
योगेश्वर, लीलाधर, सम्पूर्ण पुरुष, माखनचोर, चितचोर और... भगवान श्रीकृष्ण के भक्त उनके लिए ऐसे अनेक संबोधनों का प्रयोग करते हैं। दूसरी ओर दार्शनिक चर्चाओं में इस बात को अलग से और खासतौर पर रेखांकित किया जाता है कि समाजवादी चिंतक डॉ. राममनोहर लोहिया ने अपने लब्धप्रतिष्ठ निबंध 'राम, कृष्ण और शिव' में उन्हें राम-कृष्ण के साथ भारत में पूर्णता के तीन महान स्वप्नों में से एक बताया है। साथ ही कहा है कि भले ही ये तीनों स्वप्न एक दूसरे के विपरीत व अलग-अलग दिखते हैं। इनमें इस देश के रंग, सपने और उदासी एक साथ झलकते हैं।
उन्होंने आगे लिखा है कि 'राम ने निरंतर देव बनने की तो कृष्ण ने लगातार मनुष्य बनने की कोशिशें कीं और 'सम्पूर्ण पुरुष' बने। भगवान होते हुए भी वे हर पल एक साधारण और जीवंत मनुष्य की तरह पेश आए। विकट से विकट परिस्थितियों में भी उनके चेहरे पर मुस्कान और आनंद बने रहे। वे कभी जीवन से भागे नहीं और हर परिस्थिति का हंसते हुए अपनी खास तरह की कूटनीतिक दूरदर्शिता से सामना किया। इतना ही नहीं, जीवन के विरोधाभासों को भी आनंदपूर्वक नायकसुलभ गहराई से जिया।ऐसे में स्वाभाविक ही है कि उनके नायकत्व में आश्वस्त जनमानस उनके जीवन-दर्शन को उनकी लीलाएं माने और लीलाओं के अगणित व असीम होने के कारण उन्हें लीलाधर कहे।
कवि रहीम तो अपने एक दोहे में यह तक कह गए हैं कि गिरिधर (यानी एक अंगुली पर गोवर्धन पर्वत उठाने में समर्थ) होने के बावजूद कोई उन्हें कोमलगात समझे व मुरलीधर कहे तो भी वे 'कछु दुख मानत नाहिं।' इसलिए कि उनके निकट उनके जीवन को पूर्णता की ओर ले जाने में जितना योगदान उनके गिरिधर होने का है, उतना ही मुरलीधर होने का भी। बल्कि कुछ मायनों में मुरलीधर होने का कुछ ज्यादा ही योगदान है।
निस्संदेह, कई-कई युद्धों से आक्रांत व अशांत दुनिया के इन दिनों के हालात में उनको गिरिधर बनाने वाली गोवर्धनलीला की प्रेरणाएं हमारे ज्यादा काम की हैं क्योंकि वे अन्यायी व दमनकारी सत्ताधीशों के साथ अंधविश्वासों के भी प्रतिरोध की सीख देती हैं।इस लीला में किया गया देवताओं के राजा इंद्र का प्रतिरोध हमारी परंपरा का अब तक का 'सबसे क्रांतिकारी कदम' बताया जाता है। अकारण नहीं कि अनेक कृष्ण भक्त इस लीला को दमनकारी सत्ताओं और अंधविश्वासों के खिलाफ एक बहुत बड़ा वैचारिक और सामाजिक विद्रोह मानते हैं।पुराणों के अनुसार गोवर्धन लीला से पहले ब्रजमंडल (जिसमें मथुरा, वृंदावन, गोकुल, बरसाना, नंदगांव और गोवर्धन आदि शामिल हैं) के निवासी देवताओं के राजा इंद्र के कोप के डर के मारे उसकी पूजा किया करते थे। श्रीकृष्ण ने इस भय-आधारित पूजा को सीधी चुनौती दी और कहा कि पूजा तभी सच्ची पूजा कहलाती है, जब भयवश नहीं, बल्कि कृतज्ञता के भाव से की जाए। साथ ही उन्होंने उनको समझाया कि उनका जीवन इंद्र के बजाय गोधन, वनों और गोवर्धन पर्वत पर निर्भर है। इसलिए उनको इंद्र की पूजा की परंपरा तोडक़र गोवर्धन की पूजा शुरू करनी चाहिए।
गोवर्धन की यह पूजा वास्तव में प्रकृति व पर्यावरण की पूजा का पर्याय थी। लेकिन उसके कारण अपनी पूजा रुकने से कुपित इंद्र ने ब्रज को डुबोकर नष्ट कर देने के मंसूबे से उस पर प्रलयंकारी वर्षा शुरू कर दी तो हाहाकार मच गया और सवाल उठ खड़ा हुआ कि अब क्या हो?इस कठिन घड़ी में श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को इंद्र के अत्याचार से हार मानकर उसके सामने झुक जाने के बजाय गोवर्धन को ऊपर उठाकर अपने सिर पर छतरी की तरह तानकर अपना कवच बना लेने की सीख दी। फिर इस असंभव दिख रहे कार्य को अपनी सबसे छोटी अंगुली से संभव कर दिखाया और उन सबकी रक्षा की फिर तो उनकी शक्ति में आश्वस्त ब्रजवासियों ने उनके साथ मिलकर इंद्र का अहंकार टूटने का उत्सव भी मनाया।इस लीला का सामाजिक संदेश यह है कि कोई अन्यायी राजा, वह कितना भी शक्तिशाली और देवता ही क्यों न हो, अपनी शक्तियों व अधिकारों का दुरुपयोग करके प्रजा पर अत्याचार करने लगे तो हर हाल में उसका प्रतिरोध करना चाहिए और बिना सोचे-समझे रूढिय़ों की राह पर चलते व उनकी लकीर पीटते रहने के बजाय तर्क व कल्याण का मार्ग चुनना चाहिए।
इसी तरह रासलीला समेत उनकी दूसरी अनेक लीलाओं में कई गंभीर दार्शनिक संदेश हैं। महाभारत युद्ध के दौरान मोहग्रस्त होकर युद्धविरत हुए अर्जुन को भगवद्गीता के माध्यम से उन्होंने जो ज्ञान दिया, अपने जीवन व उपदेशों में कर्मयोग, भक्तियोग व ज्ञानयोग का जैसा अनूठा समन्वय प्रस्तुत किया और भोग व योग के बीच जैसा आदर्श संतुलन स्थापित करना सिखाया, उसने उनको सारे योगों का स्वामी यानी योगेश्वर बना दिया।उनके जन्म के संदर्भ में एक और बात बहुत दिलचस्प है। यह कि जिस भादों के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को वे इस संसार में आये, वह इस मायने में बहुत अभागा है कि उसके रहते आम तौर पर कोई भी शुभ कार्य नहीं होता। कारण यह कि सारे शुभ कार्यों के साक्षी माने जाने वाले भगवान विष्णु के बारे में मान्यता है कि भादों लगते ही वे शयन करने पाताल लोक चले जाते हैं।
इसलिए उसके कृष्ण पक्ष की अष्टमी आती है तो अपने सारे अभागपन व उसके सारे अंधेरे के बावजूद वह खूब उल्लसित होता है क्योंकि उसकी आंखों में भाई कंस के अत्याचार सहने को अभिशप्त और पति वसुदेव के साथ मथुरा के कारागार में बन्द माता देवकी का आठवें शिशु के रूप में श्रीकृष्ण को जन्म देना सजीव हो उठता है। वसुदेव का उन्हें कंस की क्रूरता से बचाने के लिए उफनाई हुई यमुना को पारकर गोकुल पहुंचाना भी!हां, उसे यह याद करके भी गर्व होता है कि श्रीकृष्ण की आह्लादिनी राधा और बड़े भाई बलराम का जन्म भी उसी की धूप-छांव यानी भादों में ही हुआ है। प्रसंगवश, जैसे श्रीकृष्ण की लीलाएं अनंत है, वैसे उनके भक्तों की परंपरा अगाध। जाति-धर्म व ऊंच-नीच के बंधनों से परे उनके भक्तों की संख्या भी बहुत बड़ी है। श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा है और लीलाएं तो ऐसी कि एक बार मन उनमें रम जाये तो 'वह सुख टरत न काहूँ मन तैं।'