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संपादकीय: पढ़ने की ललक बढ़ाने की छोटे स्तर पर अनूठी पहल

बच्चों को स्वाइप करने से पहले कलम पकडऩा और टाइप करने से पहले चित्र बनाना सीखना होगा। घर-परिवार में सभी सदस्यों को खास तौर से बच्चों को छपी हुई किताबें पढऩे की आदत विकसित करनी होगी, ताकि तकनीक और मानवीय मूल्यों के बीच रचनात्मक संतुलन स्थापित किया जा सके। डिजिटल भटकाव को रोकने का यही कारगर तरीका है।

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Jun 09, 2026
reading habbit
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मोबाइल स्क्रीन के बढ़ते दौर में मुद्रित पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं को पढऩे की प्रवृत्ति कम होने का गंभीर संकट पैदा हो गया है। मौजूदा पीढ़ी में डिजिटल उपकरणों के प्रति बढ़ती आसक्तिने न केवल एकाग्रता को प्रभावित किया है, बल्कि सोचने और कल्पनाशीलता की मानवीय क्षमता को भी सीमित कर दिया है। यह भी सच है कि सरकारें प्रौद्योगिकी की इस तीव्र रफ्तार को कानूनन रोक नहीं सकतीं इसलिए एक जीवंत और जागरूक नागरिक समाज के निर्माण के लिए अब समाज को ही आगे आना होगा। हर काम केवल सरकारों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। राष्ट्र और समाज का वास्तविक स्वरूप आम नागरिकों के स्तर पर की गई छोटी-छोटी सकारात्मक पहलों से ही तय होता है।

हाल ही दक्षिण भारत से सामने आए दो अनुकरणीय उदाहरण इस दिशा में एक नई रोशनी दिखाते हैं। चेन्नई के कोलापाक्कम में एक राशन दुकान के सेल्समैन वेलु चिन्नासामी ने ग्राहकों के इंतजार के समय को ज्ञान में बदलने के लिए तिरुवल्लुवर लाइब्रेरी की शुरुआत की। वहीं, केरल के कासरगोड में केवल आठवीं तक पढ़े सुरेंद्र कोट्टूयान ने अपनी चाय की दुकान को दुर्लभ पुस्तकों के अनूठे संग्रहालय में बदल दिया। इस तरह के छोटे-छोटे नवाचार भले ही व्यक्तिगत स्तर पर मामूली दिखें, लेकिन नागरिक समाज को वैचारिक रूप से समृद्ध बनाने में इनका योगदान अमूल्य है। पठन संस्कृति का विकास मनुष्य की रचनात्मकता और सक्रिय सोच को बढ़ाता है, जो किसी भी सभ्य समाज और युवाओं की सफलता की बुनियादी नींव है। इसलिए लोगों को अपने बच्चों में बचपन से ही मुद्रित किताब पढऩे के प्रति दिलचस्पी पैदा करनी होगी। बहरहाल, पठनीयता का यह संकट केवल स्थानीय नहीं, बल्कि वैश्विक है।

जिन पश्चिमी देशों ने कभी डिजिटल कक्षाओं में भारी निवेश किया था, वे अब अत्यधिक स्क्रीन समय, सीखने के कमजोर नतीजों और ध्यान भटकने के परिणामों के कारण पारंपरिक तरीकों की ओर लौट रहे हैं। पुस्तकें पहली मित्र बन रही हैं। स्वीडन ने बच्चों में कलम, कागज और मुद्रित पाठ्यपुस्तकों को पुनर्जीवित करने के लिए हाल ही भारी-भरकम निवेश किया है। जबकि, नॉर्वे ने तो प्रारंभिक शिक्षा में टैबलेट का उपयोग सीमित कर दिया है। वैश्विक स्तर पर उभरती यह आम सहमति हमें याद दिलाती है कि तकनीक कभी मानवीय जुड़ाव का विकल्प नहीं हो सकती। बच्चों को स्वाइप करने से पहले कलम पकडऩा और टाइप करने से पहले चित्र बनाना सीखना होगा। कुल मिला कर घर-परिवार में सभी सदस्यों को खास तौर से बच्चों को छपी हुई किताबें पढऩे की आदत विकसित करनी होगी, ताकि तकनीक और मानवीय मूल्यों के बीच रचनात्मक संतुलन स्थापित किया जा सके। डिजिटल भटकाव को रोकने का यही कारगर तरीका है।

Published on:
09 Jun 2026 07:51 pm