता होती है। प्रत्येक संस्था का अपना अन्न होता है, उसका अपना एक निश्चित स्वरूप होता है। यह भी एक सिद्धान्त है कि प्रत्येक रूप में अन्न का अन्तिम पड़ाव मन का निर्माण ही होता है। स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीन प्रकार के शरीरों का पोषण भी अन्न से ही होता है। अन्न तो स्थूल भी हो सकता है और सूक्ष्म भी, किन्तु मन तो सूक्ष्म है।
अन्न से मन का और मन से आत्मा का पोषण होता है। इस दृष्टि से हमें आत्मा को पुष्ट करने वाले अन्न को ही ग्रहण करना चाहिए। गीता में कृष्ण सात्विक, राजसिक व तामसिक तीन प्रकार के अन्नों में से सात्विक अन्न के परिग्रहण की बात करते है। उनके अनुसार सात्विक अन्न, आयु, बल, सत्व, आरोग्य, सुख और प्रेम को बढ़ाने वाला होता है। हृदय को शक्ति देने वाला होता है-
आयु:सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धना:।
रस्या: स्निग्धा: स्थिरा हृद्या आहारा: सात्त्विकप्रिया:॥ (गीता १७.८)
उच्छिष्टात् जज्ञिरे सर्वम्- इस श्रुति के अनुसार सृष्टि मूल रूप से उच्छिष्ट से निर्मित हुई है। ईश्वर को समर्पित भोग उच्छिष्ट है और वह सदा सात्विक ही होता है। उसके ग्रहण से निर्मित हमारा मन भी सत्वगुणी हो जाता है। आत्मा मन-प्राण-वाक् रूप है। इन तीनों के पोषण से ही आत्मा का पोषण होता है। इस पोषण प्रक्रिया को भोग कहा जाता है। भोग भी तीनों शरीरों का भिन्न-भिन्न होता है। चाहे बाहरी हो- (मन्दिर आदि) अथवा हृदयस्थ, ईश्वर ही भोक्ता होता है।
सूक्ष्म शरीर स्थूल अन्न ग्रहण नहीं कर सकता। स्थूल अन्न से स्थूल शरीर का निर्माण होता है। उदाहरण के लिए- गेहूं का चापड़ (घन भाग) ही घन भाग है जो शरीर के ठोस भागों को निर्मित करता है। आटे का चिकना भाग घृत रूप है। अन्तरिक्ष का तत्त्व है जो चर्बी का उत्पादक है। सोमान्न का तीसरा भाग मधु होता है जो विशेष प्रकार का माधुर्य प्रदान करता है। चौथा भाग अमृत का - परमेष्ठी रस का होता है। यह मन का पोषण करता है।
पृथ्वी तत्त्व से ही शरीर का निर्माण होता है। पृथ्वी पंचतत्त्वा- मां- है, विष्णुपाद है, लक्ष्मी है, एवं अर्थ सृष्टि की अधिष्ठात्री है। स्थूल शरीर भी अन्नमय कोश है- लक्ष्मी है। अत: पार्थिव अन्न पार्थिव शरीर का अन्न बनते हुए सप्त धातुओं का निर्माण करता है।
प्राणमय कोश तथा मनोमय कोश का पोषण इससे पर्याप्त हो नहीं सकता। तीनों शरीरों का पोषण उचित रूप से हो सके, अत: भोग के तीन परम्परागत अंग हैं- अन्न-शृंगार और राग। वैश्वानर अग्नि में आहुत अन्न ही रस बनता है। शृंगार भी रस है। भक्ति—आनन्द रूप है, रस ही है- रसो वै स:। संगीत के स्पन्दन प्राणों का पोषण करते हैं। शृंगार वाक् से सम्बन्ध रखता है। भक्ति मार्ग में इसे मधुरा भक्ति कहा जाता है। जहां भक्त को भगवान की हर मुद्रा, हर अंग और हर भाव में प्रेम और सौन्दर्य ही परिलक्षित होता है। यह भक्ति का स्थूलतम किन्तु सर्वाधिक आकर्षक रूप है। शृंगार ईश्वरीय सौन्दर्य बोध को उत्पन्न करने का साधन है।
अन्न का सम्बन्ध भूगोल से है। परम्परागत रूप से भोजन स्थानीय अन्न युक्त होता है। जैसा अन्न, वैसा मन। इस देश के भू भागों में भिन्न-भिन्न परम्परागत मन्दिर हैं। प्रत्येक मन्दिर में ईश्वर का एक विग्रह है, जिसका शृंगार, अन्न और राग भूगोल पर आधारित रहता है। अन्न का भोग ऋतुचर्या पर आधारित रहता है। फसलों के आधार पर बदलता जाता है। पोशाक-शृंगार का आधार ऋतु अथवा पर्व होता है। प्रत्येक परम्परागत मन्दिर में संगीत भी परम्परागत ही होता है। जैसे नाथद्वारा में हवेली संगीत। संगीत के आलोक में ही अन्न का भोग लगाया जाता है।
अन्न लक्ष्मी है, सौम्य है। संगीत नाद है - आग्नेय है - सरस्वती है। भावना आत्मा का अन्न है। मन से ही मन का सम्पर्क होता है। भक्ति की तरंगें ही मन तक पहुंचती हैं। यह स्पन्दन का - प्राणों का - नाद का - सरस्वती का - सूक्ष्म शरीर है। परा प्रकृति का कार्य क्षेत्र है। यह सभी कर्मों का निमित्त क्षेत्र है। पूर्व जन्म के कर्म - प्रारब्ध रूप में अव्यय अथवा कारण शरीर से यहां आते हैं। नए कर्म भी यहां से संचित कर्मों में जुड़ते हैं। अत: ज्ञान और कर्म से युक्त भक्तियोग इस क्षेत्र को विशेष रूप से प्रभावित करता है।
भक्ति का मार्ग मन्दिर के विग्रह पर आधारित होता है। यही सम्प्रदाय रूप में भी चल पड़ता है। भक्ति में पार्थिव अन्न आधारित शरीर तथा चान्द्र मन आधारित मन की युति कार्य करती है। परम्परा से संगीत भी शास्त्रीय ही होता है। यही अपने चरम पर पहुंचकर मन को स्थिर करता है। मन को ईश्वर के साथ एकात्म सूत्र से जोड़ता है। चित्त में शृंगार युक्त विग्रह आनन्द भाव पैदा करता है। यह भाव भूमि ही भक्ति और संगीत का परिणाम है। भक्त के भाव ईश्वर में लीन होने लगते हैं।
ईश्वर हृदय में भी तीनों अक्षर प्राण- ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र रहते हैं। अशनाया काल में इन्द्र ही अर्क रूप बाहर विचरण किया करते हैं। विष्णु अन्न लेकर पुन: हृदय में प्रतिष्ठित ब्रह्मा का पोषण करते हैं। यहां अन्न ओज और मन रूप होता है। नाद के सहारे, स्पन्दन रूप मन तक पहुंचता है। भक्त ने प्रसाद चढ़ाया और प्रसाद मन की ओर बढ़ा। क्या भक्त ने प्रसाद पूर्ण मनोयोग से चढ़ाया?
पहले शरीर ओझल होता है, फिर बुद्धि और मन। अपरा प्रकृति की क्षरता पीछे छूट जाती है। भक्त और ईश्वर के मध्य संवाद रह जाता है। नाद आकाश का गुण है। यहां स्पन्दन जीवात्मा से सम्पर्क में आते हैं। मन के साथ संगीत के स्पन्दन हृदय को झंकृत करते हैं। नाद भी शान्त होकर 'अनाहत' में बदल जाता है। देव रह जाता है, व्यक्ति खो जाता है। भावों के स्पन्दन आल्हाद में बदलते हैं। भगवान भाव के भूखे होते हैं।
प्रसाद चढ़ाया- भोग-शृंगार-राग चढ़ाया। सब छूट गया। भाव रह गया। यही लेकर लौटना है। यही प्रसाद है, जो भोग लगाने के बाद प्राप्त हुआ। ईश्वर का उच्छिष्ट। यही भविष्य है। जो चढ़ाया था, अतीत हो गया।
शृंगार-साधना, राग-मार्ग व प्रसाद-गन्तव्य है, यही गन्तव्य प्राप्त करने के भक्त रागमय भोग शृंगारित ईश्वर को समर्पित करके उसके साथ तादात्म्य स्थापित करता है। भगवान से वह इस भाव में जुड़ जाता है मानो उसका अंग बन गया हो। अंग बन जाना ही भक्ति है, रागात्मक स्पन्दनों से ईश्वरीय मन से जुड़ना, उसके स्वरूप पर मुग्ध होना यद्यपि आसक्ति है किन्तु यह आसक्ति संसार में रत नहीं करती बल्कि संसार से छूटने का मार्ग प्रशस्त करती है जो प्रसाद भगवान को चढ़ाया जाता है उसमें दिव्य रस का समावेश हो जाता है। उसके ग्रहण से मन में आंतरिक प्रसन्नता और स्थिरता प्राप्त हो जाती है। हम प्रसाद के रूप में आनन्द और परम शान्ति प्राप्त करके ईश्वरीय द्वार से आते है।
क्रमश: gulabkothari@epatrika.com