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तकनीकी तरक्की के बीच मानसिक स्वास्थ्य का बढ़ता संकट

इसके कारण मनुष्य लगातार भागदौड़ करता रहता है लेकिन हमारा दिमाग इनकी रफ्तार के साथ समायोजन नहीं कर पाता। परिणामस्वरूपं थकान, चिंता, अवसाद, अलगाव और भविष्य की असुरक्षा हमारे जीवन का हिस्सा बन जाते हैं।
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Updated: 22 Oct 2026, 4:46 PM IST
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कहावत है जैसा मन वैसा तन यानी मनुष्य का शरीर और उसका स्वास्थ्य सीधे तौर पर मानसिक स्थिति पर निर्भर करता हैं। जैसा व्यक्ति सोचता है, वैसा ही उसका जीवन बन जाता है। यदि मन शांत और प्रसन्न है, सोच सकारात्मक है तो शरीर भी ऊर्जावान और स्वस्थ रहता है। इसके विपरीत यदि मन में तनाव, चिंता, नकारात्मकता या अहंकार भरा रहता है, तो उसका प्रभाव धीरे-धीरे शारीरिक स्वास्थ्य, और चेहरे पर दिखाई देने लगता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार एक अरब लोग किसी न किसी मानसिक अस्वस्थता की स्थिति के साथ जी रहे हैं। इनमे से दो-तिहाई लोग सिर्फ चिंता और अवसाद झेल रहे हैं, जो कि युवाओं में मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है।

आंकड़ों की मानें तो वर्ष 2011 से 2021 के बीच इस तरह की घटनाएं 20-29 वर्ष के युवाओं में देखी गई और दुर्भाग्य यह है कि भारत में केवल 10 प्रतिशत लोगों को ही मानसिक स्वास्थ्य केयर मिलती है। सरकारें मानसिक स्वास्थ्य पर कुल स्वास्थ्य बजट का केवल एक प्रतिशत ही खर्च करती हैं। यह कुल सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 0.26 फीसदी ही है। जिसे किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता। विशेष रूप से आज के समय में जब अधिकांश युवा और बच्चे शिक्षा, रोजगार और भविष्य की अनिश्चितता को लेकर तनाव में रहने लगे हैं।

एनसीआरबी के अनुसार 2023 में भारत में 13,892 विद्यार्थियों ने आत्महत्या की, जिसका कारण केवल परीक्षाओं में विफलता या विफलता का डर या दबाब ही नहीं था, बल्कि पारिवारिक समस्याएं, आर्थिक स्थिति, रिलेशनशिप और कुछ हद तक बीमारी भी थी। समाज उन्हें एक मानसिक रोगी के रूप में देखने लगता है। जबकि सत्य यह है कि वह रोगी नहीं है, अगर शुरू में ही उसने अपने लक्षणों को पहचान कर चिकित्सीय या मनोवैज्ञानिक सहायता की जरूरत समझी। अनेक अध्ययनों में सामने आया है कि 6 घंटे से कम नींद लेने वालों को अवसाद/डिप्रेशन का खतरा ढाई गुना बढ़ जाता है। दो सप्ताह से ज्यादा उदासी, भूख में बड़ा बदलाव, काम या पढ़ाई में मन न लगना, खुद को अलग-थलग अनुभव करना, चिड़चिड़ापन ऐसे लक्षण हैं, जिन्हें पहचान कर तुरंत मदद की आवश्यकता अनुभव होनी चाहिए।

जर्मन समाजशास्त्री हार्टमुट रोजा के अनुसार आधुनिक और उत्तर-आधुनिक समाज की सबसे बड़ी विशेषता रफ्तार या तेजी है। उन्होंने बताया कि आधुनिक जीवन में सब कुछ बहुत तेजी से बदल रहा है। उन्होंने इसके तीन आयाम बताए हैं- तकनीक की रफ्तार, सामाजिक परिवर्तन की रफ्तार और जीवन की गति की रफ्तार। इसके कारण मनुष्य लगातार भागदौड़ करता रहता है लेकिन हमारा दिमाग इनकी रफ्तार के साथ समायोजन नहीं कर पाता। परिणामस्वरूपं थकान, चिंता, अवसाद, अलगाव और भविष्य की असुरक्षा हमारे जीवन का हिस्सा बन जाते हैं। पहले, बच्चों की तुलना आस-पड़ोस या गली-मोहल्ले के बच्चों से की जाती थी लेकिन आज दुनिया के बेस्ट लोगों से तुलना की जाने लगी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (2025) के अनुसार डिजिटल तुलना युवाओं में चिंता और अवसाद का सबसे बड़ा कारण बनता जा रहा है। इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि तकनीक प्रधान समाज में सबसे बड़ा खतरा मानसिक स्वास्थ्य पर ही मंडरा रहा है। क्योंकि तकनीकी समाज में दक्षता, मापन और रफ्तार (स्पीड) ने उत्पादन और उपयोगिता पर तो बल दिया है लेकिन मानवीय मूल्यों को कम कर दिया है, जिससे होमो फेबर (उपकरण निर्माता) का प्रभुत्व समाज में बढ़ा है। परिणामस्वरूप स्वतंत्र रूप से खेलना, सामुदायिक भावना, संस्कार-अनुष्ठान इत्यादि जीवन से लुप्त हो रहे हैं और युवा अवसाद व अलगाव का शिकार हो रहे हैं। यह भी सच है कि हम पुन: लौटकर बैलगाड़ी के युग में नहीं जा सकते, इसलिए इस विकसित तकनीक के साथ ही जीना सीखना होगा।

याद रखिए तकनीक के साथ जीना है लेकिन तकनीक के लिए नहीं जीना है। इसके लिए कुछ उपाय किए जा सकते हैं जैसे-सप्ताह में एक बार सिर्फ बातें, किस्से-कहानियां, खेल और लोकगीत या अन्य किसी शौक के लिए समय निकला जाए, लेकिन इन गतिविधियों को सोशल मीडिया की पोस्ट न बनाया जाए। पूरा दिन स्क्रीन पर बने रहने के कारण शरीर का मूवमेंट कम होता है। न्यूरो साइंस कहती है कि अगर शरीर हिलेगा नहीं तो दिमाग में सेरोटोनिन हार्मोन (मनोदशा सुधरने वाला तत्व) कम बनेगा। इसलिए हर आधे घंटे स्क्रीन देखने के बाद शरीर का मूवमेंट होना चाहिए। बिना स्क्रीन के खेलने की आदत बनाएं। दूसरों के साथ खुद को कनेक्ट करें(बिना इंटरनेट के) और योगाभ्यास, प्रात:कालीन घूमना, जल्दी सोना-जल्दी उठाना, ध्यान प्रक्रिया को जीवनशैली में शामिल करने से मानसिक स्वास्थ्य संबंधी शिकायतों से छुटकारा मिल सकता है।

डॉ. ज्योति सिडाना,(समाज शास्त्री एवं स्तंभकार)

Updated on:
22 Oct 2026, 4:46 PM IST
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