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नौकरशाही में सुधार के नाम पर

ऐसा भी होता है कि अधिकारी की अभिरुचि कुछ और होती है और विभाग दूसरा। जैसे किसी की रुचि पढऩे-लिखने, संपादन में है, लेकिन अंकों के आधार पर विभाग मिला रेलवे या पुलिस।
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Sunil Sharma

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Updated: 25 Jun 2018, 10:15 AM IST

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UPSC Exam result

- प्रेमपाल शर्मा, लेखक व प्रशासक

खबर है कि केंद्र सरकार देश की उच्चतर नौकरशाही में सिविल सेवा परीक्षा से चयनित अधिकारियों के विभागों की आवंटन प्रक्रिया को बदलने पर विचार कर रही है। कार्मिक और अन्य मंत्रालयों से इस संबंध में सुझाव मांगे गए हैं। नौकरशाही में नियुक्तियों के संवेदनशील मामले में प्रस्तावित बदलाव में यूपीएससी द्वारा चयनित अधिकारियों को विभिन्न मंत्रालय या विभाग तीन महीने के आधारभूत पाठ्यक्रम उर्फ ट्रेनिंग में उनकी दक्षता, अभिरुचियों आदि को देखकर ही आवंटित किए जाएंगे।

दूसरे शब्दों में कहें तो यूपीएससी में जो प्राप्तांक हैं,उनके साथ शिक्षण के प्राप्तांक जोड़े जाएंगे और उसके बाद ही विभाग बांटे जाएंगे। हालांकि इस मामले में विचार अभी शुरू ही हुआ है, लेकिन केंद्र्र सरकार की कार्यशैली के मद्देनजर आशंकाओं का बाजार गरम हो चला है। डर है कि इस बदलाव के जरिए किसी खास विचारधारात्मक झुकाव को भी आरोपित किया जा सकता है।

सब जानते हैं कि ब्रिटिशकालीन इंडियन सिविल सर्विस(आइसीएस) का नया अवतार इंडियन एडमिनेस्ट्रेटिव सर्विस (आइएएस) है। इसके प्रमुख हिमायती और वास्तुकार सरदार पटेल हुए। उन्होंने इसे देश की अखंडता, एकता के लिए जरूरी स्टीलफ्रेम माना था। उन्होंने इसलिए इसकी स्वायत्तता,आजादी, निर्भीकता के लिए संविधान और सेवा-नियमों में प्रावधान जुड़वाए। भर्ती यूपीएससी से होती है और प्राप्त अंकों के आधार सरकार के लगभग पच्चीस विभागों में अधिकारी उपलब्ध कराए जाते हैं।

आजादी के बाद से ही सिविल परीक्षा में उम्र सीमा, पाठ्यक्रम, विषय, माध्यम आदि को लेकर समय-समय पर परिवर्तन होते रहे हैं। इनमें सबसे बड़ा परिवर्तन वर्ष 1979 में भारतीय भाषाओं के लिए दौलतसिंह कोठारी समिति की सिफारिशों के आधार पर किया गया था। इक्का-दुक्का परिवर्तनों के बावजूद वही अभी तक लागू है।

वर्ष 1986 में कार्मिक मंत्रालय ने संबंधित विभागों को अधिकार दिया कि वे प्रशिक्षण के अंकों के आधार पर सीनियरिटी बदल सकते हैं। रेल मंत्रालय जैसे बड़े विभागों में यह आज भी लागू है। लेकिन सीनियरिटी के बदलाव से नुकसान उठाने वालों के दर्जनों मुकदमे भी पिछले तीस वर्षों से हाईकोर्ट में लंबित है। प्रशिक्षण के नंबरों को जोडऩे के पीछे तत्कालीन सरकार का नजरिया था, कि अधिकारी मौज-मस्ती के बजाय निष्ठा और लगन से प्रशिक्षण पर ध्यान दें। नौकरशाही को और सक्षम, विवेकपूर्ण, तुरंत निर्णय लेने योग्य बनाने के उद्देश्य से अनेक मंत्रालयों ने अपने व्यावहारिक अनुभव, रिपोर्टों के आधार पर यह प्रश्न भी उठाया कि कई बार अधिकारी की अभिरुचि कुछ और होती है और विभाग दूसरा। जैसे किसी की रुचि पढऩे-लिखने, संपादन में है, लेकिन अंकों के आधार पर विभाग मिला रेलवे या पुलिस।

कई बार प्राथमिकता देते वक्त उम्मीदवार को उस विभाग के कामों के बारे में पता तक नहीं होता। ऐसे में कई अधिकारी अपने आप को ताउम्र मिसफिट पाते हैं व नुक्सान पूरे तंत्र का होता है। ऐसे अधिकारियों की संख्या लगातार बढ़ रही है जो हताशा में दो-चार साल बाद नौकरी छोड़ देते हैं या स्टडी लीव आदि लेकर बाहर निकल जाते हैं। कार्मिक मंत्रालय और संघ लोकसेवा आयोग की कई समितियों में योगेन्द्र अलघ आदि ने विभागों का बंटवारा प्रशिक्षण के बाद करने के सुझाव दिए।

लेकिन प्रशिक्षण के नंबरों को जोडक़र विभाग बांटने का मामला इतना आसान नहीं है और न इसे इतनी जल्दबाजी में किया जाना चाहिए। हमारे प्रशिक्षण संस्थानों- मसूरी, नागपुर, सिकंदराबाद से लेकर बड़ौदा तक- से भाई-भतीजावाद, लापरवाही व असंवेदनशीलता की खबरें आती हैं। प्रशिक्षण के दौरान परीक्षाएं भी इतनी चुस्त-दुरुस्त नहीं। यूपीएससी के एक-एक नंबर से जिंदगी का खेल बनता-बिगड़ता है, लेकिन आयोग की पारदर्शिता, वस्तुनिष्ठता और ईमानदारी पर कभी उंगली नहीं उठी। संविधानिक सुरक्षा के कारण यूपीएससी के सदस्य निष्पक्ष हो निडरता से काम करते हैं जबकि प्रशिक्षण केन्द्रों के दिए सीनियरिटी नंबरों पर तो आज भी सैकड़ों मामले लंबित हैं।

नौकरशाही और उसके रंग-ढंग में सुधार की जरूरत तो तुरंत है, लेकिन उसका यह रास्ता स्वीकार्य नहीं हो सकता। फिलहाल दो विकल्पों पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है। पहला, साक्षात्कार के समय ही विशेष प्रबंध मनोवैज्ञानिक परीक्षण के लिए हों जो उम्मीदवार की अभिरुचि, क्षमता को देखते हुए विभागों का क्रम सुझाए। इसे और आगे नहीं टाला जाना चाहिए।

दूसरा कदम, जो तुरंत संभव है, वह है प्रशिक्षण संस्थानों के पाठ्यक्रम में ऐसा बदलाव जो अधिकारियों में जनता के प्रति संवेदनशीलता, उत्तरदायित्व, पारदर्शिता, ईमानदारी व बराबरी के व्यवहार के साथ-साथ नवाबी-फिजूलखर्ची, आफिसर-लाइक क्वालिटी जैसे जुमलों से दूर रखे। उनके दिमाग में यह बैठाने की जरूरत है कि वे ब्रिटिश उपनिवेश के एजेंट नहीं, भारत गणराज्य के लोकसेवक हैं। नौकरशाही में यह बदलाव लाए बगैर देश में बदलाव असंभव है।