ओपिनियन

भारत में नशे से नुकसान की वास्तविक तस्वीर अभी दूर

इस बीच कोविड आया, सामाजिक और डिजिटल जीवन बदला, मानसिक स्वास्थ्य की चुनौतियां बढ़ीं और कृत्रिम नशों का बाजार भी फैला।
3 min read
• •
Updated: 23 Oct 2026, 6:27 PM IST
drugs
drugs

भारत के पास पकड़े जा रहे नशीले पदार्थों का ताजा हिसाब है। नशा-मुक्ति अभियान कितने करोड़ लोगों तक पहुंचा, यह भी दर्ज है। लेकिन किशोरों और युवाओं के बीच आज कौन-सा नशा कितना फैल चुका है और उससे देश को कितना स्वास्थ्य, कितनी पढ़ाई, कितने कामकाजी वर्ष तथा कितनी उत्पादकता गंवानी पड़ रही है- इसकी नई समग्र राष्ट्रीय तस्वीर अब भी अधूरी है। चिंता इसलिए और बढ़ती है क्योंकि बीते वर्षों में नशे की दुनिया बहुत बदल चुकी है। एक समय चर्चा शराब, गांजा, अफीम और हेरोइन तक सीमित रहती थी; आज कृत्रिम नशीले पदार्थ, नशीली दवाओं का दुरुपयोग और नए मन:प्रभावी पदार्थ तेजी से चुनौती बन रहे हैं।

भारत में नशे की सबसे विस्तृत राष्ट्रीय तस्वीर एनडीडीटीसी-एम्स के उस सर्वेक्षण से आती है जो 2018 में हुआ और जिसकी रिपोर्ट फरवरी 2019 में प्रकाशित हुई। उसमें करीब 16 करोड़ शराब, 3.1 करोड़ कैनाबिस और 2.26 करोड़ ओपिऑइड उपयोगकर्ताओं का अनुमान लगाया गया था। करीब 77 लाख लोगों को ओपिऑइड के समस्याग्रस्त इस्तेमाल के कारण मदद की जरूरत बताई गई। 10 से 17 वर्ष के बच्चों और किशोरों में भी विभिन्न नशीले पदार्थों के इस्तेमाल का अनुमान सामने आया; इनमें करीब 40 लाख ओपिऑइड और 30 लाख इनहेलेंट उपयोगकर्ता शामिल थे। लेकिन यह आज के भारत का आंकड़ा नहीं है; यह 2018 में मापे गए भारत की तस्वीर है। तब स्कूल में पढऩे वाली पीढ़ी का बड़ा हिस्सा अब कॉलेज या रोजगार की उम्र में पहुंच चुका है। इस बीच कोविड आया, सामाजिक और डिजिटल जीवन बदला, मानसिक स्वास्थ्य की चुनौतियां बढ़ीं और कृत्रिम नशों का बाजार भी फैला। फिर भी हाल के संसदीय उत्तरों में राष्ट्रीय स्थिति बताने के लिए उसी 2018 के सर्वेक्षण का सहारा लिया जाता रहा है। अब सरकार ने एनडीडीटीसी-एम्स को दूसरा राष्ट्रीय सर्वेक्षण सौंपा है, जिसमें राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर तक विभिन्न नशीले पदार्थों तथा उनसे पैदा होने वाली समस्याओं का आकलन किया जाना है। यह आवश्यक कदम है, लेकिन इससे एक बड़ा प्रश्न खत्म नहीं होता- क्या तेजी से बदलते नशे को केवल कई वर्षों के अंतराल पर होने वाले बड़े सर्वेक्षणों से समझा जा सकता है?

यूरोप का अनुभव बताता है कि निगरानी लगातार भी हो सकती है। ईएसपीएडी लगभग तीन दशकों से मुख्यत: 15-16 वर्ष के विद्यार्थियों के बीच नशे और उससे जुड़े जोखिमों का लगभग हर चार वर्ष में अध्ययन करता है। 2024 में 37 देशों के 1,13,882 विद्यार्थी इसमें शामिल हुए। इसमें केवल यह नहीं देखा जाता कि कितने किशोर नशा करते हैं, बल्कि शुरुआत की उम्र, उपलब्धता और बदलते जोखिम भी दर्ज किए जाते हैं। नए मन:प्रभावी पदार्थों के लिए वहां समयपूर्व चेतावनी व्यवस्था भी है, ताकि नया खतरा फैलने के वर्षों बाद नहीं, उभरते समय पहचाना जा सके।गृह मंत्रालय के अनुसार 2024 में करीब 1,483 किलो कोकीन और 8,211 किलो एम्फेटामाइन-प्रकार के उत्तेजक पदार्थ जब्त हुए; 2022 में यही मात्रा क्रमश: करीब 218 और 1,224 किलो थी। यहां सावधानी जरूरी है- अधिक जब्ती का अर्थ उसी अनुपात में अधिक खपत नहीं है; यह बेहतर कार्रवाई, बड़ी खेप पकड़े जाने या तस्करी के रास्ते बदलने का परिणाम भी हो सकती है। फिर भी प्रश्न बना रहता है- एजेंसियां क्या पकड़ रही हैं, इसका ताजा हिसाब है; युवा क्या इस्तेमाल कर रहे हैं, उसका उतना ताजा राष्ट्रीय हिसाब क्यों नहीं? यही प्रश्न नशा मुक्त भारत अभियान से भी पूछा जाना चाहिए। 2020 में 272 संवेदनशील जिलों से शुरू हुआ अभियान अब पूरे देश में पहुंच चुका है। अगस्त 2026 तक 30.52 करोड़ से अधिक लोगों तक इसकी पहुंच हुई, जिनमें 11.87 करोड़ से अधिक युवा शामिल हैं। यह बड़ी उपलब्धि है, लेकिन अब अगला हिसाब पहुंच का नहीं, असर का होना चाहिए। क्या नशा शुरू करने की उम्र बदली? क्या किशोरों में ओपिऑइड और इनहेलेंट घटे? क्या नए कृत्रिम नशे बढ़े? उपचार के बाद कितने लोग नशे से बाहर टिके रहे? लड़कियों और स्कूल-कॉलेज से बाहर के युवाओं की स्थिति क्या है? संदेश कितनों तक पहुंचा, यह उपलब्धि है; उससे कितनों का जीवन बदला, यह असली परिणाम है। पर समस्या यहीं खत्म नहीं होती। यदि हमें युवाओं में नशे की ताजा तस्वीर नहीं मालूम, तो उससे होने वाली राष्ट्रीय क्षति का पूरा हिसाब भी कैसे बनेगा? नशे की कीमत केवल अस्पताल का बिल नहीं है।

उसमें उस विद्यार्थी की छूटी पढ़ाई, उस युवक की कमाई, परिवार की खर्च होती बचत और बीमारी, अक्षमता या असमय मृत्यु के कारण खोते कामकाजी वर्ष भी शामिल हैं। भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने की आकांक्षा रखता है। उसकी सबसे बड़ी ताकत युवा आबादी है, लेकिन जनसांख्यिकीय लाभांश केवल युवाओं की संख्या नहीं, उनके स्वस्थ, शिक्षित, कुशल और कामकाजी वर्षों का मूल्य है। इसलिए भारत को अब केवल यह नहीं गिनना चाहिए कि कितना नशा पकड़ा और कितनों तक संदेश पहुंचा। उसे यह भी जानना होगा कि खतरे को कितनी जल्दी पहचाना, कितने युवाओं को बचाया और जिसे रोक नहीं पाए, उसकी कीमत देश ने कितनी चुकाई।

डॉ. मुकेश शर्मा,(स्वतंत्र लेखक एवं स्तंभकार)

Updated on:
23 Oct 2026, 6:27 PM IST
Published on: