पिछले कुछ महीनों में कई घटनाओं ने भारत की चिंताएं बढ़ाई थीं। अमरीकी टैरिफ नीति ने भारतीय निर्यात को प्रभावित किया, पाकिस्तान के साथ वाशिंगटन की सक्रियता बढ़ी, चीन के प्रति ट्रंप प्रशासन का रवैया अपेक्षाकृत नरम दिखा और ईरान संकट पर भी दोनों देशों के दृष्टिकोण में अंतर सामने आया। ऐसे में रूबियो की यात्रा एक तरह से ‘डैमेज कंट्रोल’ मिशन बन गई।
के.एस. तोमर
सामरिक मामलों के स्तंभकार एवं वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक
अमरीकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो की भारत यात्रा ऐसे समय हुई, जब भारत-अमरीका संबंधों में एक प्रकार की असहजता दिखाई दे रही है। औपचारिक रूप से इसे इंडो-पैसिफिक सहयोग और क्वाड ढांचे को मजबूत करने की यात्रा बताया गया, लेकिन वास्तविक उद्देश्य इससे कहीं बड़ा था- राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में दोनों देशों के बीच पैदा हुई रणनीतिक दूरी को कम करना और भारत को यह भरोसा दिलाना कि वाशिंगटन अब भी नई दिल्ली को एशिया में अपनी प्रमुख साझेदार शक्ति मानता है।
पिछले कुछ महीनों में कई घटनाओं ने भारत की चिंताएं बढ़ाई थीं। अमरीकी टैरिफ नीति ने भारतीय निर्यात को प्रभावित किया, पाकिस्तान के साथ वाशिंगटन की सक्रियता बढ़ी, चीन के प्रति ट्रंप प्रशासन का रवैया अपेक्षाकृत नरम दिखा और ईरान संकट पर भी दोनों देशों के दृष्टिकोण में अंतर सामने आया। ऐसे में रूबियो की यात्रा एक तरह से ‘डैमेज कंट्रोल’ मिशन बन गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी बातचीत में ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, सप्लाई चेन और नई तकनीकों पर चर्चा हुई, लेकिन असली चिंता यह थी कि कहीं भारत यह निष्कर्ष न निकाल ले कि अमरीका की प्राथमिकताएं बदल रही हैं। रूबियो ने बार-बार कहा कि ‘इंडो-पैसिफिक रणनीति में भारत अमरीका की आधारशिला है।’ यह केवल कूटनीतिक बयान नहीं था, बल्कि भारत की बढ़ती आशंकाओं को शांत करने की कोशिश थी। ट्रंप की हालिया बीजिंग यात्रा और चीन के साथ संवाद ने नई दिल्ली में यह सवाल खड़ा किया कि क्या अमरीका अंतत: चीन के साथ समझौते की राह तलाश रहा है? जबकि भारत से अपेक्षा की जा रही है कि वह एशिया में चीन के संतुलन की भूमिका निभाता रहे। दूसरी ओर, ईरान संकट के दौरान पाकिस्तान के साथ अमरीकी संपर्क बढऩे से भारत में पुरानी आशंकाएं फिर उभरीं कि वाशिंगटन कहीं दक्षिण एशिया में फिर से ‘हाइफनेशन’ नीति की ओर तो नहीं लौट रहा।
रूबियो ने इन्हीं आशंकाओं को कम करने के लिए कई प्रतीकात्मक संकेत दिए। उन्होंने कहा कि विदेश मंत्री बनने के बाद उनकी पहली बैठक क्वाड से जुड़ी थी। उन्होंने मोदी को व्हाइट हाउस आने का निमंत्रण भी दिया। इन संदेशों का मकसद स्पष्ट था। हालिया तनावों के बावजूद अमरीका भारत को अपनी एशियाई रणनीति का केंद्र मानता है। इस यात्रा में ऊर्जा कूटनीति सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू बनकर उभरी। पश्चिम एशिया संकट और होर्मुज जलडमरूमध्य में अस्थिरता ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को सीधे प्रभावित किया है। भारत अपनी 80 प्रतिशत से अधिक ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, इसलिए तेल आपूर्ति में व्यवधान का असर सीधे महंगाई और अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। रूबियो ने इस संकट के बीच अमरीकी ऊर्जा निर्यात को भारत के लिए विकल्प के रूप में पेश किया। उन्होंने कहा कि अमरीकी तेल और गैस भारत की ऊर्जा आपूर्ति को विविध बना सकते हैं। हालांकि रूबियो का यह बयान कि अमरीका ईरान को ‘वैश्विक ऊर्जा बाजार को बंधक’ नहीं बनाने देगा, भारत के लिए एक जटिल संकेत भी था। भारत ने हमेशा ईरान के साथ संतुलित संबंध बनाए रखे हैं, क्योंकि चाबहार बंदरगाह जैसी रणनीतिक परियोजनाएं और ऊर्जा हित उससे जुड़े हैं। इसलिए नई दिल्ली के सामने चुनौती यह है कि वह अमरीका के साथ साझेदारी भी बनाए रखे और पश्चिम एशिया में अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता भी कायम रखे। नई दिल्ली में विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ उच्चस्तरीय वार्ता के बाद मार्को रूबियो ने कहा कि भारत-अमरीका संबंधों की गति कमजोर नहीं पड़ी है और आने वाले वर्षों में यह साझेदारी और अधिक मजबूत होकर उभरेगी।
उन्होंने उम्मीद जताई कि लंबे समय से लंबित द्विपक्षीय व्यापार समझौता जल्द संपन्न होगा। जयशंकर ने क्षेत्रीय तनावों के बीच समुद्री व्यापार के निर्बाध संचालन के प्रति भारत के समर्थन को दोहराया। रूबियो की यात्रा क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक से ठीक पहले हुई, इसलिए इसका सामरिक महत्त्व और बढ़ गया। भारत, अमरीका, जापान और ऑस्ट्रेलिया वाला क्वाड इंडो-पैसिफिक में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने का प्रमुख मंच बन चुका है। हालांकि हाल के महीनों में शीर्ष स्तर की बैठकों का न होना यह संकेत दे रहा था कि क्वाड की गति कमजोर पड़ रही है। फिर भी दोनों देशों के बीच कई बुनियादी मतभेद हैं। व्यापार सबसे बड़ा विवाद है।
भारत स्थिर टैरिफ व्यवस्था चाहता है, जबकि अमरीका अपने कृषि और औद्योगिक उत्पादों के लिए अधिक बाजार पहुंच मांग रहा है। रूस से भारत की ऊर्जा और रक्षा निर्भरता भी वाशिंगटन को असहज करती है। एच-1बी वीजा और ग्रीन कार्ड नियमों में सख्ती ने भारतीय पेशेवरों और छात्रों में नाराजगी पैदा की है। चीन के लिए यह यात्रा स्पष्ट संदेश थी कि अमरीका भारत को एशिया में अहम साझेदार मानता है। तकनीक, समुद्री सुरक्षा और सप्लाई चेन में भारत-अमरीका सहयोग सीधे चीन की रणनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं को प्रभावित करता है। हालांकि बीजिंग यह भी देख रहा है कि ट्रंप प्रशासन चीन के साथ संवाद बनाए रखने में रुचि रखता है। अंतत: रूबियो की यात्रा ने भारत-अमरीका संबंधों में आई ठंडक को कुछ हद तक कम जरूर किया, लेकिन बुनियादी विरोधाभास कायम है। दोनों देशों के संबंध रणनीतिक जरूरतों पर आधारित हैं। अमरीका को एशिया में चीन के संतुलन के लिए भारत चाहिए और भारत को तकनीक, निवेश तथा वैश्विक समर्थन के लिए अमरीका। आने वाले वर्षों में यही तय करेगा कि यह साझेदारी अस्थायी सामरिक समीकरण बनी रहती है या स्थायी रणनीतिक विश्वास में बदलती है।