
अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र (इसरो) के वैज्ञानिकों और तकनीकी अधिकारियों के इस्तीफे या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति की नीति में सरकार की ओर से बदलाव यह संकेत देता है कि इस अहम संस्थान में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा। पिछले साल 100 से ज्यादा वैज्ञानिकों ने इसरो छोड़कर अंतरिक्ष विज्ञान क्षेत्र के नए स्टार्टअप की ओर रुख किया है। वीआरएस लेने वालों में विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र के लॉन्च वीकल मार्क-3 के परियोजना निदेशक विक्टर जोसेफ भी हैं। इसरो के पूर्व अध्यक्ष एस सोमनाथ भी अग्निकुल कॉस्मोस नामक स्टार्टअप से जुड़े हैं।
जाहिर है कि अंतरिक्ष क्षेत्र निजी कंपनियों के लिए खोलने के फैसले का असर अब दिखने लगा है। करीब 400 स्टार्टअप सक्रिय हो चुके हैं और देश की स्पेस इकोनॉमी 8.4 अरब डॉलर तक पहुंच चुकी है। इसरो पिछले कई दशकों से दुनियाभर में अपनी अपूर्व सफलताओं, किफायती मिशनों और तकनीकी आत्मनिर्भरता के लिए जाना जाता रहा है। वैज्ञानिक इस संस्थान को अलविदा करना चाहते हैं, तो इसके कारणों पर विचार करने की जरूरत है। अंतरिक्ष में निजी क्षेत्र के प्रवेश को ही नहीं, बदलती नीतियों और प्रोत्साहन की कमी को भी इसरो का आकर्षण कम होने की वजह माना जा रहा है। हाल के वर्षों में अर्थ ऑब्जर्वेशन और कम्युनिकेशन सैटेलाइट परियोजनाओं में कमी आई है।
क्योंकि, सरकार ने मंत्रालयों को अपनी जरूरत के सैटेलाइट खुद लॉन्च करने के लिए कहा है और मंत्रालयों को अपनी जरूरत का अहसास होने में समय लग रहा है। कई वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि विशेष प्रोत्साहन, परफॉर्मेंस बेस्ट इंसेटिव और विशेष सैलरी जैसी योजनाओं को वापस लेने से निजी क्षेत्रों के विशेष पैकेज का आकर्षण बढ़ गया है। बहरहाल, ताजा आदेश के बाद इसरो के वैज्ञानिकों के इस्तीफों या वीआरएस आवेदन पर अब संबंधित केंद्र प्रमुख कोई निर्णय नहीं कर पाएंगे। यह अधिकार अब मंत्रालय के पास चला गया है। लेकिन, क्या इतने से समस्या का समाधान हो जाएगा? क्या वैज्ञानिकों को जबरन इसरो में रोककर काम का बेहतर माहौल बनाया जा सकेगा? क्या स्पेस स्टार्टअप को इसका जिम्मेदार माना जाना चाहिए? कई सवाल हैं, जिनका जवाब ढ़ूंढना अभी बाकी है। इसमें कोई शक नहीं कि अंतरिक्ष क्षेत्र का बाजार अब काफी बढ़ा है और इसमें भारत की छलांग सिर्फ सरकारी धन के भरोसे नहीं लगाई जा सकती।
सरकार को ऐसी नीति बनानी होगी कि इस क्षेत्र में निजी निवेश लाने वाली संस्थाओं को 'शॉर्ट कट' अपनाने से रोका जा सके। निजी संस्थाएं इसरो के वैज्ञानिकों को अपनी ओर खींचने की बजाय स्वयं के बूते ऐसा माहौल बनाएं जहां काम करके नए-नए वैज्ञानिक उस तरह की ऊंचाई हासिल कर सकें जैसे इसरो ने लंबी अवधि में किया है। सार्वजनिक संस्थाओं की कीमत पर निजी संस्थाओं को फलीभूत करने का रास्ता देशहित में नहीं है।