नदियों व नहरों का जो पानी जीवनदायी होना चाहिए उसी से मौत बंट रही हो तो चिंता बढऩा स्वाभाविक है। यह केवल पर्यावरणीय संकट ही नहीं बल्कि सेहत पर होने वाले खर्च को बढ़ाने वाला और उन परिवारों को गहरा घाव देने वाला है जिनका कोई निकटजन जहरीले पानी की वजह से कैंसर व दूसरी बीमारियों की चपेट में आकर साथ छोड़ जाता है।
कारखानों से निकलने वाला रासायनिक कचरा जानलेवा बनता जा रहा है, यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है। चिकित्सक लगातार चेताते रहे हैं कि दूषित पानी के लगातार सेवन से शरीर कैंसर पैदा करने वाले तत्वों को जमा कर सकता है। राजस्थान, उत्तरप्रदेश, पंजाब और हरियाणा के नहरी इलाकों में औद्योगिक अपशिष्ट का संकट अब भयावह रूप ले चुका है। नदियों में भी औद्योगिक अपशिष्ट छोडऩे से नदी किनारे बसे इलाकों में कैंसर व दूसरी घातक बीमारियों का खतरा ज्यादा बढ़ गया है। चिंता की बात यह है कि नदियों को प्रदूषण मुक्त करने के तमाम प्रयासों के बावजूद जहरीले पानी का नदियों व नहरों में प्रवाह बेरोकटोक जारी है।
उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन की मौजूदगी में राजस्थान के राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े ने जयपुर में आयोजित एक समारोह में पंजाब से राजस्थान आ रहे केमिकलयुक्त नहरी पानी को लेकर जो चिंता जताई है वह कमोबेश ऐसी सभी नदियों व नहरों से जुड़ी हैं। कैंसर सवाईवर्स डे पर आयोजित इस कार्यक्रम में राज्यपाल बागड़े ने इस संकट को लेकर पंजाब के राज्यपाल को पत्र लिखने की बात भी कही है। यह भी सच है कि हरियाणा से लेकर राजस्थान और उत्तरप्रदेश से लेकर मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में जनप्रतिनिधि लगातार राज्यों की विधानसभाओं और लोकसभा में जानलेवा जहरीले पानी को लेकर चिंता जता चुके हैं। ‘पत्रिका’ ने तो काफी समय पहले से ही नहरी जल प्रदूषण से घातक बीमारियों के खतरों को लेकर मुहिम चला रखी है। सवाल सिर्फ नदियों व नहरों के पानी के सेवन से जुड़े खतरों का ही नहीं बल्कि इससे पैदा होने वाले खाद्यान्न व सब्जियों के जहरीले होने का भी है। नदियों व नहरों का जो पानी जीवनदायी होना चाहिए उसी से मौत बंट रही हो तो चिंता बढऩा स्वाभाविक है। यह केवल पर्यावरणीय संकट ही नहीं बल्कि सेहत पर होने वाले खर्च को बढ़ाने वाला और उन परिवारों को गहरा घाव देने वाला है जिनका कोई निकटजन जहरीले पानी की वजह से कैंसर व दूसरी बीमारियों की चपेट में आकर साथ छोड़ जाता है। औद्योगिक इकाइयां अपना अपशिष्ट सीधे पानी में न छोड़ें, इसके लिए सख्त कानून-कायदे बने हुए हैं। अपशिष्ट शोधन संयंत्र की अनिवार्यता भी है। लेकिन चिंताजनक तथ्य यह है कि इनकी अनदेखी हर स्तर पर होती रही है। औद्योगिक विकास होना चाहिए इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन मानव जीवन इससे ज्यादा महत्वपूर्ण है। यदि नहरों में बहता पानी शुद्ध नहीं हो तो बीमारियां विकराल रूप लेती ही रहेंगी।
यह जनस्वास्थ्य से जुड़ा अत्यंत गंभीर संकट है जिसके समाधान के हर स्तर पर प्रयास जरूरी हैं। जल की गुणवत्ता की नियमित रूप से जांच तो हो ही, इसे प्रदूषित होने से रोकने के लिए उद्योगों को दूषित जल के ट्रीटमेंट की व्यवस्था कराने के निर्देश देने होंगे। लोगों को तो जागरूक होना ही है।