ओमान के तट के पास वाणिज्यिक टैंकरों पर ताजा अमरीकी हमला और उसमें भारतीय नाविकों की मौत व उनके लापता होने की घटना ने इस मुद्दे को भारत के लिए अत्यंत संवेदनशील बना दिया है। नई दिल्ली ने भी अमरीकी राजनयिक को तलब कर यह जता दिया कि भारत अब अपने नागरिकों की सुरक्षा में किसी तरह की लापरवाही पर चुप नहीं बैठेगा।

ईरान और इजराइल-अमरीका के बीच लंबा युद्ध एक तरह से दुनिया की परीक्षा ले रहा है। शांति के रखवालों को फिलहाल कोई समाधान नजर नहीं आ रहा क्योंकि, मध्य पूर्व और खाड़ी क्षेत्र में गहराता संघर्ष अब वैश्विक व्यापार और समुद्री सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश का यह बयान कि भारत व्यापारिक जहाजों पर होने वाले हमलों का कड़ा विरोध करता है, नई दिल्ली की बढ़ती चिंताओं और इस संकट के वैश्विक खतरों को रेखांकित करता है। ओमान के तट के पास वाणिज्यिक टैंकरों पर ताजा अमरीकी हमला और उसमें भारतीय नाविकों की मौत व उनके लापता होने की घटना ने इस मुद्दे को भारत के लिए अत्यंत संवेदनशील बना दिया है। नई दिल्ली ने भी अमरीकी राजनयिक को तलब कर यह जता दिया कि भारत अब अपने नागरिकों की सुरक्षा में किसी तरह की लापरवाही पर चुप नहीं बैठेगा।
भारत के लिए यह संकट कई स्तरों पर चुनौतियां दे रहा है। सबसे महत्त्वपूर्ण है मानवीय पहलू। दुनिया भर के वाणिज्यिक जहाजों को चलाने वाले कार्यबल में भारत की हिस्सेदारी बहुत बड़ी है। खाड़ी के अशांत पानी में इन जहाजों को सैन्य निशाना बनाया जा रहा है। इससे वहां नौकरी कर रहे भारतीय नागरिक अपनी जान गंवा रहे हैं। दूसरा पहलू रणनीतिक और आर्थिक है। खाड़ी क्षेत्र में रहने वाले लगभग एक करोड़ भारतीयों की सुरक्षा भारत की सर्वोच्च प्राथमिकता है। इसके अलावा, भारत की ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक आपूर्ति शृंखलाएं पूरी तरह से समुद्री मार्गों में शांति पर टिकी हैं। इस क्षेत्र में कोई भी बड़ी बाधा भारतीय अर्थव्यवस्था को सीधे तौर पर प्रभावित करती है, जिससे ईंधन की कीमतें बढऩे के साथ-साथ मुद्रास्फीति का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। आखिरकार यह देश की तरक्की की रफ्तार और आम आदमी की सहूलियतों को प्रभावित करनेवाला है। हालांकि, वर्तमान परिस्थितियों में भारत की कूटनीति की असली परीक्षा इस बात में है कि वह अमरीका-ईरान के बीच बढ़ते टकराव में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को कैसे बनाए रखे। एक तरफ अमरीका, भारत का एक महत्त्वपूर्ण रणनीतिक और आर्थिक साझेदार है, जिसके साथ हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत के गहरे हित जुड़े हैं। दूसरी तरफ, ईरान के साथ भारत के ऐतिहासिक संबंध हैं और चाबहार बंदरगाह जैसी रणनीतिक परियोजनाएं भारत के मध्य एशिया तक पहुंचने का मार्ग प्रशस्त करती हैं।
जब अमरीकी नौसेना ईरानी नाकेबंदी के नाम पर भारतीय नाविकों वाले जहाजों पर हमले करती है, तो नई दिल्ली के लिए संतुलन बनाना बेहद जटिल हो जाता है। ईरान से संघर्ष के इस नए मोड़ पर भारत को अपनी आर्थिक और मानवीय प्राथमिकताओं की रक्षा के लिए कुछ और जरूरी कूटनीतिक कदम उठाने की आवश्यकता है। सुरक्षा परिषद में सुधारों की मांग को तेज करने के साथ-साथ, भारत को समुद्री परिवहन की आजादी सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे के निर्माण की भी पहल करनी चाहिए।