भारत, जो दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा तंबाकू उत्पादक और उपभोक्ता देश है, वहां स्थिति और भी भयावह है। हमारे देश में हर वर्ष लगभग 13 लाख 50 हजार से अधिक लोगों की मृत्यु केवल तंबाकू और धूम्रपान के कारण होती है। इसका अर्थ है कि प्रतिदिन लगभग 3,500 भारतीय इस धीमे जहर के कारण अपनी जान गंवा रहे हैं।
डॉ. विदुषी शर्मा
हर वर्ष 31 मई का दिन एक गंभीर चेतावनी और नई उम्मीद लेकर आता है- विश्व तंबाकू निषेध दिवस। वर्ष 1987 में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा आरम्भ किए गए इस अभियान का मुख्य उद्देश्य उस खामोश महामारी की ओर दुनिया का ध्यान आकर्षित करना है, जो प्रतिदिन हजारों जिंदगियों को निगल रही है। वर्ष 2026 में इस दिवस की थीम अत्यंत प्रासंगिक और विचारोत्तेजक रखी गई है- तंबाकू और निकोटीन की लत के आकर्षण को बेनकाब करना।’
यह थीम उस झूठे आवरण को हटाने का आह्वान करती है, जिसे तंबाकू उद्योग ने अपने जहरीले उत्पादों को आकर्षक दिखाने के लिए तैयार किया है। आज तंबाकू और निकोटीन उत्पादों को ग्लैमर, आधुनिकता और तनावमुक्ति के साधन के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जबकि वास्तविकता में यह मौत के सुनियोजित व्यापार का मुखौटा मात्र है। यह थीम हमें उस मुखौटे को उतार फेंकने और इस जानलेवा लत का डटकर मुकाबला करने के लिए प्रेरित करती है।
किशोरों में बढ़ रहा तंबाकू का सेवन
तंबाकू के इस छलावे को समझना आज के युवाओं के लिए सबसे अधिक आवश्यक है। ग्लोबल एडल्ट टोबेको सर्वे के आंकड़े एक बेहद चिंताजनक तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। भारत में तंबाकू सेवन शुरू करने की औसत आयु मात्र 18.7 वर्ष रह गई है। इससे भी अधिक गंभीर बात यह है कि 18 वर्ष से कम आयु के किशोरों, विशेषकर लड़कियों में सिगरेट और ई-सिगरेट का सेवन तेजी से बढ़ रहा है। तंबाकू कंपनियां नए-नए स्वादों, आकर्षक पैकेजिंग और भ्रामक विज्ञापनों के माध्यम से युवा पीढ़ी को अपने जाल में फंसा रही हैं। निकोटिन की लत इतनी चुपचाप मस्तिष्क पर कब्जा कर लेती है कि जब तक व्यक्ति इस ‘आकर्षण’ की सच्चाई समझ पाता है, तब तक वह बीमारी और निर्भरता के दलदल में गहराई तक धंस चुका होता है। यही कारण है कि वर्ष 2026 की यह थीम सीधे तौर पर इस कृत्रिम आकर्षण को उजागर करने पर बल देती है, ताकि युवा पीढ़ी तंबाकू को उसकी वास्तविकता में पहचान सके।
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा तंबाकू उत्पादक और उपभोक्ता
इस झूठे आकर्षण के पीछे की सच्चाई केवल दर्द, बीमारी और मृत्यु है। आंकड़े स्पष्ट रूप से बताते हैं कि विश्व स्तर पर प्रतिवर्ष लगभग 80 लाख लोग तंबाकू सेवन के कारण अकाल मृत्यु का शिकार हो जाते हैं। भारत, जो दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा तंबाकू उत्पादक और उपभोक्ता देश है, वहां स्थिति और भी भयावह है। हमारे देश में हर वर्ष लगभग 13 लाख 50 हजार से अधिक लोगों की मृत्यु केवल तंबाकू और धूम्रपान के कारण होती है। इसका अर्थ है कि प्रतिदिन लगभग 3,500 भारतीय इस धीमे जहर के कारण अपनी जान गंवा रहे हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, एक सिगरेट व्यक्ति के जीवन के लगभग 11 मिनट कम कर देती है। धूम्रपान करने वाले व्यक्ति, धूम्रपान न करने वालों की तुलना में औसतन 10 वर्ष पहले मृत्यु को प्राप्त होते हैं। भारत में होने वाले सभी प्रकार के कैंसर के लगभग 30 प्रतिशत मामलों के पीछे तंबाकू मुख्य कारण है, जबकि मुंह के कैंसर के 90 प्रतिशत से अधिक मामलों की जड़ भी यही है। इसके अतिरिक्त तंबाकू सेवन हृदय रोग, फेफड़ों की गंभीर बीमारियों, स्ट्रोक और मधुमेह के खतरे को कई गुना बढ़ा देता है।
धुआं भी सेहत के लिए हानिकारक
तंबाकू का धुआं और उसमें उपस्थित जहरीले रसायन आंखों के लिए भी अत्यंत हानिकारक हैं। धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों में मोतियाबिंद (कैटरेक्ट), ग्लूकोमा (काला मोतिया) तथा उम्र संबंधी मैक्यूलर डिजनरेशन (एएमडी) जैसी गंभीर नेत्र बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है, जो स्थायी अंधत्व का कारण बन सकती हैं। गर्भवती महिलाओं में तंबाकू सेवन गर्भपात अथवा नवजात शिशु में गंभीर विकारों का कारण बन सकता है। अत्यंत दुखद स्थिति यह है कि तंबाकू उत्पादों के साथ मिलने वाले चूने के पाउच बच्चों के हाथ लग जाते हैं। इनके फटने से रासायनिक चूना आंखों में चला जाता है, जिससे कई बच्चों की दृष्टि स्थायी रूप से प्रभावित हो चुकी है।
पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचा रहा तंबाकू
तंबाकू का यह खतरनाक आकर्षण केवल मानव शरीर को ही नहीं, बल्कि पर्यावरण और पृथ्वी को भी नुकसान पहुंचा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, विश्वभर में प्रतिवर्ष लगभग 35 लाख हेक्टेयर उपजाऊ भूमि का उपयोग केवल तंबाकू की खेती के लिए किया जाता है। इसके लिए लगभग 2 लाख हेक्टेयर वन क्षेत्र नष्ट कर दिए जाते हैं, जिससे व्यापक स्तर पर वनों की कटाई हो रही है। तंबाकू की खेती में अत्यधिक कीटनाशकों और रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग से मिट्टी की उर्वरता समाप्त होती जा रही है। तंबाकू उद्योग प्रतिवर्ष 84 मेगाटन से अधिक ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करता है। सिगरेट के बट्स, ई-सिगरेट से निकलने वाला माइक्रोप्लास्टिक और गुटखे के पाउच मिट्टी तथा जल स्रोतों को प्रदूषित कर रहे हैं। विडंबना यह है कि दुनिया के अधिकांश तंबाकू उत्पादक देश आर्थिक रूप से कमजोर हैं, जहां लोगों के पास भोजन के लिए पर्याप्त अनाज नहीं है, फिर भी वे उपजाऊ भूमि पर तंबाकू उगाने को विवश हैं। तंबाकू और बीड़ी उद्योग में कार्यरत गरीब एवं अशिक्षित मजदूर, जिनमें बाल श्रमिक भी शामिल हैं, इस उद्योग के सबसे बड़े और मूक पीडि़त हैं।
जागरूकता फैलाने की आवश्यकता
आज समय की मांग है कि हम सब मिलकर तंबाकू के इस जानलेवा आकर्षण का मुखौटा पूरी तरह उतार फेंकें। विश्व तंबाकू निषेध दिवस के अवसर पर हमें समाज में यह जागरूकता फैलानी होगी कि तम्बाकू कोई फैशन या तनाव दूर करने का साधन नहीं, बल्कि एक रासायनिक आतंकवाद है। धूम्रपान और तंबाकू छोडऩा निश्चित रूप से चुनौतीपूर्ण है, किन्तु दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ यह पूर्णत: संभव है। जो लोग इस लत से बाहर आना चाहते हैं, वे निकोटीन रिप्लेसमेंट थेरेपी का सहारा ले सकते हैं। उन परिस्थितियों और स्थानों से बचना, जहां तंबाकू सेवन की इच्छा उत्पन्न होती हो, अत्यंत उपयोगी उपाय है। तलब कम करने के लिए शुगर-फ्री च्यूइंग गम या हार्ड कैंडी का प्रयोग किया जा सकता है। धूम्रपान न करने वाले मित्रों के साथ समय बिताना, नियमित व्यायाम करना, प्रकृति के बीच साइकिलिंग करना, योग एवं संगीत को अपनाना ये सभी आदतें इस लत को हराने में अत्यंत सहायक सिद्ध हो सकती हैं।
आइए, विश्व तंबाकू निषेध दिवस 2026 की थीम को सार्थक बनाते हुए हम तंबाकू के हर रूप का बहिष्कार करने का दृढ़ संकल्प लें तथा आने वाली पीढिय़ों को एक स्वस्थ, सुरक्षित और तंबाकू-मुक्त भविष्य का उपहार दें।