
दिल्ली के मालवीय नगर स्थित होटल-रेस्टोरेंट में लगी भीषण आग ने एक बार फिर देश के शहरी प्रशासन, भवन सुरक्षा व्यवस्था और सरकारी निगरानी तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस हादसे में 20 से अधिक लोगों की मौत तथा दर्जनों घायल हुए हैं। यह त्रासदी दुर्घटना नहीं, बल्कि लापरवाही, अनियमितताओं और प्रशासनिक विफलता का परिणाम है। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार आग इतनी तेजी से फैली कि लोगों को अपनी जान बचाने के लिए ऊपरी मंजिलों से छलांग लगाने पर मजबूर होना पड़ा। इससे साफ जाहिर है कि होटल में पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद होते, तो शायद इतनी बड़ी जनहानि टाली जा सकती थी।
चिंताजनक बात यह सामने आई है कि होटल के बेसमेंट में भी कमरे बने हुए थे लेकिन वहां पहुंचने तथा बाहर निकलने का केवल एक ही रास्ता था। इससे भी भयावह तथ्य यह है कि उस रास्ते पर बाहर से ताला लगा हुआ था। कल्पना कीजिए कि आग की लपटों और धुएं के बीच फंसे लोग बाहर निकलने के लिए संघर्ष कर रहे हों और एकमात्र रास्ता बंद हो। यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि मानव जीवन के प्रति घोर असंवेदनशीलता का उदाहरण है। हैरानी की बात यह भी है कि भवन में कोई वैकल्पिक आपातकालीन निकास मार्ग (इमरजेंसी एग्जिट) नहीं था। आग लगने की स्थिति में सुरक्षित निकासी किसी भी भवन सुरक्षा व्यवस्था का सबसे बुनियादी नियम है।
यदि यह व्यवस्था नहीं थी, तो संबंधित विभागों ने भवन को संचालन की अनुमति कैसे दी? यह सवाल केवल होटल प्रबंधन से नहीं, बल्कि उन सभी सरकारी एजेंसियों से भी पूछा जाना चाहिए जिनकी जिम्मेदारी ऐसे प्रतिष्ठानों की नियमित जांच और निगरानी करना है। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि होटल के पास फायर एनओसी भी नहीं थी।
ऐसे में यह मामला और गंभीर हो जाता है। फायर एनओसी के बिना इतने बड़े प्रतिष्ठान का संचालन यह दर्शाता है कि नियमों की खुलेआम अनदेखी की गई और प्रशासनिक तंत्र या तो सोता रहा या फिर उसने आंखें मूंद लीं। देश में हर बड़ी आग की घटना के बाद जांच समितियां बनती हैं, दोषियों पर कार्रवाई की घोषणा होती है, लेकिन कुछ समय बाद सब कुछ भुला दिया जाता है। नतीजा यह होता है कि अगली त्रासदी फिर किसी दूसरे शहर में दोहराई जाती है।
यह हादसा केवल मृतकों और घायलों की संख्या तक सीमित नहीं है, यह उस व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है जिसमें कागजों पर नियम तो मौजूद हैं, लेकिन उनके पालन की इच्छाशक्ति नहीं है। अब समय आ गया है कि जिम्मेदार अधिकारियों, भवन मालिकों और प्रबंधन के खिलाफ कठोर कार्रवाई हो। इसके साथ ही देशभर में होटलों, मॉल और अन्य भवनों की सुरक्षा व्यवस्था का व्यापक ऑडिट कराया जाना चाहिए। इन मौतों को महज एक दुर्घटना कहकर भुलाया नहीं जा सकता।