
भारत में हुआ ब्रिक्स शिखर सम्मेलन विश्व व्यवस्था में किसी नाटकीय बदलाव के साथ समाप्त नहीं हुआ, बल्कि उससे अधिक कठिन और महत्वपूर्ण उपलब्धि के साथ हुआ-ऐसे देशों के बीच सहमति बनी, जो अक्सर लगभग हर मुद्दे पर एक-दूसरे से असहमत होते हैं। नई दिल्ली घोषणा, जिसे बिना किसी आपत्ति के स्वीकार किया गया, आतंकवाद के सभी रूपों और अभिव्यक्तियों के प्रति शून्य सहनशीलता का स्पष्ट संदेश देती है। इसमें अप्रेल 2025 के पहलगाम हमले की स्पष्ट निंदा की गई। घोषणा में आतंकवाद के वित्तपोषण, भर्ती और सुरक्षित पनाहगाहों के खिलाफ कार्रवाई का आह्वान किया गया है। भारत के लिए यह एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धि है।
भारत ने अपनी पहली बड़ी परीक्षा पास कर ली है- उसने विरोधाभासी शक्तियों को एक मेज पर लाकर सर्वसम्मति हासिल की। अब कठिन परीक्षा शुरू होती है। ब्रिक्स को सहमति को सहयोग में बदलना होगा, जबकि भारत को चीन, रूस, ईरान और अमरीका के बीच संतुलन बनाए रखना होगा, बिना अपनी रणनीतिक स्वायत्तता से समझौता किए। यह घोषणा बदलती वैश्विक शक्ति-समीकरण की भी उतनी ही महत्वपूर्ण तस्वीर पेश करती है। इसमें एकतरफा शुल्कों और प्रतिबंधों की आलोचना की गई है, लेकिन ब्रिक्स को स्पष्ट रूप से अमरीका-विरोधी मंच में बदलने से बचा गया है। इसके पीछे भारत, चीन और रूस के बीच उभरता समीकरण दिखाई देता है, जबकि नई दिल्ली वाशिंगटन के साथ अपने स्वतंत्र संबंध बनाए हुए है। छह वर्षों से भारत-चीन संबंध अविश्वास और सीमा तनाव में फंसे हुए हैं और गलवान ने रणनीतिक संदेह को और गहरा कर दिया है। लेकिन नई दिल्ली में मोदी-शी बैठक दोनों देशों के बीच राजनीतिक संवाद फिर शुरू करने की सतर्क कोशिश का संकेत देती है। मतभेदों को विवाद नहीं बनने देने का दोनों नेताओं का संदेश उस समय और महत्वपूर्ण हो जाता है, जब ट्रंप के शुल्क संबंधी खतरों और वैश्विक अनिश्चितता के बीच दोनों देश प्रतिद्वंद्विता को स्थायी शत्रुता में बदलने से रोकना चाहते हैं।
मोदी-शी बैठक ने शिखर सम्मेलन को एक अतिरिक्त रणनीतिक आयाम दिया है। गलवान और वर्षों के सीमा तनाव के बाद दोनों नेताओं ने अब भारत और चीन को प्रतिद्वंद्वी के बजाय साझेदार बताया है तथा सीमा प्रश्न के निष्पक्ष, उचित और दोनों को स्वीकार्य समाधान के प्रति प्रतिबद्धता जताई है। इसका अर्थ यह नहीं है कि सीमा विवाद समाधान के करीब पहुंच गया है। इसका अर्थ केवल यह है कि दोनों सरकारों ने तय किया है कि इस विवाद को पूरे संबंधों को विषाक्त करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। अगला चरण सीमा प्रबंधन को संस्थागत बनाने, विश्वास बहाली और आर्थिक अड़चनों को कम करने का होना चाहिए। चीन एक बड़ा आर्थिक साझेदार और दीर्घकालीन सुरक्षा चुनौती दोनों है। प्रतिस्पर्धा का प्रबंधन भारत की कूटनीति की परीक्षा लेगा। पहलगाम का उल्लेख भारत की सबसे स्पष्ट उपलब्धि है। दूसरा लाभ भी उतना ही महत्वपूर्ण है- ब्रिक्स पश्चिम-विरोधी गुट नहीं बना। तीसरा, भारत ने वैश्विक दक्षिण के नेतृत्व के अपने दावे को मजबूत किया। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि घोषणा भारत के विरोधाभासों को समाप्त करने के बजाय उन्हें प्रबंधित करने की क्षमता को प्रदर्शित करती है। ईरान और संयुक्त अरब अमीरात, चीन और भारत, रूस और पश्चिमी देशों के साथ निकट संबंध रखने वाले देश एक ही दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर सके। यही ब्रिक्स की ताकत भी है और उसकी सीमा भी। यह घोषणा ट्रंप को विशेष रूप से पसंद नहीं आएगी, खासकर एकतरफा शुल्कों और प्रतिबंधों की आलोचना के कारण। वाशिंगटन स्थानीय मुद्राओं में लेन-देन व वैश्विक दक्षिण की अधिक स्वायत्तता पर ब्रिक्स के बढ़ते जोर को अमरीकी आर्थिक प्रभाव को कमजोर करने के प्रयास के रूप में देख सकता है। शिखर सम्मेलन अमरीका के खिलाफ भारत-चीन-रूस गठबंधन का रूप नहीं लेता। मोदी ने रणनीतिक स्वायत्तता पर जोर देकर चीन नीति को किसी तीसरे देश के निर्देश से संचालित होने से इनकार किया है।
चीन, रूस और अमरीका के संग एक साथ संवाद भारत को अधिक कूटनीतिक गुंजाइश देता है। पुतिन की मौजूदगी और मोदी के साथ उनकी मुलाकात भी महत्वपूर्ण थी। रूस भारत की रक्षा, ऊर्जा और रणनीतिक गणनाओं के लिए महत्वपूर्ण बना हुआ है, जबकि बीजिंग के साथ मॉस्को के बढ़ते करीबी संबंध भारत के लिए नई चुनौती पैदा करते हैं। भारत को रूस के साथ अपने संबंध बनाए रखते हुए रूस-पश्चिम टकराव में उलझने से बचना होगा। ईरान के साथ भारत का संवाद और महत्वपूर्ण होगा। यूरेशियाई संपर्क और ऊर्जा में ईरान की भूमिका तथा ब्रिक्स में उसकी सदस्यता नई दिल्ली को तेहरान के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने का एक और कारण देती है। बड़ा संदेश यह है कि भारत किसी एक खेमे को चुनने के बजाय सेतु बना रहा है। 2027 में चीन की ओर से ब्रिक्स की अध्यक्षता संभालने पर करीबी नजर रहेगी। बीजिंग के पास एजेंडा तय करने का अवसर होगा, लेकिन भारत की बनाई गई सहमति को बनाए रखने की जिम्मेदारी भी उसी पर होगी। ब्रिक्स एक बुनियादी विरोधाभास का सामना कर रहा है- उसके सदस्य सामूहिक रूप से मजबूत आवाज चाहते हैं, लेकिन उनकी भू-राजनीतिक सोच एक जैसी नहीं है। उनकी अर्थव्यवस्थाएं प्रतिस्पर्धा करती हैं, राजनीतिक व्यवस्थाएं अलग हैं और विभिन्न संघर्षों पर उनके रुख भी अलग-अलग हैं। विस्तार ने उसका प्रभाव बढ़ाया है, लेकिन जटिलता भी बढ़ाई है। आम सहमति घोषणाएं तैयार कर सकती है, लेकिन उन्हें लागू करना अधिक कठिन है।
स्थानीय मुद्रा में व्यापार, वैकल्पिक भुगतान प्रणालियां और वित्तीय सुधार के लिए शिखर सम्मेलनों की बयानबाजी नहीं, बल्कि व्यावहारिक तंत्र की जरूरत होगी। बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि ब्रिक्स मौजूदा व्यवस्था से असंतोष व्यक्त करने वाले मंच से आगे बढ़े। उसे व्यावहारिक विकल्प प्रस्तुत करने होंगे। छह वर्षों से भारत-चीन संबंध अविश्वास और सीमा तनाव में फंसे हुए हैं व गलवान ने रणनीतिक संदेह को और गहरा कर दिया है, लेकिन मोदी-शी बैठक राजनीतिक संवाद फिर शुरू करने की सतर्क कोशिश का संकेत देती है। मतभेदों को विवाद नहीं बनने देने का उनका संदेश उस समय और महत्वपूर्ण हो जाता है, जब ट्रंप के शुल्क संबंधी खतरे व वैश्विक अनिश्चितता दोनों देशों की प्रतिद्वंद्विता को स्थायी शत्रुता में बदलने से रोकने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
(वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक)