विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस (10 अक्टूबर) पर विशेष: कम वास्तविक नहीं हैं मानसिक रोग, उपचार में बाधा है ‘स्टिग्मा’
गिरीश्वर मिश्र
प्रख्यात मनोविद, विचारक व अंतरराष्ट्रीय हिंदी विवि वर्धा के पूर्व कुलपति
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आज जीवनशैली से जुड़े गैर-संक्रामक रोगों की बड़ी चर्चा है और इसके लिए सशक्त नीति बनाने और उपचार की व्यवस्था के लिए तात्कालिक कदम उठाने पर जोर दिया जा रहा है। पर पूरे विश्व में अशक्तता पैदा करने वाला रोग न मधुमेह है न हृदय रोग, बल्कि यह है अवसाद या डिप्रेशन। इसका अर्थ यह हुआ कि रोजमर्रा की जिंदगी में लोग बड़ी मुश्किलों में हैं। वे कैंसर या मस्तिष्क आघात से कहीं ज्यादा अवसाद से ग्रस्त होने के कारण पढ़ाई-लिखाई, ऑफिस के काम या रिश्ते-नाते के दायित्व निभाने आदि को लेकर परेशानी अनुभव करते हैं। पश्चिमी देशों में युवा वर्ग में अवसाद उनकी मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण बन रहा है। दुर्घटनाओं के बाद 15-19 आयु वर्ग में अवसादजन्य आत्म-हत्या मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है। यह चिंताजनक बात है कि पिछले दो दशकों में अवसाद और आत्म-हत्या दोनों ही बड़ी तीव्र गति से बढ़े हैं।
युवा वर्ग में तनाव की अचानक बढ़ोतरी के पीछे परिवेश, समाज और जीवनशैली के कारक हैं जो मस्तिष्क के स्वास्थ्य और मानसिक प्रतिरोध की क्षमता को बाधित करते हैं। अनुमान है कि अगले एक दशक के दौरान अवसाद वैश्विक रोग-भार (ग्लोबल डिजीज बर्डन) में मुख्य भूमिका अदा करेगा। इसका सीधा असर जीवन-विस्तार और अर्थ-व्यवस्था पर पड़ेगा और जीवन की गुणवत्ता में भारी गिरावट दर्ज होगी।
‘अवसाद’ मनोरोग लक्षणों के एक समूह का नाम है जो व्यक्ति के मूड और कार्य करने की प्रवृत्ति को नुकसान पहुंचाते हैं। इसे अक्सर दिमागी रोग के रूप में ग्रहण किया जाता है पर यह आदमी के पूरे शरीर पर असर डालता है। इसमें कई मनोवैज्ञानिक, शारीरिक और अंतरवैयक्तिक लक्षण शामिल हैं। अवसादग्रस्त व्यक्ति दुखी रहता है, उसमें निराशा, असहायता का भाव, प्रेरणा की कमी, रुचि में कमी, ग्लानि का भाव, तुनकमिजाजीपन, निर्णय लेने में अक्षमता, दुश्चिंता पाई जाती है। उसमें आत्मघात और आत्महत्या के विचार भी आते हैं। शरीर के स्तर पर अच्छी नींद न आना, भूख में कमी और शरीर का वजन कम होना, ऊर्जा की कमी, चाल-ढाल और बोलचाल में सुस्ती, अपनी अवहेलना करना या खुद पर ध्यान न देने के लक्षण भी दिखते हैं। सामाजिक स्तर पर अपने को वापस खींच लेना, रिश्तों में कठिनाई और पढ़ाई-लिखाई या नौकरी में ठीक से काम न कर पाना भी अवसादग्रस्त लोगों में पाया जाता है।
नए अध्ययन बताते हैं कि जीवन-शैली के कई कारक जैसे - रोजमर्रा की आदतें और काम-धाम के तौर-तरीके भी अवसाद की रोकथाम करने और इसकी तीव्रता को कम करने में उपयोगी हैं। इन कारकों में कई तो मुफ्त या कम खर्चीले हैं और उनको तुरंत लागू भी किया जा सकता है। पिछले वर्षों में अल्जाइमर समेत स्मृति-भ्रंश (डिमेंशिया) कई पश्चिमी देशों में मृत्यु का कारण बन रहा है। ताजे शोध बताते हैं कि यदि अच्छी जीवनचर्या अपनाई जाए तो एक तिहाई स्मृति-भ्रंश के मामले कम हो जाएंगे। इससे 1.5 करोड़ रोगी कम हो जाएंगे। पर मस्तिष्क स्वास्थ्य को लेकर जन-जागृति बहुत कम है और लोग ऐसे कठिन रोगों की चपेट में आने के लिए अभिशप्त हैं। वस्तुत: विश्व में मानसिक स्वास्थ्य पर शोध अभी भी उपेक्षित है। जब हम मानसिक रोगों के घटित होने की मात्रा, निदान की बढ़ती दर, उपचार की कमी और स्वास्थ्य-लाभ में विलम्ब देख रहे है तो मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा अनुचित है। गौरतलब है कि कई बार शारीरिक रोग भी मानसिक अस्वास्थ्य के परिणाम होते हैं। अत: रोग के लिए शारीरिक कारण खोजना गलत भी हो सकता है। उपचार में यह भ्रम भी बड़ी बाधा है कि मानसिक स्वास्थ्य की दशाएं वास्तविक ही नहीं हैं, ये तो मनोविज्ञान की समस्या है न कि जैविक। याद रखना चाहिए कि मस्तिष्क भी शरीर का एक अंग है, पर यह एक बड़ा जटिल अंग है और इसकी कुछ खास विशेषताएं भी हैं। यदि मस्तिष्क के कार्यों की क्षमता में हानि का अनुभव हो, तो इसका मतलब है मस्तिष्क पर ध्यान देने की जरूरत है। यह बात कि मानसिक रोग ‘कम वास्तविक’ है, हमें किसी तरह से समर्थ नहीं बनाती। सच्चाई इसके उलट है। मानसिक स्वास्थ्य में सुधार सबसे अच्छा तभी होता है जब उपचार जल्दी से जल्दी शुरू किया जाए। पर नासमझी और इससे जुड़े लांछन (स्टिग्मा) के चलते लोग परेशानियों को लेकर महीनों या वर्षों छिप कर चुप बैठे रहते हैं। तब तक देर हो गई होती है और उपचार कठिन हो गया होता है।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि मस्तिष्क व मानसिक स्वास्थ्य आज अशक्तता और मृत्यु का सबसे बड़ा कारण बन रहा है। हमें यह याद रखना होगा कि जीवन में तनाव और उसका प्रबंधन दबाव, प्रतिकार के तत्वों और उपलब्ध समाधान युक्तियों के बीच एक तरह की संधि वार्ता (निगोशिएशन) द्वारा होता है। व्यक्ति के प्रयास के साथ परिवेशगत बदलाव भी जरूरी हैं। हरे-भरे स्थान, शुद्ध वायु, सुरक्षा और सुविधापूर्ण आवागमन की सुविधा, स्वास्थ्य-सुविधा की उपलब्धता और सामाजिक सहयोग की भी मानसिक स्वास्थ्य के संवर्धन में महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। इस दृष्टि से सरकार और समुदाय दोनों को आगे बढ़ कर व्यवस्था करनी होगी।