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शक्ति अब किसी एक वैश्विक केंद्र की धुरी पर नहीं घूमती

वैश्विक पूर्व की अपेक्षा केवल वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपने हिस्से को बढ़ाने की नहीं, बल्कि व्यापार, वित्त और निर्णय-निर्माण की संस्थाओं में अधिक न्यायसंगत भागीदारी की भी है।
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भारत

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Opinion Desk

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सौमेन रे , अपूर्व राकेश पांडेय

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Oct 17, 2026

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इतिहास बताता है कि विश्व-व्यवस्थाएं किसी एक दिन समाप्त नहीं होतीं। पहले उनकी दरारें दिखाई देती हैं, फिर शक्ति का संतुलन बदलता है और अंतत: पुरानी की जगह नई संरचना लेती है। प्रथम विश्वयुद्ध ने यूरोपीय शक्तियों, ऑटोमन साम्राज्य और जापान के पुराने संतुलन को तोड़ा तथा संयुक्त राज्य अमरीका और सोवियत संघ के उभार की भूमि तैयार की। द्वितीय विश्व युद्ध ने इस परिवर्तन को निर्णायक बनाया। 1956 के स्वेज संकट तक ब्रिटेन और फ्रांस की पुरानी शक्ति स्पष्ट रूप से क्षीण हो चुकी थी और विश्व अमरीकी नेतृत्व वाले पूंजीवादी व सोवियत नेतृत्व वाले समाजवादी प्रतिद्वंद्विता के लंबे दौर में प्रवेश कर चुका था। सोवियत संघ के विघटन ने फिर एक ध्रुव को लगभग अकेला छोड़ दिया, किंतु इतिहास का चक्र वहीं नहीं रुका। एकध्रुवीय क्षण की चमक धीरे-धीरे उन अनुभवों से धुंधली होने लगी, जिनमें सैन्य शक्ति राजनीतिक स्थिरता में रूपांतरित नहीं हो सकी। अफगानिस्तान, इराक और लीबिया में अमरीकी हस्तक्षेपों के बाद राजनीतिक अव्यवस्था, हिंसा, जिहादी उग्रवाद और विस्थापन के प्रश्न उभरे, जबकि सीरिया बाहरी शक्तियों की प्रतिस्पर्धा से और गहरे संकट में चला गया। इन घटनाओं ने अनेक देशों को एक असुविधाजनक प्रश्न के सामने खड़ा किया।

यहीं से वैश्विक पूर्व की कहानी अधिक स्पष्ट होती है। चीन ने 2001 में विश्व व्यापार संगठन में प्रवेश के माध्यम से वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी उपस्थिति को गहरा किया। शी जिंगपिंग के नेतृत्व में यह दृष्टि अधिक व्यापक वैश्विक भूमिका की ओर बढ़ी। रूस ने एक अलग मार्ग अपनाया। सैन्य और औद्योगिक क्षमता को पुनर्गठित किया तथा ऊर्जा को प्रभाव के साधन में बदला। उत्तर कोरिया ने 2003 में परमाणु अप्रसार संधि से अलग होकर और 2006 में पहला परमाणु परीक्षण किया। कभी परिधि पर रखे गए देश अब दूसरों की रणनीतिक गणनाओं को प्रभावित करने लगे हैं। यदि इन देशों की राजनीतिक व्यवस्थाएं, इतिहास और राष्ट्रीय आकांक्षाएं इतनी भिन्न हैं, तो उन्हें एक सूत्र में क्या बांधता है? उत्तर किसी साझा विचारधारा में नहीं मिलता क्योंकि वैश्विक पूर्व कोई नया वैचारिक गुट नहीं है। उसका आधार हित है। यही वह परिवर्तन है जिसे समझना सबसे आवश्यक है- विकल्पों की बहुलता स्वयं शक्ति का रूप बन गई है। वैश्विक पूर्व की अपेक्षा केवल वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपने हिस्से को बढ़ाने की नहीं, बल्कि व्यापार, वित्त और निर्णय-निर्माण की संस्थाओं में अधिक न्यायसंगत भागीदारी की भी है। रूस-यूक्रेन युद्ध और अमरीका-इजरायल तथा ईरान के बीच संघर्ष ने स्पष्ट किया है कि राष्ट्रों की निष्ठाएं विचारधाराओं से ही नहीं, ऊर्जा, पूंजी, आपूर्ति-शृंखलाओं, प्रौद्योगिकी, खाद्य सुरक्षा और रक्षा संबंधों से भी निर्धारित होती हैं। मध्यम शक्तियां और विकासशील देश अब किसी एक ध्रुव की परिक्रमा के बजाय अपने हितों के अनुरूप निर्णय लेने और विकल्प सुरक्षित रखने का प्रयास कर रहे हैं।वैश्विक पश्चिम को स्वीकार करना होगा कि वैश्विक पूर्व अब व्यवस्था की परिधि पर खड़ा मूक दर्शक नहीं, उसके निर्माण का सहभागी है। यह परिवर्तन पश्चिम के विस्थापन या नई द्विध्रुवीयता का पर्याय नहीं है। निर्णायक बदलाव यह है कि शक्ति अब किसी एक केंद्र की धुरी पर नहीं घूमती। केंद्र-परिधि की पुरानी रेखा अनेक दिशाओं में फैलकर विश्व का नया मानचित्र रच रही है।

सौमेन रे,(पूर्व भारतीय राजदूत एवं उच्चायुक्त), अपूर्व राकेश पांडेय, (लेखक एवं शोधार्थी)