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टैरिफ वॉर: मजबूती के साथ रखनी ही होगी भारत को अपनी बात

— अभिजीत दास (भारतीय विदेश व्यापार संस्थान के डब्ल्यूटीओ अध्ययन केंद्र के पूर्व प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष)

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Apr 04, 2025

अमरीका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने अपनी पारस्परिक टैरिफ (आयात शुल्क) योजना की घोषणा कर दी है। यह पारस्परिक टैरिफ अंतरराष्ट्रीय व्यापार में काफी अनिश्चितता और उथल-पुथल पैदा कर सकता है। भारत के लिए 2७ प्रतिशत टैरिफ का यह बोझ ऐसे समय पर आया है, जब वह अमरीका के साथ एक बहु-क्षेत्रीय द्विपक्षीय व्यापार समझौते (बीटीए) पर गहन वार्ता कर रहा है। यह उल्लेखनीय है कि फरवरी 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमरीका यात्रा के दौरान दोनों देशों ने संयुक्त रूप से इन वार्ताओं पर सहमति जताई थी। ऐसे में सवाल यह है कि भारत को इन वार्ताओं में पारस्परिक टैरिफ के संदर्भ में किस प्रकार का रुख अपनाना चाहिए?

भारत को केवल अमरीका के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाने के लिए कोई रियायत नहीं देनी चाहिए। पिछले दो महीनों में अमरीका को दी गई कई रियायतों से स्पष्ट है कि ऐसी एकतरफा छूट अमरीका की मांगों को बढ़ाने की भूख को और बढ़ाएगी। बीटीए वार्ता केवल पारस्परिक शुल्क हटाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। भारत को अमरीका को दी जाने वाली हर रियायत के बदले अतिरिक्तबाजार पहुंच सुनिश्चित करनी चाहिए। कपड़ा, परिधान और चमड़ा उद्योग जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों में शुल्क रियायतें हासिल करना भारत के लिए महत्त्वपूर्ण होगा। भारत की रियायतें इस शर्त पर होनी चाहिए कि अमरीका भविष्य में पारस्परिक शुल्क जैसे उपाय नहीं करने का वचन दे। बीटीए में ऐसा प्रावधान शामिल होना चाहिए कि यदि अमरीका अपनी प्रतिबद्धताओं का पालन नहीं करता, तो भारत भी अमरीका के प्रति अपनी किसी भी प्रतिबद्धता को निभाने के लिए बाध्य नहीं होगा।

भारत को बीटीए का दायरा यथासंभव सीमित रखना चाहिए। इसे केवल वस्तु व्यापार तक ही सीमित रखा जाए अन्यथा, बौद्धिक संपदा अधिकार, सरकारी खरीद, डिजिटल जैसे मुद्दों वाले कई जटिल क्षेत्रों में अमरीका को रियायतें देनी पड़ सकती हैं। विशेष रूप से, पेटेंट के क्षेत्र में अमरीका की लंबित मांगों पर सावधानी से आगे बढऩा होगा, क्योंकि इससे जेनेरिक दवाओं के बाजार में प्रवेश में बाधाएं उत्पन्न हो सकती हैं। इस क्षेत्र में अमरीका की मांगों को स्वीकार करने से दवाओं की कीमतें लगातार बढ़ सकती हैं, जिससे सस्ती स्वास्थ्य सेवा की उपलब्धता एक सपना बनकर रह जाएगी। इससे जन औषधि केंद्र और आयुष्मान भारत जैसी प्रमुख पहलों को गंभीर धक्का लग सकता है। हाल ही संयुक्त राज्य व्यापार प्रतिनिधि द्वारा जारी 2025 की नेशनल ट्रेड एस्टीमेट रिपोर्ट में भारत की 'अत्यधिक कृषि सब्सिडी' को लेकर चिंता जताई गई है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की बाजार मूल्य समर्थन योजना घरेलू खाद्य सुरक्षा से कहीं आगे जा चुकी है और इसने भारत को चावल का शीर्ष वैश्विक निर्यातक बना दिया है। ऐसे में आशंका है कि अमरीका के कृषि व्यवसाय के दबाव में ट्रंप प्रशासन भारत की न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) योजना को खत्म करने की मांग कर सकता है। चूंकि एमएसपी योजना खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है, इसलिए भारत के लिए इस मांग को मानना लगभग असंभव होगा। अत: भारत को वार्ता में इस मुद्दे को शामिल करने का विरोध करना चाहिए।    चूंकि भारत में करोड़ों लोगों की आजीविका कृषि पर निर्भर है, इसलिए वार्ता में अनाज, चिकन, अधिकांश डेयरी उत्पाद, ताजे फल और सब्जियां  तथा सूखे मेवे जैसे कृषि उत्पादों को पारस्परिक शुल्क कटौती से बाहर रखा जाना चाहिए।

भारत का अमरीका के साथ कई अलग-अलग क्षेत्रों में जुड़ाव है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय व्यापार के क्षेत्र में जुड़ाव का प्रभाव किसी भी अन्य क्षेत्र के परिणाम की तुलना में अधिक व्यापक और अर्थव्यवस्था-व्यापी प्रभाव डालने वाला हो सकता है। इसलिए, यह आवश्यक है कि बीटीए वार्ताओं का परिणाम संतुलित हो, साथ ही भारत के घरेलू हितों की रक्षा और संवर्धन हो। अमरीका के साथ अन्य क्षेत्रों में लाभ हासिल करने के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भारत के हितों से समझौता नहीं किया जाना चाहिए। पारस्परिक आयात शुल्क विश्व व्यापार संगठन में अमरीका की प्रतिबद्धताओं का उल्लंघन करते हैं, इसलिए ये अवैध हैं। भारत को बीटीए वार्ता सहित विभिन्न मंचों पर अमरीका को यह बात कहने में संकोच नहीं करना चाहिए।

बीटीए वार्ता में इस बात पर बार-बार जोर देना चाहिए कि एक आर्थिक रूप से मजबूत और सशक्त भारत अमरीका के हित में होगा, खासकर चीन के खिलाफ एक संतुलन के रूप में। ऐसा न्यायसंगत और संतुलित द्विपक्षीय व्यापार समझौता, जो भारत के किसानों और श्रमिकों को कमजोर न करे और न ही सस्ती दवाओं तक पहुंच को प्रभावित करे, भारत और अमरीका दोनों के हित में होगा।

Published on:
04 Apr 2025 01:21 pm
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