व्यक्ति अपने आनंद के क्षण किसी भी भंगिमा में संभाले लेकिन मिथ्या मुस्कुराहट के मनोरोग को यदि अपने या अपने साथियों की जान का दुश्मन होने देगा तो इस प्रवृत्ति को शायद ही कोई संवेदनशील समाज स्वीकारेगा।
- अतुल कनक, लेखक
स्मार्ट फोन के प्रचलन के बाद जो प्रवृत्तियां हमारे जीवन का एक अभिन्न हिस्सा हो गई हैं, उनमें एक सेल्फी भी है। सेल्फी अर्थात अपना ही फोटो अपने ही द्वारा खींचा जाना। कतिपय लोग यह कहने में भी नहीं हिचकिचाते कि आदमी के अकेलेपन का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसे उत्साह के क्षणों में भी कोई फोटो खिंचावाने वाला साथी नहीं मिलता। जो भी हो, जीवन के महत्त्वपूर्ण क्षणों को कैमरे में कैद कर लेने का सुख शब्दातीत प्रतीत होता है। स्मार्टफोन ने फोटोग्राफी जैसे महंगे शौक को हर व्यक्ति के लिए सुलभ कर दिया है।
लेकिन कहते हैं कि अति हर चीज की बुरी होती है। अगस्त माह के प्रारंभ में ही सूरत के चर्चित लैक गॉर्डन में एक दंपती अपनी सेल्फी खींचने में इतने मशगूल हुए कि उन्हें पता ही नहीं चला और उनका नन्हा बेटा झील की तरफ चला गया और डूब गया। समय पर खैर-खबर नहीं लिये जाने के कारण बच्चे का प्राणांत हो गया। कुछ महीनों पहले चीन में ऐसा ही हादसा हुआ था जब स्वीमिंग पूल के किनारे बैठी मां सेल्फी लेने में मशगूल थी और उसका दस महीने का बेटा पूल में गहरे चला गया। इसी वर्ष मई में राजस्थान के गंगानगर के एक बहुमंजिला मॉल में एस्केलेटर पर चढक़र सेल्फी लेती हुई एक महिला की गोदी से उसकी दस महीने की बेटी फिसल गई और बुरी तरह घायल हो गई।
ये तो वो घटनाएं हैं जिनमें अपने अभिभावकों की लापरवाही का खमियाजा मासूम बच्चों को भुगतना पड़ा। वरना तो न जाने कितने लोग रोमांचक सेल्फी खींचने के प्रयास में ऊंचे स्थान से गिरे हैं या उमड़ती हुई नदियों के प्रवाह में समाए हैं। अपनी खुशी को कैमरे में कैद करना कोई अपराध नहीं है लेकिन विसंगति तब होती है, जब सेल्फी के चक्कर में लोग अपनी या अपने बच्चों की जान तक जोखिम में डाल देते हैं। सेल्फी खींचते हुए अक्सर लोग एक खास किस्म की मिथ्या मुस्कुराहट अपने चेहरे पर लाते हैं। अक्सर युवा मुंह दबाकर ‘ची’ बोलते हुए इस मुस्कुराहट की भंगिमा का सृजन करते हैं। कुछ युवतियां एक खास किस्म से अपने होठों को सिकोड़ती हैं, जिसे पाउच करना कहा जाता है।
व्यक्ति अपने आनंद के क्षण किसी भी भंगिमा में संभाले लेकिन मिथ्या मुस्कुराहट के मनोरोग को यदि अपने या अपने साथियों की जान का दुश्मन होने देगा तो इस प्रवृत्ति को शायद ही कोई संवेदनशील समाज स्वीकारेगा। आवश्यकता ऐसी मानसिकता को हतोत्साहित करने की है।