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संपादकीय: कानून की सख्त पालना से ही रुकेगी बंधुआ मजदूरी

मुजफ्फरपुर के गांव में जिन श्रमिकों को पुलिस और श्रम विभाग की संयुक्त कार्रवाई में मुक्त कराया गया, वे राजस्थान, बिहार व हरियाणा से लाए गए थे।
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bonded labour

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उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरपुर के एक गांव में मुक्त कराए बंधुआ मजदूरों की पीड़ा सचमुच दिल दहलाने वाली है। पत्तल-दोने बनाने के कारखाने में जितना मेहनताना देने का भरोसा देकर इन मजदूरों को काम पर रखा गया, वह देना तो दूर की बात रही। बल्कि महज एक बार सूखी रोटी देने, मारपीट करने व भागने का प्रयास करने पर खतरनाक पिटबुल डॉग पीछे छोडऩे का कृत्य भी किया जो संवेदनहीनता की पराकाष्ठा ही कहा जाएगा। कमजोर तबके को आर्थिक और शारीरिक शोषण से रोकने के लिए बने सख्त कानून-कायदों के बावजूद आजाद भारत में बंधुआ मजदूरी जारी रहने के ऐसे मामले चिंतित करने वाले हैं। बंधुआ मजदूरी के ऐेसे मामले जब भी सामने आते हैं तो यह सवाल जरूर सामने आता है कि आजादी के सात दशक बीत जाने के बावजूद आखिर मजदूरों का यह शोषण क्यों जारी है?

जाहिर है कि अशिक्षा और गरीबी दोनों का चक्र बड़ी सामाजिक विषमता के रूप में सामने आ रहा है। बंधुआ मजदूरी की ऐसी पीड़ाजनक तस्वीरें देश के हर हिस्से में गाहे-बगाहे सामने आती रहती है। मुजफ्फरपुर के गांव में जिन श्रमिकों को पुलिस और श्रम विभाग की संयुक्त कार्रवाई में मुक्त कराया गया, वे राजस्थान, बिहार व हरियाणा से लाए गए थे। ऊंची मजदूरी का झांसा देकर लाए गए इन श्रमिकों को आपस में बात तक नहीं करने दिया जाता था। इनकी घर वापसी की उम्मीदें तक टूट गई थीं। यह सच है कि परिवारों को जब आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा है तो मनमानी शर्तों पर काम करना मजबूरी बन जाता है। सरकारें गरीब और कमजोर परिवारों को व्यापक सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक संबल प्रदान करने के दावे तो करती है लेकिन इनका फायदा सब तक पहुंच ही नहीं पाता। बंधुुआ मजदूरी के दंश से छुटकारा पाने वाले श्रमिक फिर ऐसे भंवर में नहीं फंसेंगे, इसका बंदोबस्त उनके समुचित पुनर्वास से ही हो सकता है। बंधुआ मजदूरी से लेकर बालश्रम के खिलाफ कानून तो है लेकिन इनकी पालना को लेकर कितनी सख्ती होती है यह जगजाहिर है। कहीं से कोई शिकायत आ जाए तो अलग बात है अन्यथा सब कुछ शासन-प्रशासन की नाक के नीचे होता है।


बंधुआ बनाकर मजदूरी कराना व बच्चों से मजदूरी कराने के साथ उनसे अमानवीय बर्ताव करना तो किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। यह सीधा मानवाधिकारों के हनन करने वाला कृत्य भी है। ऐसे में दोषियों पर सख्त कार्रवाई और पीडि़तों को त्वरित राहत इस दंश से एक हद तक छुटकारा दिलाने वाली हो सकती है। आजाद भारत में भी गुलामी की ऐसी जंजीरें किसी को भी बांधती नजर आए तो यह शासन-प्रशासन की विफलता ही कही जाएगी। श्रम कानूनों को कठोरता से लागू किया जाए इसके लिए प्रशासनिक उदासीनता तो दूर करने की जरूरत है ही, सरकारों को भी इच्छाशक्ति दिखानी होगी।