भाषण में अहम मसलों जैसे कि नोटबंदी पर लगाई गई चुप्पी से लगा कि मोदी कह रहे हों यूपीए की नाकामियों को मत भूलना लेकिन मेरी नाकामियों को भुला देना।
- प्रताप भानु मेहता, राजनीतिशास्त्री
शेक्सपियर कृत जूलियस सीजर में संकेतों को समझने के संदर्भ में कास्का से सिसेरो कहता है, ‘यह अजीबोगरीब समय है, जब लोग अपने तरीके से चीजों की व्याख्या करते हैं जबकि चीजों के असल मायने कुछ और ही होते हैं।’ आम चुनाव से पहले के आखिरी स्वतंत्रता दिवस सम्बोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सुनते हुए सिसेरो की उपर्युक्त सलाह काफी कारगर जान पड़ती है। चुनावी वर्ष में एक भाषण किसी पूर्वसूचना जैसा होता है। जाहिर है, समर्थक और आलोचक दोनों अपने-अपने तरीके से इसकी व्याख्या करेंगे, पर यह याद रखा जाना चाहिए कि ऐसे भाषण और इनमें किए गए दावे आश्चर्यजनक रूप से जमीनी सच्चाई से अलहदा हैं।
प्रधानमंत्री का भाषण अपने आप में एक कलात्मक, कुशल और ऊर्जावान प्रदर्शन का नमूना था - उनके विरोधियों को इन गुणों के मामले में उन्हें हलके में नहीं लेना चाहिए। इसने उम्मीद की एक फंतासी से हमें आच्छादित कर लिया - एक ऐसी फंतासी, जहां भारत आगे बढ़ रहा है, सभी राष्ट्रों द्वारा समादृत है (भारतीय पासपोर्ट की प्रतिष्ठा में इजाफा शायद इसका संकेत हो), भ्रष्टाचार से मुक्त हो चुका है और निर्बलता के शिकंजे में नहीं रह गया है। इस फंतासी में राज्य हर उस चीज को उपलब्ध करवा रहा है जिसका इंतजार लंबे समय से देश के गरीबों को था।
उम्मीदों की इस फंतासी में यह राष्ट्र सामाजिक समावेशन का ऐसा मॉडल बनकर उभरा है जहां राज्य का पूरा ध्यान गरीबों और हाशिये के लोगों पर केंद्रित है। यहां तक कि संसद ने भी अन्य पिछड़ी जातियों को सशक्त करने हेतु कानून पारित करने के लिए अपने उच्छृंखल तरीकों को दरकिनार कर दिया। महिलाएं तो हर क्षेत्र में सशक्त हुई हैं: खेलों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक और सैन्यबलों से लेकर रसोई तक। समाज अपने भीतर की बुराइयों से लडऩे का संकल्प जताने के लिए मृत्युदंड की खबरों को खूब प्रसारित कर रहा है। भ्रष्टाचार तो अब अतीत की बात हो चली: बुरी कंपनियां कांप रही हैं, बिचौलिए नदारद हो चुके। एक बार फिर ईमानदारी का राज आ गया है। कड़े फैसले लिए जा रहे हैं। उम्मीदों और आकांक्षाओं का एक नया क्षितिज नमूदार हो रहा है।
यह सरकार का ओजपूर्ण और मंत्रमुग्धकारी बचाव है जिसे काफी असरदार तरीके से संप्रेषित किया गया है। सियासी नजरिये से हालांकि इस भाषण पर दो सवाल बनते हैं: पहला, जो कि सपाट और अनुभवजन्य है, वो यह कि उम्मीदों व उपलब्धियों का यह आख्यान अर्थव्यवस्था के वास्तविक आईने में कैसा दिखता है? क्या इसमें कोई विश्वसनीयता भी है या ये दावे सर्वथा खोखले हैं? दूसरा सवाल कहीं ज्यादा गंभीर है। एक राग पर एक ही उद्देश्य के लिए आगे की ओर कदमताल करते एक राष्ट्र के मुलम्मे में लिपटी उम्मीदों की यह फंतासी महज कुछ प्रभावी सरकारी योजनाएं उछाल कर आखिर भय के वास्तविक गणराज्य को, आतंक के मंडराते हुए उस बोध को कैसे पूरी तरह आच्छादित कर लेती है?
इस भाषण में अहम मसलों जैसे कि नोटबंदी पर लगाई गई चुप्पी से लगा कि मोदी कह रहे हों यूपीए की नाकामियों को मत भूलना लेकिन मेरी नाकामियों को भुला देना। दूसरी बड़ी चुप्पी उस भय के वातावरण को लेकर बरती गई जिसका अहसास हमें मुंह खोलते होता है। मोदी से उम्मीद भी नहीं थी कि वे मंडराते हुए ऐसे खतरों को संबोधित करेंगे या फिर इनसे लडऩे का कोई पवित्र संकल्प जाहिर करेंगे।
गणराज्य पर मंडराते खतरों की मामूली स्वीकार्यता से भी बचते हुए मोदी ने दरअसल दो काम किए। पहला, उन्होंने संदेश दिया कि जो कोई भी ऐसे भयबोध से ग्रस्त है वह स्वीकरण के दायरे से ही बाहर है। गोया वे कह रहे हों कि जब आप उम्मीद की फंतासी स्वीकार नहीं कर रहे तो मैं क्यों आपकी बात मानूं। दूसरे, ऐसे भय को संबोधित न कर वे प्रभावी तौर पर यह संकेत दे रहे थे कि राजनीति में भय के साम्राज्य की स्वीकार्यता वैसी ही है जैसी उम्मीदों के उस कल्पनालोक की, जिसकी झलक उन्होंने दिखलायी है।
यहां सवाल यह बनता है कि क्या यह भयबोध इतना व्यापक है कि वह मोदी के बुलबुले में छेद कर सके? या फिर वे हमें इतना हीन बनाने में कामयाब हो चुके हैं कि इस गणराज्य के बुनियादी मूल्य ही हमारे लिए कोई मायने नहीं रखते, जब तक कि हम निजी रूप से प्रभावित न हों?
विपक्ष को इस चुनौती का सामना करने की जरूरत है। आखिर विपक्ष में ऐसा क्या है कि मोदी इन सब चीजों के साथ बड़े आराम से टिके हुए हैं? मोदी की फंतासियों के बरक्स खौफ के माहौल की बात करने के अलावा विपक्ष क्या कोई और ज्यादा विश्वसनीय आह्वान कर सकता है? इस भाषण से यह सवाल इसलिए निकलता है क्योंकि वह हकीकत से कोसों दूर है - सिसेरो के शब्दों में कहें तो ‘अपने असल उद्देश्य और मायने से बिल्कुल कटा हुआ।’ सवाल यह भी है क्या यह किसी कमजोरी का लक्षण है जिसके आर-पार अब हम देख पा रहे हैं? या फिर किसी ताकत का परिचायक कि हम अब भी उनसे वही कामनाएं कर रहे हैं जो करते रहे हैं? हमारी आजादी के हक में तो बेहतर यही होगा कि भारत इस भाषण को उनकी बढ़ती कमजोरी के आईने में देखे-समझे।