
केंद्र सरकार ने ई-85 और ई-100 जैसे उच्च एथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन पर चलने वाले फ्लेक्स फ्यूल वाहनों के लिए नियमों का रास्ता साफ कर दिया है। ई-100 (पूरी तरह फ्लेक्स फ्यूल) के लिए विशेष रूप से डिजाइन और प्रमाणित वाहन ही इसका इस्तेमाल कर सकेंगे। यानी यह फैसला आज सड़कों पर दौड़ रही पेट्रोल कारों को ई-100 पर चलाने का आदेश नहीं, बल्कि भारत के भविष्य के वाहन और ईंधन बाजार की दिशा तय करने वाला कदम है। भारत की कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम हो, विदेशी मुद्रा बचे और किसानों को कृषि उपज के लिए नया बाजार मिले- इन तीनों उद्देश्यों को एथेनॉल नीति एक साथ साधती है। पेट्रोल में एथेनॉल का मिश्रण 2013-14 के करीब 1.5 प्रतिशत से बढ़कर 2025-26 में 20 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। ऐसे में, एक सवाल को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि इतनी बड़ी मात्रा में एथेनॉल बनाने के लिए कच्चा माल कहां से आएगा?
एथेनॉल कोई खनिज पदार्थ नहीं, कृषि आधारित मक्का, गन्ना, शीरा, चावल और दूसरे कृषि उत्पाद इसके प्रमुख स्रोत हैं। सरकार ने यह भी माना है कि एथेनॉल नीति में पानी की उपलब्धता, खाद्य सुरक्षा और किसानों के हितों का संतुलन जरूरी है। यहीं से चिंता का अगला सिरा जुड़ता है। मक्का भोजन, पशुचारे और खाद्य उद्योग के लिए भी जरूरी है। चावल करोड़ों लोगों की थाली का हिस्सा है और गन्ने का संबंध शक्कर की उपलब्धता से है। यदि ईंधन के लिए इन फसलों की मांग बहुत तेजी से बढ़ी तो क्या आम उपभोक्ता के लिए उनकी कीमत और उपलब्धता पर दबाव नहीं आएगा? यदि भविष्य में घरेलू उत्पादन ईंधन और खाद्य- दोनों जरूरतें पूरी करने के लिए पर्याप्त नहीं हुआ तो क्या होगा? क्या तब मक्का या दूसरे कृषि उत्पादों का आयात बढ़ाना पड़ेगा? दूसरी व्यावहारिक बात यह है कि अधिक मांग होने पर कृषि उत्पाद बिना जीएम बीजों के तैयार नहीं हो सकते। यह हमारे लिए नुकसानदायक ही है, जो किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। अमरीका जैसे देश कृषि उत्पादों और एथेनॉल के बड़े उत्पादक हैं। आज भारत ईंधन-एथेनॉल के लिए आयात पर निर्भर नहीं है, लेकिन भविष्य में घरेलू फीडस्टॉक की कमी पैदा हुई तो ऐसी निर्भरता का दबाव पैदा होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
तब सवाल होगा- क्या हमने एक आयात कम करके दूसरे आयात का रास्ता खोल दिया? असली आत्मनिर्भरता तब होगी जब ईंधन के विकल्प के साथ उसके कच्चे माल की उपलब्धता भी टिकाऊ हो और उसकी कीमत आम आदमी की थाली पर न पड़े। भारत को एथेनॉल से पीछे हटने की जरूरत नहीं। जरूरत इस बात की है कि ई-100 की महत्वाकांक्षा के साथ खाद्य सुरक्षा, जल सुरक्षा, कृषि उत्पादन और उपभोक्ता हितों की सुरक्षा की गारंटी भी उतनी ही मजबूत हो। देश के वाहन ईंधन के लिए आत्मनिर्भर हों, लेकिन इसकी कीमत देश की थाली को न चुकानी पड़े- नीति की सफलता इसी कसौटी पर तय होगी।