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पत्रिका में प्रकाशित अग्रलेख: नरक पथ

नरक में रास्ते कैसे होते हैं? क्या आप अनुभव करना चाहते हैं! चले आइए, राजस्थान की राजधानी जयपुर में। पुलिस कमिश्नरेट से जिला कलक्ट्रेट की यात्रा पर निकल जाइए।
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Aug 28, 2026
path to hell
फोटो: पत्रिका

नरक में रास्ते कैसे होते हैं? क्या आप अनुभव करना चाहते हैं! चले आइए, राजस्थान की राजधानी जयपुर में। पुलिस कमिश्नरेट से जिला कलक्ट्रेट की यात्रा पर निकल जाइए। पता चल जाएगा कि नरक के रास्ते कैसे होते हैं!

पिछले 25 दिन में यह व्यस्त रहने वाला रास्ता तीन बड़े जाम झेल चुका है। सामान्य जाम तो रोज की बात है। गत 19 अगस्त को इस मार्ग पर साढ़े दस घंटे तक जाम रहा। स्कूली बच्चे भूखे-प्यासे फंसे रहे। यात्रियों की ट्रेनें-बसें छूट गईं। बहुत से बीमार अस्पताल नहीं पहुंच पाए। पर सरकार और जिला प्रशासन में न किसी को शर्म आई, न किसी के कान में जूं रेंगी। जब भी ऐसा गंभीर मामला सामने आता है तो तुरंत-फुरंत आला अफसरों की बैठक बुलाई जाती है। डांट-फटकार होती है। अगले दिन सब भुला दिया जाता है। न प्रशासनिक अफसरों को शर्म आती और न पुलिस को। जयपुर, देश के सबसे अव्यवस्थित यातायात वाले शहर का खिताब पाने को बेताब हो रहा है। शायद जयपुर विकास आयुक्त, जिला कलक्टर और पुलिस के आला अफसर जश्न की तैयारी कर रहे होंगे।

साढ़े दस घंटे ट्रैफिक जाम रहा, क्योंकि आंदोलनरत वकीलों ने रास्ता रोक दिया था। पूरे शहर को इतने लंबे समय तक बंधक बनाने के बाद सरकार झुक गई। मांगें मान ली गईं। झुकना ही था तो पहले ही झुक जाते। क्यों शहरवासियों को इतना दर्द दिया! तीन अगस्त को आरक्षण विरोधी जुलूस निकला। तब भी ऐसा ही हुआ था। क्या जुलूस निकालने वालों को लगता है कि शहर का गला घोंटे बिना उनका 'आंदोलन' असर नहीं दिखा पाएगा। और, अब नगर निगम चुनाव का पर्चा भरने वालों को भी अपनी ताकत दिखाने को यही मार्ग मिला। जो अपने चुनाव अभियान की शुरुआत ही जनता को कष्ट दे कर रहे हैं, वे जीत गए तो जनता को तड़पा-तड़पा कर मार देंगे। नकली समर्थकों की भीड़ के साथ ऐसे पर्चा भरने वालों की शक्ल जयपुरवासियों को याद रखनी चाहिए।

ऐसे व्यस्त मार्ग पर यातायात सुचारू रूप से बना रहे, इसकी सीधी जिम्मेदारी जयपुर कलक्टर और ट्रैफिक के उच्चाधिकारियों की है। अगर वे अपनी जिम्मेदारी संभाल नहीं सकते तो उन्हें ऐसे पदों से हट जाना चाहिए। उन्हें कानून ने पूरे अधिकार दिए हैं, व्यवस्था संभालने के लिए। क्यों पहले से इंतजाम नहीं किए जाते? समय रहते ट्रैफिक डायवर्ट करना, पर्याप्त संख्या में क्रेन और यातायात पुलिस बल की व्यवस्था करना, जरूरत हो तो स्कूलों में अवकाश घोषित करना, बड़े वाहनों की एंट्री बंद करना-बीसियों उपाय हो सकते हैं, पर अफसर समय पर नींद से जाग जाएं, तभी इन्हें लागू करना संभव होगा।

जयपुर की यातायात व्यवस्था का बेड़ा गर्क करने में सबसे बड़ी भूमिका जयपुर विकास प्राधिकरण और परिवहन विभाग की रही है। जेडीए के उच्चाधिकारी जानबूझकर ऐसी योजनाएं बनाते हैं जिनमें कमीशन ज्यादा मिले। जनता को कष्ट होगा इसकी उन्हें तनिक भी चिंता नहीं है। वर्षों पहले इसी मार्ग पर बनाया गया उल्टा फ्लाईओवर इसी का उदाहरण है। ऐसा ही कुछ इन दिनों जगतपुरा में सड़क को 60 प्रतिशत घेरने वाले 'यू' टर्न बना कर किया जा रहा है। अजमेरी गेट और टोंक रोड के भूमिगत पदमार्ग व ओवरब्रिज इसी तरह के दिमागी दिवालिएपन की निशानियां हैं। सब जानते हैं, गोविंद मार्ग पर फ्लाईओवर बनाना कितना जरूरी है। लेकिन इस क्षेत्र के व्यापारी और राजनेता इसे न बनने देने का दबाव बना देते हैं। बेचारे अफसर क्या करें!

एक साधारण बुद्धि का व्यक्ति भी बता सकता है कि व्यवस्थित सार्वजनिक परिवहन प्रणाली, वाहनों की संख्या पर नियंत्रण, वीआइपी कल्चर का खात्मा, व्यस्त मार्गों पर जुलूसों व प्रदर्शनों पर प्रतिबंध और अनावश्यक बेरिकेटिंग पर रोक ही जयपुर की बिगड़ी यातायात व्यवस्था को सुधारने के सही उपाय हैं। पर इतना कोई नहीं सोचता। मास्टर प्लान कमाई के साधन बन गए। नगर नियोजन विभाग के अफसरों में दमखम नहीं बचा। ट्रैफिक व जिला प्रशासन की कोई नहीं सुनता, न उन्हें अधिकार हैं। आइपीएस अफसर भी केवल डंडे फटकारने के अलावा कुछ नहीं कर पाते। अब तो अदालत के आदेशों को भी रद्दी की टोकरियों में डालने में हमारे अफसर और नेता सिद्धहस्त हो गए। जब बेशर्मी अफसरों और राजनेताओं का श्रृंगार बन जाए तो सुधार की उम्मीद कैसे की जाए?

bhuwan.jain@in.patrika.com

Updated on:
28 Aug 2026 10:33 am
Published on:
28 Aug 2026 10:33 am