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संपादकीय – अल नीनो प्रभाव: कृषि से जुड़ी गंभीर चेतावनी

फिलहाल देश के लिए राहत की बात यह है कि यह संकट दो अच्छे मानसूनी वर्षों के बाद सामने आया है। इससे गेहूं, चावल, मक्का, गन्ना, सोयाबीन, तिलहन जैसी फसलों का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ है। पर्याप्त भंडार होने के कारण खाद्य महंगाई अभी नियंत्रण में है। लेकिन यह सुरक्षा कवच स्थायी नहीं है।
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भारत

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Opinion Desk

Jun 25, 2026

climate change

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कुमार अनुज, वरिष्ठ पत्रकार

अब तक देश में सामान्य से 43 फीसदी कम बरसात होने के चिंताजनक संकेत खुद कृषि मंत्रालय ने दिए हैं कि यही स्थिति बनी रही तो 315 जिलों में खेती प्रभावित हो सकती है। मानसून की यह सुस्त शुरुआत केवल मौसम का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह कृषि, अर्थव्यवस्था और महंगाई से जुड़ी गंभीर चेतावनी भी है। यह तस्वीर तो तब सामने आई है, जब वैश्विक मौसम एजेंसियों का अनुमान आने वाले महीनों में अल नीनो का प्रभाव काफी मजबूत रहने का है। भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का प्रत्यक्ष योगदान भले ही सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में अपेक्षाकृत कम दिखाई देता हो, लेकिन ग्रामीण आय, उपभोग, रोजगार और खाद्य सुरक्षा का बड़ा आधार खेती ही है। मानसून की कमजोरी का असर खेतों से निकलकर बाजारों, उद्योगों और आम लोगों की रसोई तक पहुंचता है। मानसून 4 जून को केरल पहुंचा और इसके बाद उसकी गति भी धीमी पड़ गई। उत्तर-पश्चिमी शुष्क हवाओं ने मानसून को कमजोर किया, जबकि बादलों और नमी को सक्रिय करने वाली मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन (एमजेओ) प्रणाली भी अपेक्षित रूप से प्रभावी नहीं रही। हालांकि अब मानसून ने कुछ गति पकड़ी है, लेकिन जून में वर्षा की भारी कमी भविष्य के लिए अच्छे संकेत नहीं देती। इतिहास बताता है कि 2015-16 और 2023-24 के मजबूत अल नीनो ने सूखे जैसी परिस्थितियां पैदा की थीं। इस बार भी ऐसा हुआ तो खरीफ के साथ-साथ रबी फसलें भी प्रभावित हो सकती हैं। अल नीनो केवल वर्षा ही कम नहीं करता, बल्कि तापमान भी बढ़ाता है, जिससे फसलों पर दोहरा दबाव पड़ता है। फिलहाल देश के लिए राहत की बात यह है कि यह संकट दो अच्छे मानसूनी वर्षों के बाद सामने आया है। इससे गेहूं, चावल, मक्का, गन्ना, सोयाबीन, तिलहन जैसी फसलों का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ है। पर्याप्त भंडार होने के कारण खाद्य महंगाई अभी नियंत्रण में है। लेकिन यह सुरक्षा कवच स्थायी नहीं है। यदि खरीफ और रबी दोनों मौसमों की फसलें प्रभावित हुईं, तो आने वाले समय में खाद्यान्न आपूर्ति और कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। सीधा असर ग्रामीण आय पर पड़ेगा और इससे उपभोग घट सकता है। बाजार की कमजोरी अंतत: औद्योगिक उत्पादन और आर्थिक वृद्धि को भी प्रभावित करेगी। ऐसी स्थिति में सरकार को पूर्व-तैयारी आधारित नीति अपनानी होगी। प्रभावित किसानों को त्वरित बीमा भुगतान, फसल सर्वेक्षण और राहत उपलब्ध करानी चाहिए। खाद्यान्न आपूर्ति को संतुलित बनाए रखने के लिए आयात के विकल्प भी खुले रखने होंगे। इसके साथ ही 1 जुलाई से शुरू होने वाली वीबी-जीआरएएम ग्रामीण रोजगार योजना को प्रभावी ढंग से लागू कर ग्रामीण आय को सहारा देना होगा। यह समय सतर्क और दूरदर्शी निर्णय लेने का है। समय रहते कदम उठाना ही संकट से बचने के प्रभावी उपाय होंगे।