देश पिछले चौदह महीनों से फिल्म देखने का इंतजार कर रहा है लेकिन केन्द्र सरकार है कि ट्रेलर पर ट्रेलर दिखाए जा रही है। कहीं ऐसा ना हो कि पूरे पांच साल ट्रेलर देखने में ही निकल जाएं। प्रधानमंत्री मोदी ने बुधवार को अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना 'राष्ट्रीय कौशल विकास मिशनÓ की शुरुआत की। फिर आने वाले दिनों में करोड़ों नौकरियां मिलने का सपना दिखाया।
हर गरीब को सिपाही बताते हुए प्रधानमंत्री ने दस सालों की तरक्की का डिजाइन तैयार करने का आह्वान भी किया। ठीक उसी तरह से जैसे अब तक की सरकारें और के प्रधानमंत्री करते आए हैं। नौजवानों को रोजगार कौन-सी सरकार नहीं देना चाहती? सब चाहते हैं कि हर हाथ को काम मिले लेकिन क्या सिर्फ भाषणों से ऐसा हो पाएगा। मोदी सरकार के चौदह महीने पूरे होने जा रहे हैं।
लोकसभा चुनाव से पहले भी उन्होंने नौजवानों को रोजगार दिलाने के लम्बे-चौड़े वादे किए थे। अब उन्हें बताना चाहिए कि इन चौदह महीनों में सरकार ने कितने हाथों को काम मुहैया कराया और आने वाले समय में कब कितने लोगों को रोजगार उपलब्ध कराएगी। देश जानना चाहता है क्योंकि उम्मीदें परवान चढ़ी हैं और सभी को परिणाम का इंतजार है। नेहरू से लेकर मोदी तक, हर प्रधानमंत्री ने बढ़-चढ़कर सपने दिखाए हैं।
युवाओं को नौकरी देने के भी और महंगाई को जड़ से उखाड़ फेंकने के भी। लेकिन बीते 68 सालों में न बेरोजगारी कम हुई और न महंगाई। सरकारें आती हैं, सपनों के महल खड़े करती हैं और चली जाती हैं। कभी गठबंधन की मजबूरी में काम पूरे ना हो पाने का रोना तो कभी और बहाना। जनता भी भोली है, जल्दी सब कुछ भूल जाती है । लेकिन इस बार कहानी कुछ अलग है।
अब गठबंधन की मजबूरी नहीं है सरकार के सामने। जो कहा, सो करके दिखाना पड़ेगा। कोई भी बहाना चल नहीं सकता। 'कौशल विकास मिशनÓ के माध्यम से ही सही, देश के युवा को काम तो मिले। उसे लगे तो सही कि उसने जिस पर भरोसा किया उसने उसके भरोसे का मान रखा। सरकार में जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों को समझ लेना चाहिए कि आज का युवा परिणाम चाहता है।
लच्छेदार भाषण सुनना, सुनकर तालियां बजाना एक बात है लेकिन परिणाम अनुकूल नहीं निकले तो वही युवा तनकर सामने खड़ा भी हो जाता है। 'कौशल विकास मिशनÓ हो या इससे पहले के रोजगार मुहैया कराने के मिशन। जितने दावे किए गए थे, उसके आधे नतीजे भी आते तो युवा को काम के लिए यूं भटकना नहीं पड़ता। इसलिए केन्द्र की भाजपा सरकार अब फिल्म दिखाना शुरू करें तो शायद युवाओं को संतोष मिले।