अगर मुस्कराहट से घायल करना जुर्म होता तो शशि कपूर करोड़ों बार मुजरिम होते
- दीपक महान, वरिष्ठ टिप्पणीकार
अपार दौलत इकट्ठी करने के बजाए शशि कपूर ने समाज को ‘कलयुग’, ‘36 चौरंगी लेन’ और ‘जुनून’ जैसी सार्थक फिल्में और ‘पृथ्वी थिएटर’ जैसा रंगमंच प्रदान किया ताकि नवीन कलाकारों को सृजन के अवसर मिल सकें।
अगर मुस्कराहट से घायल करना जुर्म होता तो शशि कपूर करोड़ों बार मुजरिम होते। धर्मेन्द्र के अलावा, वो भारत के सब से खूबसूरत और जहीन फिल्मी कलाकार थे जिनकी सहज मुस्कान सुकून देती थी। शशि कपूर की अद्भुत कशिश का कारण उनमें पंजाबीयत और पाश्चात्य संस्कृति का वो अनूठा संगम था जिसमें बड़प्पन और सहयोग की भावना के साथ शराफत और कार्य निष्ठा कूट-कूट कर भरी थी। इसीलिए किसान से शहरी अधिकारी के सब किरदारों में वो जंचते थे और उन्होनें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी सशक्त पहचान बनायी।
निर्देशक की दृष्टी को साकार करने वाले शशि ने अगर बाल कलाकार के रूप में ‘आवारा’ में विस्मृत किया तो बाद में ‘वक्त’, ‘धर्मपुत्र’, ‘हाउस होल्डर’, ‘न्यू देल्ही टाइम्स’ आदि कई फिल्मों में निपुणता का एहसास दिलाया। प्रसिद्ध लेखक सागर सरहदी के अनुसार ‘उन्होनें कई फूहड़ फिल्में भी कीं तो सिर्फ इसलिए कि जरूरतमंद निर्माताओं के घर बस जाएं’ जबकि इस वजह से उनकी छवि और सेहत दोनों को नुक्सान पहुंचा। उनके हुनर की कई मिसालें हैं लेकिन एक आध उदाहरण से समझा जा सकता है कि वो कितने उच्च कोटि के कलाकार थे।
‘कभी कभी’ में जिस शालीन परन्तु खिलंदड़ अंदाज में उन्होनें धनाढ्य चरित्र निभाया वो सरहदी की लेखनी को गौरवान्वित कर गया और इसी तरह ‘दीवार’ में उनके गाम्भीर्य ने ही अमिताभ की उग्रता को ओजस्विता प्रदान की। पर इसके बावजूद ये समझना जरूरी है की दादा साहेब फाल्के पुरस्कार शशि कपूर को उनकी अदाकारी के लिए नहीं बल्कि सिनेमा और थिएटर में उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए दिया गया था।
एक युग दृष्टा की तरह, उन्होनें प्रतिबद्धता का साहस दिखाते हुए भारत में संवेदनशील सिनेमा और रंगमंच की जड़ें मजबूत कीं तथा अपार दौलत इकठ्ठी करने के बजाए, समाज को ‘कलयुग’, ‘36 चौरंगी लेन’ और ‘जुनून’ जैसी सार्थक फिल्में और ‘पृथ्वी थिएटर’ जैसा रंगमंच प्रदान किया ताकि नवीन कलाकारों को सृजन के अवसर मिल सकें।
पारंपरिक मूल्यांकन के हिसाब से शशि ने शायद गलती की होगी लेकिन इसीलिए आज उन्हें श्रद्धा और सम्मान से कला जगत के पितामह के रूप में देखा जाता है। कलात्मक सिनेमा और पृथ्वी थिएटर निसंदेह घाटे के सौदे हैं लेकिन अपने पिता की साधना और पत्नी जेनिफर की याद को जिंदा रखनें के लिए उन्होंने जिस तरह करोड़ों रुपए की जागीर देशवासियों को समर्पित की है, ये अपने आप में बेमिसाल है।