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ताकि उपयोग अवधि के बाद सोलर पैनल न बनें पर्यावरणीय संकट

भारत भी इस चुनौती से अछूता नहीं रहेगा।सोलर पैनलों में कांच, सिलिकॉन, एल्युमिनियम, तांबा, चांदी और विभिन्न रासायनिक पदार्थ होते हैं।

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May 20, 2026
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मिलिंद कुमारशर्मा, (एम.बी.एम. विवि में प्रोफेसर) सह लेखक खुशबू शाह व ललित ज्याणी, (नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में कार्यरत)

भारत में पिछले एक दशक में सौर ऊर्जा के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई है। राष्ट्रीय सौर मिशन के बाद देश ने तेजी से सोलर ऊर्जा क्षमता बढ़ाई है। राजस्थान, गुजरात और तमिलनाडु जैसे राज्यों में बड़े सोलर पार्क स्थापित हुए हैं। सरकारी प्रोत्साहन और निजी निवेश ने सौर ऊर्जा को भारत की ऊर्जा नीति का महत्त्वपूर्ण हिस्सा बना दिया है। किंतु इस विकास के बीच एक बड़ा प्रश्न उभर रहा है-जब ये सोलर पैनल अपनी उपयोग अवधि पूरी कर लेंगे, तब उनका क्या होगा?


रीसाइक्लिंग में छिपे हैं नए आर्थिक अवसर

भारत में शुरुआती दौर में लगाए गए कई सोलर प्लांट अब अपने उपयोगी जीवनकाल के अंतिम चरण में पहुंच रहे हैं। आने वाले वर्षों में बड़ी मात्रा में निष्क्रिय सोलर पैनल निकलेंगे, जो नई पर्यावरणीय चुनौती बन सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय अक्षय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार वर्ष 2050 तक दुनिया में लगभग 7.8 करोड़ टन सोलर कचरा उत्पन्न हो सकता है। भारत भी इस चुनौती से अछूता नहीं रहेगा।सोलर पैनलों में कांच, सिलिकॉन, एल्युमिनियम, तांबा, चांदी और विभिन्न रासायनिक पदार्थ होते हैं। इनके वैज्ञानिक निस्तारण के अभाव में लेड और कैडमियम जैसे विषैले तत्व मिट्टी और भूजल को प्रदूषित कर सकते हैं। इससे पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य दोनों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। आज सौर ऊर्जा को 'हरित ऊर्जा' कहा जाता है, लेकिन यदि समय रहते सोलर कचरे के प्रबंधन पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यही तकनीक भविष्य में पर्यावरणीय संकट का कारण बन सकती है। हालांकि यह चुनौती एक बड़ा आर्थिक अवसर भी है। सोलर पैनलों में मौजूद सिलिकॉन, चांदी, एल्युमिनियम और तांबा जैसे मूल्यवान पदार्थों को पुनर्चक्रण के जरिए दोबारा प्राप्त किया जा सकता है। इससे कच्चे माल के आयात पर निर्भरता घटेगी और घरेलू विनिर्माण क्षेत्र को मजबूती मिलेगी। विशेष रूप से चांदी और सिलिकॉन की पुनप्र्राप्ति उत्पादन लागत कम करने में सहायक हो सकती है। 'आत्मनिर्भर भारत' के लक्ष्य को देखते हुए सोलर पैनल रीसाइक्लिंग सर्कुलर इकोनॉमी की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम बन सकते हैं।

सस्ती और पर्यावरण-अनुकूल तकनीक की जरूरत

वर्तमान में सोलर पैनलों की रीसाइक्लिंग के लिए मुख्यत: मैकेनिकल, थर्मल और केमिकल तकनीकों का उपयोग किया जाता है। मैकेनिकल प्रक्रिया में पैनलों को तोड़कर अलग-अलग पदार्थ निकाले जाते हैं, लेकिन धातुओं और सिलिकॉन की शुद्धता सीमित रहती है। थर्मल प्रक्रिया में उच्च तापमान से परतों को अलग किया जाता है, हालांकि इसमें जहरीली गैसों के उत्सर्जन का जोखिम रहता है। केमिकल प्रक्रिया से उच्च गुणवत्ता की रिकवरी संभव होती है, किंतु इसकी लागत अधिक और पर्यावरणीय जोखिम भी जुड़े रहते हैं। इसलिए ऐसी तकनीक की आवश्यकता है, जो कम लागत वाली, पर्यावरण-अनुकूल और बड़े स्तर पर उपयोग योग्य हो।

सख्त नियमों की जरूरत

भारत ने ई-वेस्ट प्रबंधन नियम, 2022 के माध्यम से सर्कुलर इकोनॉमी की दिशा में कदम बढ़ाया है, लेकिन सोलर पैनल कचरे के लिए अभी स्पष्ट नीति का अभाव है। यूरोप में 'एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी' के तहत कंपनियों को पैनलों के संग्रह और रीसाइक्लिंग की जिम्मेदारी निभानी होती है। ऑस्ट्रेलिया भी राष्ट्रीय सोलर पैनल रीसाइक्लिंग कार्यक्रम पर बड़े स्तर पर निवेश कर रहा है। भारत में भी ऐसी व्यापक नीति की आवश्यकता है, जिसमें निर्माताओं के लिए एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी अनिवार्य रूप से लागू हो। सरकार को रीसाइक्लिंग उद्योग को वित्तीय प्रोत्साहन देना चाहिए तथा पर्यावरणीय मानकों और रिकवरी क्षमता के स्पष्ट दिशा-निर्देश तय करने चाहिए।

अब समय आ गया है कि सोलर पैनलों को केवल उपयोग के बाद फेंकने योग्य उत्पाद नहीं, बल्कि पुन: उपयोग योग्य संसाधन के रूप में देखा जाए। भविष्य के पैनलों का डिजाइन ऐसा होना चाहिए, जिससे उन्हें पुनर्चक्रित किया जा सके। विश्वविद्यालयों, उद्योगों और स्टार्टअप्स को मिलकर नई रीसाइक्लिंग तकनीकों तथा एआइ आधारित रिकवरी सिस्टम पर काम करना होगा। भारत की सौर ऊर्जा क्रांति को टिकाऊ बनाने के लिए सोलर पैनलों के जीवनचक्र पर ध्यान देना होगा, अन्यथा भविष्य में यह बड़ा पर्यावरणीय और आर्थिक संकट भी बन सकता है।

Published on:
20 May 2026 05:19 pm
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