स्मार्ट मीटर अनिवार्य नहीं, फिर भी उपभोक्ताओं पर दबाव और बिजली कंपनियों के घाटे का मुद्दा बना हुआ है।
जब किसी समस्या के समाधान का प्रयास नई समस्या पैदा करने लगे तब समझना चाहिए कि बिल्लियों के झगड़े में कोई बंदर आ गया है। बिजली के पुराने मीटरों को बदलकर स्मार्ट मीटर लगाने के मामले में भी ऐसा ही कुछ हो रहा है। केंद्रीय विद्युत मंत्री मनोहरलाल खट्टर का लोकसभा में यह बयान कि स्मार्ट मीटर अनिवार्य नहीं, जबरन इसे नहीं थोपा जा सकता और राज्यों की हकीकत में बड़ा अंतर है। मंत्री ने बताया कि विद्युत कंपनियां सात लाख करोड़ रुपए के घाटे में हैं, इसीलिए प्री-पेड स्मार्ट मीटर की व्यवस्था की गई है। बिजली कंपनियों को घाटे से उबारने के कदम के रूप में इसे उचित ठहराया जा सकता है। लेकिन, राज्य का बिजली विभाग नए मीटर के लिए दबाव बनाने लगे और स्मार्ट मीटर लगाने के बाद अनाप-शनाप बिल आने से उपभोक्ता परेशान हो जाएं तो क्या कहा जाएगा। इतना ही नहीं, विद्युत उपभोक्ता अधिकार नियम, 2020 में तो यह भी व्यवस्था कर दी गई है कि नए बिजली कनेक्शन केवल स्मार्ट मीटर के साथ ही दिए जाएंगे। स्थिति से जाहिर है कि अनिवार्य न होने के बावजूद स्मार्ट मीटर परोक्ष रूप से एक अनिवार्य व्यवस्था ही है।
इसमें दो राय नहीं कि ऐसे बिजली उपभोक्ताओं की बड़ी संख्या है जो बिल का भुगतान करने में आनाकानी करते हैं। आम उपभोक्ता ही नहीं, बड़ी-बड़ी कंपनियां और संस्थान भी इस कोशिश में रहते हैं कि भुगतान न करना पड़े। बिजली कंपनियों के घाटे की यह बड़ी वजह है। दूसरी वजह है राजनीति। चुनाव में बिजली बिल माफ करने का वादा कर सत्ता हासिल करने वाले दल कभी किसानों को तो कभी घरेलू उपभोक्ताओं को मुफ्त बिजली देते रहे हैं। केंद्रीय मंत्री बिजली कंपनियों के जिस घाटे की बात कह रहे हैं, उनमें ऐसे मुफ्त के वादों का कितना योगदान है, इस पर भी उन्हें विचार करना चाहिए। राजनीतिक दलों ने तो किसानों को बिजली के लिए भुगतान न करने की जैसे आदत लगा दी है। वे सोचते हैं कि चुनाव के समय बिल माफ हो ही जाएगा।
बिजली कंपनियों के घाटे का ठीकरा अक्सर आम घरेलू उपभोक्ताओं पर ही फोड़ा जाता है। औद्योगिक कंपनियों को प्री-पेड मीटर के लिए बाध्य नहीं किया जाता, लेकिन आम उपभोक्ताओं को इसके लिए मजबूर किया जा रहा है। स्मार्ट मीटर की व्यवस्था के पीछे की मंशा यदि वास्तव में बिजली कंपनियों को घाटे से उबारना है तो यह दोहरा बर्ताव क्यों? केंद्रीय मंत्री खट्टर ने जनवरी में ही बिजली वितरण कंपनियों के वर्ष 2024-25 में 2,701 करोड़ रुपए का लाभ कमाने की घोषणा की थी। उन्होंने यह भी गिनाया था कि मोदी सरकार से पहले वर्ष 2013-14 में इन कंपनियों को 67,962 करोड़ रुपए का घाटा हुआ था। सवाल यह भी कि जब वितरण कंपनियां लाभ में हैं तो बिजली उत्पादन करने वाली कंपनियां घाटे में क्यों हैं? आखिर बिजली उत्पादन कंपनियों को घाटे से उबारने के लिए ही तो बिजली वितरण कंपनियां बनाई गई थीं।