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देश में जब भी कोई बड़ी आग लगती है, कुछ दिन के लिए व्यवस्था जाग जाती है। बैठकें होती हैं, नोटिस जारी होते हैं, जांच समितियां बनती हैं, अधिकारियों के दौरे होते हैं और सुरक्षा का नया अभियान शुरू हो जाता है, लेकिन जैसे ही धुआं छंटता है, सब कुछ फिर पहले जैसा हो जाता है। यही वजह है कि हर हादसे के बाद प्रश्न वही रहते हैं, सिर्फ शहर और मृतकों के नाम बदल जाते हैं।
जब कोई अस्पताल खुलता है, कोई कोचिंग सेंटर शुरू होता है, कोई मॉल, होटल या व्यावसायिक परिसर बनता है, तब परमिशन कौन देता है? फायर एनओसी कौन जारी करता है? निरीक्षण कौन करता है? बसों के परमिट कौन बनाता है? और यदि बाद में वही भवन या वाहन मौत का कारण बन जाता है, तो जिम्मेदारी केवल संचालक की क्यों तय होती है? उस अधिकारी की जवाबदेही क्यों नहीं होती, जिसके हस्ताक्षर से उसे अनुमति मिली थी?
हर बड़े हादसे के बाद सामने आता है कि फायर सिस्टम अधूरा था, आपातकालीन निकास बंद थे, क्षमता से अधिक लोग मौजूद थे, नियमों का पालन नहीं हुआ था और निरीक्षण वर्षों पहले किया गया था। यदि ये खामियां हादसे के कुछ घंटों बाद मिल जाती हैं, तो हादसे से पहले किसी को क्यों नहीं दिखीं? क्या पूरी व्यवस्था इतनी अक्षम है या फिर जानबूझकर आंखें मूंद ली जाती हैं? हालात ऐसे हैं कि जनता को समूची व्यवस्था पर अविश्वास होने लगा है।
कड़वा सच यह है कि यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, राजनीतिक इच्छाशक्ति की भी नाकामी है। कोई भी असुरक्षित अस्पताल, नियम तोड़ता कोचिंग सेंटर, अवैध गोदाम या बिना मानकों के चल रहा व्यावसायिक प्रतिष्ठान एक दिन में खड़ा नहीं होता। वर्षों तक उसे संरक्षण, मौन स्वीकृति या सुविधाजनक अनदेखी मिलती है। सवाल यह है कि क्या सरकारें वास्तव में ऐसे जोखिमों को खत्म करना चाहती हैं या फिर तब तक आंखें मूंदे रखना चाहती हैं, जब तक कोई बड़ा हादसा उन्हें कार्रवाई के लिए मजबूर न कर दे?
राजनीतिक नेतृत्व अक्सर हादसों के बाद सख्त बयान देता है। जांच, कार्रवाई और जवाबदेही की बातें होती हैं। यदि सरकारें चाहें तो राज्यभर के अस्पतालों, कोचिंग संस्थानों, होटलों, मॉल, बाजारों और सार्वजनिक भवनों का व्यापक सुरक्षा ऑडिट कराया जा सकता है। यदि ऐसा नहीं हो रहा, तो सवाल उठेगा ही कि कमी संसाधनों की है या संकल्प की? हकीकत यह है कि हादसे अक्सर अचानक नहीं होते। वे वर्षों की अनदेखी, ढिलाई और संदिग्ध समझौतों का परिणाम होते हैं। जब तक सब ठीक चलता रहता है, कोई सवाल नहीं पूछता, लेकिन जैसे ही जानें जाती हैं, पूरी व्यवस्था सक्रिय दिखाई देने लगती है। तब नोटिस निकलते हैं, सीलिंग होती है, अभियान चलते हैं। मानो सुरक्षा का मूल्यांकन लोगों के जिंदा रहते नहीं, मरने के बाद किया जाता हो और यही सबसे भयावह बात है।
प्रश्न केवल लापरवाही का नहीं है। जवाबदेही का है। जिस अधिकारी ने अनुमति दी, जिसने निरीक्षण में खामियों को नजरअंदाज किया, जिस तंत्र ने नियमों को कागजों में पूरा मान लिया, क्या उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं? यदि हर बार केवल संचालक और कर्मचारी ही दोषी माने जाएंगे तो व्यवस्था कभी नहीं सुधरेगी। अब जरूरत नए नोटिसों की नहीं, जवाबदेही की नई परिभाषा तय करने की है। हर हादसे के बाद केवल संचालक ही नहीं, पूरी अनुमति शृंखला जांच के दायरे में आए। यह देखा जाए कि नियमों की अनदेखी किस स्तर पर हुई और किसने होने दी।
जब तक राजनीतिक नेतृत्व यह संदेश नहीं देगा कि नियम तोड़ने वालों के साथ-साथ नियम तोड़ने देने वालों की भी जवाबदेही तय होगी, तब तक हर नोटिस अगले हादसे का इंतजार भर रहेगा। फिर कोई इमारत जलेगी। फिर कोई अस्पताल धुएं से भरेगा। फिर कोई बस, कोई बाजार, कोई कोचिंग मौत का जाल बनेगी और फिर सत्ता कहेगी- जांच होगी, लेकिन जनता के खाते में एक ही सवाल रहेगा, 'आग लगेगी, तभी कुआं क्यों खोदेते हो!’
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Updated on:
25 Jun 2026, 7:02 AM IST
Published on:
25 Jun 2026, 6:51 AM IST
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