हमें यह बुनियादी बात समझनी होगी कि तीर्थ यात्राएं कोई व्यावसायिक मनोरंजन या सैर-सपाटा नहीं हैं। आस्था की आड़ में व्यापार की अंधी दौड़ पर्यावरण और धर्म दोनों के लिए आत्मघाती है। समूचे उत्तराखंड में केवल चारधाम ही नहीं, बल्कि कैंची धाम और हरिद्वार में बढ़ती भीड़ ने पवित्र नदियों और शांत कस्बों को कूड़े का पहाड़ बना दिया है।

पंकज चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार
पहाड़ों की तपती धरती और मैदानों से उमड़ती बेतहाशा भीड़ आज हमारे पूरे हिमालयी तंत्र के लिए एक मूक चेतावनी बन चुकी है। जब मैदानी इलाकों के इंसानों ने अपने शहर और कस्बों को रहने लायक नहीं छोड़ा, तो वे गर्मी के प्रचंड प्रकोप से जूझने के लिए पहाड़ों की तरफ दौड़ पड़े। नतीजा यह है कि आज रोहतांग दर्रे से मंडी तक 22 किलोमीटर लंबा ट्रैफिक जाम लग रहा है, तो शिमला में दो लाख से अधिक वाहनों के पहुंचने से पूरा शहर हांफ रहा है। दिल्ली और उसके आसपास तपन क्या बढ़ी, मसूरी हो या मनाली, हर जगह भीड़ से हाहाकार मच गया। वादियों में वाहनों का धुआं इस कदर भर चुका है कि वहां सांस लेना भी दूषित हवा के कारण दूभर हो गया है। उधर उत्तराखंड में जारी चारधाम यात्रा पिछले दो वर्षों की तुलना में श्रद्धालुओं की संख्या में बेहद तेज वृद्धि देख रही है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 15 जून तक केदारनाथ में 12 लाख और बद्रीनाथ में 11 लाख से अधिक यात्री पहुंच चुके हैं। यह संख्या पिछले साल की तुलना में लगभग 38फीसदी अधिक है। 15 जून सोमवती अमावस्या के दिन कैंची धाम में महा जाम एक दिन पहले से लग गया। विशेष चिंता का विषय केदारनाथ और यमुनोत्री हैं, जहां पहुंचने के लिए पैदल यात्रा आवश्यक है। इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का पहुंचना ऐसे समय में और भी गंभीर हो जाता है जब राज्य पहले से ही एक्सट्रीम वैदर, आपदाओं, कानून व्यवस्था, भारी ट्रैफिक जाम, तीर्थयात्री सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, बढ़ते कचरे, पशुओं पर अत्यधिक दबाव तथा बुनियादी ढांचे की सीमाओं से जूझ रहा है।
आस्था के नाम पर विस्फोटक होती स्थिति
यह संकट केवल सैर-सपाटे तक सीमित नहीं है, बल्कि आस्था के नाम पर भी स्थिति विस्फोटक हो चुकी है। इस साल की चारधाम यात्रा के शुरुआती एक महीने के भीतर ही बीस लाख लोगों के दर्शन करने का सरकारी आंकड़ा सामने आया है। हमें ठंडे दिमाग से सोचना होगा कि नीचे से आने वाली गाडिय़ों के लिए सडक़ें भले ही चौड़ी कर दी गई हों, लेकिन केदारनाथ, यमुनोत्री, रोहतांग, जोशीमठ या श्रीनगर का मूल क्षेत्रफल या उनका प्रवेश द्वार तो नहीं बढ़ा है। नीचे से अनियंत्रित भीड़ आती है और ऊपर जाकर पहाड़ों को कचरा, वाहनों से निकलने वाली जहरीली गैसें और पानी का भीषण संकट दे देती है। यह बिल्कुल वैसा ही नजारा है, जैसा ये लोग अपने शहरों में छोड़ कर आए थे। इस बार तो पहाड़ जाम के साथ-साथ अभूतपूर्व तापमान से भी तप रहे हैं। देहरादून से लेकर मंडी और हमीरपुर तक पारा लगातार 42 डिग्री के पार जा रहा है। जलवायु परिवर्तन की यह मार अब बड़े स्तर पर हमारे सामने साफ दिख रही है।
शोर से ग्लेशियर असहज
नीम करोली बाबा का शांत और सुरम्य कैंची धाम न जाने कब व्यावसायिक पर्यटन स्थल में बदल गया, जहां अब उस शांत जगह पर हर हफ्ते लंबा जाम लगना एक आम बात हो गई है। दावे चाहे जितने भी किए जाएं, लेकिन इस अनियंत्रित भीड़ के कारण पहाड़ों में पॉलीथिन और प्लास्टिक का बेशुमार कचरा एकत्र हो रहा है, जो वहां के बुग्यालों यानी घास के मैदानों, जंगली जीवों और वनस्पतियों के लिए काल बन रहा है। अकेले जोशीमठ में बीते एक महीने के दौरान नगरपालिका ने तीन टन प्लास्टिक कचरा, जिसमें अधिकांश पानी की बोतलें थीं, एकत्र किया है। कभी विचार करें कि क्या पहाड़ के पास अपना इतना संसाधन है कि वह एक महीने में बीस लाख लोगों के लिए भोजन और पानी की व्यवस्था कर सके? जाहिर है कि यह सब वहां के नैसर्गिक जल स्रोतों और जंगलों पर एक जानलेवा बोझ है। रही-सही कसर केदारनाथ में हवाई सेवाओं ने पूरी कर दी है, जिसके शोर से हमारे ग्लेशियर असहज हैं और ईंधन से निकलने वाला कार्बन पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचा रहा है।
बढ़ रहीं प्राकृतिक आपदाएं
उत्तराखंड प्रशासन अकादमी में शहरी विकास विभाग की ओर से आयोजित एक कार्यशाला में वाडिया इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ वैज्ञानिकों ने स्पष्ट चेतावनी दी थी कि एक अध्ययन के अनुसार नैनीताल, मसूरी और शिमला जैसे पहाड़ी स्टेशनों की भार वहन क्षमता बहुत पहले ही खत्म हो चुकी है। मनाली का एक अध्ययन तो आंखें खोलने वाला है, जहां पिछले तीन दशकों में सीमेंटेड निर्माण क्षेत्र पांच प्रतिशत से बढकऱ पच्चीस प्रतिशत को पार कर गया है। वर्ष 1980 से 2023 के बीच वहां आने वाले लोगों की संख्या में छप्पन सौ प्रतिशत की अकल्पनीय वृद्धि दर्ज की गई है। इतने लोगों के लिए जब होटल बढ़े, तो पानी की मांग बढ़ी, जिससे धरती पर अत्यधिक दबाव पड़ा और भूगर्भ के अंदर कटाव शुरू हो गया। यही कारण है कि हिमाचल प्रदेश में बादलों का फटना, अत्यधिक बारिश, बाढ़ और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाएं लगातार बढ़ रही हैं।
पर्यावरण के अनुकूल निर्माण को ही बढ़ावा दिया जाए
जलवायु परिवर्तन पर हिमालय क्षेत्र में काम करने वाले विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि पहाड़ी शहरों में अब कंक्रीट के अंधाधुंध निर्माण से पूरी तरह परहेज करना होगा और वहां केवल पारंपरिक व स्थानीय सामग्री आधारित पर्यावरण के अनुकूल निर्माण को ही बढ़ावा देना चाहिए। नीति आयोग और गोविंद बललभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान की विभिन्न रिपोर्टों में भी कड़े शब्दों में कहा गया था कि बढ़ते पर्यटन के चलते हिल स्टेशनों पर दबाव बढ़ रहा है और जंगलों का विनाश इस क्षेत्र के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को तबाह कर रहा है। इन रिपोर्टों में लद्दाख के संरक्षित राष्ट्रीय उद्यानों और कश्मीर में अमरनाथ व माता वैष्णो देवी की यात्रा के संदर्भ में भी कूड़ा प्रबंधन और वन्यजीवों के आवास नष्ट होने पर गहरी चिंता जताई गई थी। हाल ही में कुफरी में भी बेलगाम भीड़ से उपजे संकट पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने कड़ी चेतावनी जारी की है। लेकिन विडंबना यह है कि ऐसी चेतावनियां और रिपोर्ट अक्सर दफ्तरों के लाल बस्ते में बंद रह जाती हैं और जमीन पर पहाड़ दरक कर कोहराम मचाते रहते हैं।
तीर्थ यात्राएं व्यावसायिक मनोरंजन या सैर-सपाटा नहीं
हमें यह बुनियादी बात समझनी होगी कि तीर्थ यात्राएं कोई व्यावसायिक मनोरंजन या सैर-सपाटा नहीं हैं। आस्था की आड़ में व्यापार की अंधी दौड़ पर्यावरण और धर्म दोनों के लिए आत्मघाती है। समूचे उत्तराखंड में केवल चारधाम ही नहीं, बल्कि कैंची धाम और हरिद्वार में बढ़ती भीड़ ने पवित्र नदियों और शांत कस्बों को कूड़े का पहाड़ बना दिया है। जून में जब पहाड़ों के जिले लू से कराहने लगते हैं, तब बाहरी लोगों की यह भीड़ वहां की बुनियादी सुविधाओं पर संकट खड़ा कर देती है। इस अनियंत्रित आमद से वहां के जल संसाधनों, सीवर व्यवस्था, भोजन, स्थानीय कृषि, बागवानी, पेड़-पौधों और वन्यजीवों के नैसर्गिक विकास में रुकावट आ रही है।
इस संकट का समाधान केरल जैसे राज्यों के कुछ चुनिंदा प्रकृति क्षेत्रों से सीखा जा सकता है, जहां प्रतिदिन आने वाले लोगों की संख्या और उनके रुकने का समय पूरी तरह सीमित है, जिससे प्रकृति को भी ठहर कर सांस लेने का अवसर मिलता है। सरकार को पहाड़ों पर पर्यटन के नाम पर हो रहे इस तमाशे को तुरंत नियंत्रित करना होगा। अगर पहाड़ों की एक निश्चित सीमा तय नहीं की गई, तो देश के ये सबसे खूबसूरत हिस्से भी जल्द ही दिल्ली और राजस्थान जैसे तपते हुए द्वीप बन जाएंगे। यदि ऐसा हुआ, तो गर्मियों में ही नदियां और ग्लेशियर तेजी से पिघलकर विनाशकारी बाढ़ लाएंगे और ऐसी प्राकृतिक आपदाएं खड़ी करेंगे जिन्हें संभालना इंसानी सभ्यता के बस में नहीं होगा। वक्तकी मांग है कि अब तो पहाड़ों को उनके हाल पर बख्श दिया जाए।