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खाड़ी की कूटनीतिक रस्साकशी, भारत के लिए चुनौती

खतरा जितना आसन्न होगा, खाड़ी के देश आर्थिक प्रलोभन और गुप्त संवाद का सहारा लेने के लिए उतने ही तत्पर होंगे। यह ईरान की रणनीतिक जीत नहीं है।
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Oct 21, 2026
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सामरिक दुर्बलताएं व राजनीतिक प्रभाव परस्पर विरोधी नहीं होते। सैन्य दबाव में भी सौदेबाजी की ताकत बढ़ाई जा सकती है। ईरान इसका उदाहरण है। खाड़ी सहयोग परिषद के छह सदस्य देश ईरानी हमलों से त्रस्त हैं, किंतु अपने शहरों, ऊर्जा प्रतिष्ठानों और समुद्री मार्गों की सुरक्षा के लिए ईरानी कट्टरपंथियों से बातचीत करने को मजबूर भी। यह स्थिति अमरीकी सैन्य उपस्थिति पर निर्भर सुरक्षा रणनीति की कमजोरियां उजागर करती हैं।अमरीका खाड़ी देशों का महत्वपूर्ण सुरक्षा भागीदार है। दुविधा यह है कि अमरीकी सैन्य अड्डे उन देशों में हैं, जो खुद किसी भी संघर्ष का अखाड़ा बने बिना वाशिंगटन से सुरक्षा चाहते हैं। खाड़ी के देशों ने तेहरान को बार-बार आश्वस्त किया है कि उनकी भूमि का इस्तेमाल ईरान-विरोधी हमलों के लिए नहीं होगा। इसके बावजूद जारी ईरानी हमलों से अविश्वास और संवाद के बीच का विरोधाभास गहरा गया है। ओमान व ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिये एक संयुक्त नौवहन गलियारे के साथ यातायात प्रबंधन, सूचना साझा करने और नौवहन सुरक्षा सेवाओं पर बातचीत कर रहे हैं। बारूदी सुरंगें हटाने की संयुक्त परियोजना पर सहमत भी हुए हैं। कतर भी ईरान के साथ अपने संबंधों को केवल सैन्य निरोध तक सीमित नहीं रख रहा, हालांकि युद्ध के आरंभ में ही ईरान ने कतर के प्रमुख गैस केंद्र रास लफान को निशाना बनाया था। महत्वपूर्ण ऊर्जा प्रतिष्ठानों की भेद्यता कतर के लिए कूटनीति की अनिवार्यता को रेखांकित करती है।

बहरीन भी ईरान के साथ बातचीत के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराता रहा है। कुवैत भी कूटनीतिक समाधानों और क्षेत्रीय सहमतियों का ही समर्थन करता आया है। ऐसे में तेहरान से वार्ता उससे राजनीतिक निकटता या उसकी आक्रामकता की स्वीकृति नहीं, बल्कि भावी संकटों के प्रबंधन में निवारक पहल बन जाती है। सऊदी अरब ने पाकिस्तान और तुर्किये के साथ त्रिपक्षीय रक्षा समझौता किया, जिसके तहत किसी भी साझेदार देश पर हमला सभी पर आक्रमण माना जाएगा। यह गठबंधन राजनीतिक एकजुटता तो दिखाता है, पर सैन्य हस्तक्षेप की शर्तों व तत्परता पर मौन है। पाकिस्तान की बाध्यता केवल पवित्र शहरों की सुरक्षा तक सीमित है, जबकि तुर्किये की संसद ने अब तक संधि को मंजूरी नहीं दी है। खाड़ी देश अपने सुरक्षा संबंधों में विविधता लाने के इच्छुक हैं। वे अमरीका से अपना नाता नहीं तोड़ रहे, बल्कि उस पर अतीव निर्भरता के जोखिम को कम कर रहे हैं।

इस व्यवस्था को क्षेत्रीय बहुलवाद पर आधारित सुरक्षा रणनीति के तौर पर देखा जाना चाहिए। संयुक्त अरब अमीरात और ईरान के बीच संभावित वार्ता की खबरें भी यही दर्शाती हैं। खतरा जितना आसन्न होगा, खाड़ी के देश आर्थिक प्रलोभन और गुप्त संवाद का सहारा लेने के लिए उतने ही तत्पर होंगे। यह ईरान की रणनीतिक जीत नहीं है। तबाही मचाने की अपनी क्षमता को सौदेबाजी की ताकत में ढालने में ही ईरान का लाभ निहित है। खाड़ी में बदलते समीकरणों से भारत की आर्थिक और कूटनीतिक स्थिति भी पेचीदा हो गई है। बहुपक्षीय संतुलन बनाए रखने की भारत की पारंपरिक नीति तब सबसे प्रभावी थी जब उसके साझेदार सीधे टकराव में नहीं थे। मौजूदा युद्ध और खाड़ी के भू-राजनीतिक पुनर्गठन भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को सीमित करते हैं।

भारत के लिए ईरान जहां अन्य क्षेत्रों तक पहुंचने का मार्ग है, वहीं ऊर्जा आपूर्ति और जहाजों की सुरक्षा के लिए जोखिम भी। भारत को अब नपी-तुली बहुआयामी कूटनीति अपनानी होगी। ओमान और कतर के साथ अपने रिश्ते और मजबूत करने होंगे। ओमान और ईरान के बीच जिन कदमों को लेकर सहमति हुई है, उन्हें संस्थागत रूप देने में मदद करनी होगी। यूएई के साथ अपनी साझेदारी को ईंधन भंडार, बंदरगाहों, वित्तीय प्रौद्योगिकी और समुद्री निगरानी के क्षेत्र में ठोस प्रतिबद्धताओं में तब्दील करना होगा। नौसैनिक सुरक्षा, साझा बीमा व्यवस्था और आपातकालीन ईंधन भंडार मजबूत करने होंगे। भारत की खाड़ी नीति अब केवल स्थिर और पृथक द्विपक्षीय संबंधों के सहारे नहीं चल सकती। हालिया हूती हमलों के बाद मक्का समझौते के तहत पश्चिम एशिया में पाकिस्तान को नई सुरक्षा भूमिका मिल गई है। भारत इसके प्रभावों का अध्ययन कर रहा है, परंतु मूकदर्शक बने रहना पर्याप्त नहीं है। पाकिस्तान की सैन्य भूमिका का इस्तेमाल कश्मीर या आतंकवाद के मुद्दों पर भारत के खिलाफ कूटनीतिक दबाव बनाने के लिए न हो, यह सुनिश्चित करना होगा। अपने नाविकों और समुद्री गलियारों की सुरक्षा परखने के लिए भारत को भावनाओं से परे जाकर तेहरान से स्वतंत्र संवाद बनाए रखना होगा।

अरब सागर में नौसैनिक मौजूदगी बढ़ानी होगी। चाबहार भारत का सबसे बड़ा सुरक्षा-कवच है, लेकिन ईरान का प्रभाव इस बंदरगाह की ताकत भी है, कमजोरी भी। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध, क्षेत्रीय तनाव और ईरान की अस्थिर नीतियां निवेश में देरी करा सकती हैं, व्यापार की लागत बढ़ा सकती हैं और बंदरगाह की विश्वसनीयता घटा सकती हैं। भारत को इसका विकास जारी रखना होगा, लेकिन इसे सुनिश्चित समुद्री मार्ग नहीं, बल्कि एक ऐसा व्यापारिक गलियारा मानकर जिसे वैकल्पिक व्यवस्थाओं से सुरक्षित रखा जा सके और जो प्रतिबंधों के बीच भी काम कर सके।
भारत को जहां ऊर्जा, व्यापार, निवेश और अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए अरब देशों का साथ चाहिए, वहीं क्षेत्रीय पहुंच के लिए ईरान की तथा प्रौद्योगिकी और समुद्री सुरक्षा के लिए अमरीका और यूरोप की भी जरूरत है। ईरानी खतरे पर स्थायी अंकुश के लिए ईरान की प्रतिबद्धता और जरूरी हो गई है। ईरान से सुरक्षा अब उसके साथ न्यूनतम सुरक्षा-सहमति के बिना लगभग असंभव है और यह विडंबना अब केवल खाड़ी तक सीमित नहीं रह गई है।

हर्ष काबरा,(वरिष्ठ पत्रकार एवं विश्लेषक)

Updated on:
21 Oct 2026 06:05 pm
Published on:
21 Oct 2026 06:05 pm