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कॉलेजियम और ‘सुप्रीम’ टकराव

केन्द्र सरकार केवल एक बार ही कॉलेजियम के नाम लौटा सकती है। यदि उसी नाम की अनुशंसा सुप्रीम कोर्ट फिर करता है तो केन्द्र के पास उसे स्वीकार करने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प शेष नहीं रहता।
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Updated: 26 Jun 2018, 9:26 AM IST
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- शिवकुमार शर्मा, कवि एवं न्यायविद्

केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की ओर से हाईकोर्ट जज के लिए भेजे गए तीन वकीलों के नाम फिर लौटा दिए। जिनके नाम लौटाए गए उनमें इलाहाबाद हाईकोर्ट के दो व जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के एक वकील का नाम था। केन्द्र ने यह सिफारिश दूसरी बार लौटाई है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के इन दो वकीलों के विरुद्ध शिकायतों को कॉलेजियम ने गंभीर नहीं माना था। इसी प्रकार कॉलेजियम ने जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट का जज बनाने के लिए वकील अहमद बेग के नाम की अनुशंसा की थी जिसे भी केन्द्र सरकार ने वापस लौटा दिया है।

इससे पहले उत्तराखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश केएम जोसफ को सुप्रीम कोर्ट जज के रूप में पदोन्नति का मामला भी कॉलेजियम और केन्द्र सरकार के बीच अटका हुआ है। लगता है कि जजों की नियुक्ति को लेकर केन्द्र सरकार अपनी इच्छा मुताबिक काम करना चाहती है। जिस तरह से इन नियुक्तियों को लेकर टकराव बढ़ता जा रहा है उससे लगता नहीं कि निकट भविष्य में कोई रास्ता निकल पाएगा। जस्टिस केएम जोसफ ने उत्तराखण्ड में लगाए गए राष्ट्रपति शासन को अवैध व संविधान के विपरीत घोषित करने का फैसला दिया था। सुप्रीम कोर्ट तक यह आदेश बहाल रहा था। इस वर्ष जनवरी में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जोसफ के नाम की अनुशंसा करते हुए केन्द्र सरकार को लिखा था कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में नियुक्ति दी जाए।

केन्द्र सरकार ने कई आपत्तियां लगा कर जोसफ का नाम लौटा दिया था। मई में सुप्रीम कोर्ट के पांच वरिष्ठ न्यायाधीशों की कॉलेजियम ने केन्द्र सरकार की आपत्तियों से असहमत होते हुए जोसफ के नाम की पुन: सिफारिश की। कानूनी प्रक्रिया के अनुसार केन्द्र सरकार केवल एक बार ही नाम लौटा सकती है। दूसरी बार, यदि उसी नाम की अनुशंसा सुप्रीम कोर्ट करता है तो केन्द्र सरकार के पास उस नाम को स्वीकार करने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प शेष नहीं रहता है। मई में जो निर्णय सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने लिया था, उसकी पत्रावली अभी तक केन्द्र सरकार को नहीं भेजी गई।

पिछले दिनों जस्टिस जे. चेलमेश्वर यह कह चुके हैं कि जस्टिस जोसफ के बारे में केन्द्र सरकार की आपत्तियों में कोई दम नहीं था। जो प्रकरण सामने आए हैं उससे साफ है कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम और केन्द्र सरकार के मध्य सब कुछ अच्छा नहीं चल रहा है। स्वस्थ लोकतंत्र में विधायिका व न्यायपालिका का यह टकराव ठीक नहीं।

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