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Guest Editor- लिटिगेशन में केवल कानूनी जानकारी काफी नहीं, हर तथ्य की गहरी समझ और धैर्य भी जरूरी

मुंबई से कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कॉर्पोरेट लॉ में इंटर्नशिप की। उस समय कंपनियों में प्लेसमेंट चल रहे थे, लेकिन स्वास्थ्य ठीक नहीं होने के कारण वह इंटरव्यू में शामिल नहीं हो सकीं। इला के मुताबिक, इसी दौरान उनके पिता की फर्म से जुड़े एक अधिवक्ता ने उन्हें मार्गदर्शन दिया।
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भारत

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Shaily Sharma

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Oct 17, 2026

advocate ila

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इला शिखर अलवर से सुप्रीम कोर्ट तक का सफर

वकालत में हर केस कुछ नया सिखाता है, लेकिन कुछ मुकदमे ऐसे होते हैं, जो अधिवक्ता के पेशेवर सफर का अहम हिस्सा बन जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड इला शिखर शील के लिए ‘पारुल बनाम मेट्रो हार्ट इंस्टीट्यूट एवं अन्य’ ऐसा ही मामला रहा। वर्ष 2014 में शुरू हुआ यह मुकदमा करीब 12 साल तक चला। 5 अक्टूबर 2026 को राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने मामले में सर्जरी के बाद मरीज की देखभाल में लापरवाही पाई और कुल 20 लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश दिया।इला कहती हैं कि इस केस ने उन्हें सिखाया कि किसी जटिल मुकदमे को अदालत के सामने किस तरह प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया जाना चाहिए। केवल कानून की जानकारी होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि केस से जुड़े हर तथ्य, दस्तावेज और तकनीकी पहलू को समझना भी जरूरी है। उनके मुताबिक, मेडिकल नेग्लिजेंस जैसे मामलों में चुनौती और बढ़ जाती है, क्योंकि अधिवक्ता को चिकित्सकीय शब्दावली और उपचार से जुड़ी तकनीकी बातों को समझकर उन्हें कानूनी तर्कों के रूप में प्रस्तुत करना होता है।

फिजिक्स पढ़ते हुए महसूस हुआ कि इंजीनियरिंग नहीं करनी
इला शिखर शील मूल रूप से राजस्थान के अलवर की रहने वाली हैं, जिनके दादा स्वर्गीय बृजबल्लभ हल्दिया खंडेलवाल समाज के अत्यंत प्रतिष्ठित व्यक्तियों में से थे और उनके पिता राहुल हल्दिया हैं। उनकी स्कूली शिक्षा दिल्ली से और कानून की पढ़ाई मुंबई से पूरी हुई। स्कूल में उन्होंने साइंस विषय लिया था और शुरुआत में इंजीनियरिंग की संभावना भी थी, लेकिन फिजिक्स पढ़ते हुए उन्हें महसूस होने लगा कि वह इंजीनियर नहीं बनना चाहतीं। इला बताती हैं कि उनके घर में कानून और वकालत को लेकर काफी बातचीत होती थी। बचपन से ही उनकी तर्क शक्ति अच्छी थी और किसी विषय को समझकर उस पर अपनी बात रखना उन्हें पसंद था। ऐसे में उन्होंने कानून के क्षेत्र में जाने का निर्णय लिया। परिवार ने भी उनके इस फैसले को प्रोत्साहित किया।मुंबई से कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कॉर्पोरेट लॉ में इंटर्नशिप की। उस समय कंपनियों में प्लेसमेंट चल रहे थे, लेकिन स्वास्थ्य ठीक नहीं होने के कारण वह इंटरव्यू में शामिल नहीं हो सकीं। इला के मुताबिक, इसी दौरान उनके पिता की फर्म से जुड़े एक अधिवक्ता ने उन्हें मार्गदर्शन दिया। वह उनके पास जाकर वकालत के व्यावहारिक पहलुओं को समझने लगीं। यहीं से मुकदमों की पैरवी यानी लिटिगेशन में उनकी ट्रेनिंग शुरू हुई और उन्होंने इस क्षेत्र में अपना कॅरियर आगे बढ़ाया।

पहला केस बना कॅरियर का अहम पड़ाव
इला बताती हैं कि वर्ष 2013 में कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने वकालत शुरू की और अगले ही साल उन्हें सुप्रीम कोर्ट में अपना पहला केस दाखिल करने का अवसर मिला। यह मामला पारुल बनाम मेट्रो हार्ट इंस्टीट्यूट एवं अन्य था। पारुल भी अलवर की रहने वाली थीं। उनके पति दक्ष कुमार खंडेलवाल की हर्निया के इलाज के दौरान मृत्यु हो गई थी। इसके बाद पारुल ने चिकित्सा लापरवाही का आरोप लगाते हुए न्याय के लिए कानूनी लड़ाई शुरू की और इला से संपर्क किया।इला के मुताबिक, इस केस में सबसे बड़ी चुनौती मेडिकल रिकॉर्ड और उसमें दर्ज तकनीकी पहलुओं को समझना था। वह बताती हैं कि मामले से जुड़े मेडिकल पेपर उन्हें काफी समय बाद मिले। ऐसे मामलों में रिकॉर्ड का समय पर उपलब्ध होना और उसका गहराई से अध्ययन करना महत्त्वपूर्ण होता है। उन्हें प्रत्येक मेडिकल टर्म को समझना था और यह भी तय करना था कि उससे जुड़े तथ्य को अदालत के सामने किस तरह रखा जाए। इला कहती हैं कि उन्होंने अस्पताल को कानूनी नोटिस भेजा और राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में मामला दायर किया। इसके बाद लंबे समय तक चली कानूनी प्रक्रिया में उपचार के विभिन्न चरणों, मेडिकल रिकॉर्ड, विशेषज्ञों की राय और अस्पताल की दलीलों पर विचार हुआ। उनका कहना है कि मेडिकल नेग्लिजेंस के केस में अधिवक्ता को केवल आरोपों के आधार पर नहीं, बल्कि उपलब्ध रिकॉर्ड और तथ्यों के आधार पर अपनी बात रखनी होती है।

12 साल तक चला इंतजार, फैसले ने दी राहत
इला के मुताबिक, इस मामले में पारुल को न्याय पाने के लिए करीब 12 साल इंतजार करना पड़ा। जब केस शुरू हुआ था, तब उनके बच्चे छोटे थे। मुकदमे का निर्णय आने तक उनकी एक बेटी की शादी भी हो चुकी थी। इला कहती हैं कि इतने लंबे समय तक कानूनी लड़ाई जारी रखना शिकायतकर्ता परिवार के लिए आसान नहीं होता। फैसले में लगने वाला समय दोनों पक्षों के लिए तनाव का कारण बन सकता है, लेकिन लिटिगेशन में धैर्य बनाए रखना जरूरी है। 5 अक्टूबर 2026 को राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने अपना आदेश सुनाया। आयोग ने सर्जरी करने वाले चिकित्सक या स्वयं सर्जरी में लापरवाही नहीं पाई, लेकिन सर्जरी के बाद उत्पन्न जटिलताओं से संबंधित देखभाल में लापरवाही मानी। आयोग ने कुल 20 लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश दिया, जिसमें 15 लाख रुपए मेट्रो हार्ट इंस्टीट्यूट और 5 लाख रुपए डॉ. भंवर को देने थे। इला कहती हैं कि यह केस उनके लिए किसी रिवॉर्ड से कम नहीं था। इसने उन्हें जटिल मामलों की तैयारी, तथ्यों की अहमियत और कोर्ट में दलीलें प्रस्तुत करने के तरीके को बेहतर ढंग से समझने का अवसर दिया। उनके मुताबिक, जब किसी मामले में मेडिकल और कानूनी दोनों तरह की तकनीकी जानकारी की जरूरत हो, तो अधिवक्ता को हर पहलू पर मेहनत करनी पड़ती है। वह मानती हैं कि इस केस से मिली सीख आगे के पेशेवर सफर में भी काम आती रहेगी।

क्लाइंट का विश्वास सबसे बड़ी जिम्मेदारी
इला ने अपनी स्वतंत्र कानूनी संस्था ‘द क्लैरिटी लॉ’ की स्थापना की है। उन्हें वाणिज्यिक मुकदमों, मध्यस्थता और अपीलीय मामलों में 13 वर्षों का अनुभव है। वह सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड हैं। इसके अलावा, दिल्ली हाईकोर्ट ने उन्हें न्यायालय-नियुक्त मध्यस्थ के रूप में नियुक्त कया है। वह भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण से संबद्ध अधिवक्ता हैं और मध्य प्रदेश राज्य की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पैरवी करने वाले अधिवक्ताओं के पैनल में भी शामिल हैं।अपने काम के बारे में बात करते हुए इला कहती हैं कि जब कोई क्लाइंट उनके पास आता है, तो वह इस विश्वास के साथ आता है कि उसकी बात सुनी जाएगी और उसे न्याय दिलाने के लिए गंभीरता से प्रयास किया जाएगा। उनके मुताबिक, अधिवक्ता और क्लाइंट के बीच विश्वास बहुत महत्त्वपूर्ण है। इस भरोसे को बनाए रखने के लिए केस की तैयारी, तथ्यों की समझ और पेशेवर जिम्मेदारी के प्रति ईमानदारी जरूरी है।

बदल रहा है कानून के क्षेत्र को लेकर नजरिया
इला मानती हैं कि पिछले कुछ वर्षों में कानून के क्षेत्र को लेकर लोगों की सोच में बदलाव आया है। वह कहती हैं कि पहले लिटिगेशन को लेकर कई तरह की धारणाएं थीं, लेकिन अब युवा इसे कॅरियर के एक गंभीर विकल्प के रूप में देख रहे हैं। उनके मुताबिक, कोविड के बाद अदालतों में ऑनलाइन सुनवाई और तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल ने काम करने के तरीकों को भी बदला है। हालांकि, इला का मानना है कि तकनीक कितनी भी आगे बढ़ जाए, कानून की बुनियादी समझ का कोई विकल्प नहीं है। वह कहती हैं कि आज युवा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआइ से बहुत-सी जानकारियां प्राप्त कर लेते हैं, लेकिन उन्हें सबसे पहले अपना बेस मजबूत करना चाहिए। इसके बाद आवश्यकता के अनुसार तकनीक का इस्तेमाल करना चाहिए। उनके मुताबिक, आधार जितना मजबूत होगा, भविष्य में आगे बढऩे की संभावनाएं उतनी ही बेहतर होंगी।

महिलाओं के लिए जरूरी है धैर्य और समर्पण
इला कानून के क्षेत्र को अब भी पुरुष-प्रधान मानती हैं, लेकिन उनका कहना है कि महिलाएं भी लगातार आगे आ रही हैं और अपनी पहचान बना रही हैं। वह मानती हैं कि इस पेशे में आने वाली महिलाओं को अपनी प्राथमिकताओं और सीमाओं को समझते हुए आगे बढऩा चाहिए। उनके मुताबिक, वकालत में समय देना पड़ता है और शुरुआत में कई तरह की परेशानियां आती हैं। ऐसे में इस क्षेत्र को चुनने से पहले अपनी रुचि और समर्पण को समझना जरूरी है।इला कहती हैं कि यदि किसी युवा में इस क्षेत्र को लेकर जुनून है और वह मेहनत के साथ लगातार काम करने को तैयार है, तो उसे शुरुआती कठिनाइयों से घबराना नहीं चाहिए। सफलता मिलने में समय लग सकता है, लेकिन तैयारी और निरंतर प्रयास महत्त्वपूर्ण हैं।

अच्छे लिटिगेटर के लिए जरूरी है खुद पर भरोसा
युवाओं को सलाह देते हुए इला कहती हैं कि लिटिगेशन में सफल होने के लिए केवल स्किल होना पर्याप्त नहीं है। अधिवक्ता को खुद पर भरोसा और धैर्य रखना भी आना चाहिए। उनके मुताबिक, किसी केस को दाखिल करने से पहले की तैयारी हो या कोर्ट में सुनवाई के दौरान दलीलें रखने का समय, हर स्तर पर पूरी तैयारी जरूरी है। वह कहती हैं कि एक अच्छा लिटिगेटर वही है, जो लगातार डटा रहे और अपने काम को गंभीरता से ले। मुकदमे की हर बारीकी पर ध्यान देना, तथ्यों को समझना और अपनी दलीलों को स्पष्टता से रखना इस पेशे की अहम जरूरतें हैं। इला के अनुसार, कानून के क्षेत्र में आगे बढऩे के लिए मजबूत बुनियाद, मेहनत, समर्पण और धैर्य ही सबसे बड़ी ताकत हैं।

एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड बनने के लिए चार पेपर
इला शिखर शील सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड हैं। वह बताती हैं कि इस पद तक पहुंचने के लिए निर्धारित पात्रता और ट्रेनिंग पूरी करने के बाद परीक्षा देनी होती है। परीक्षा में चार पेपर होते हैं, जिन्हें इला ने पहली ही बार में पास किया। हर पेपर में सुप्रीम कोर्ट की प्रक्रिया, कानूनी ड्राफ्टिंग, पेशेवर नैतिकता और महत्वपूर्ण न्यायिक फैसलों की समझ परखी जाती है। इस भूमिका में निर्धारित नियमों के तहत सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं और अन्य दस्तावेज दाखिल करने की जिम्मेदारी भी शामिल होती है।

मेडिकल नेग्लिजेंस के मामले में क्या करें?
इला के अनुभव के मुताबिक, चिकित्सा लापरवाही से जुड़े मामलों में दस्तावेजों और तथ्यों का महत्त्व बहुत अधिक होता है। ऐसे मामले में पीडि़त मरीज या परिवार को उपचार से संबंधित मेडिकल रिकॉर्ड, जांच रिपोर्ट और पर्चे सुरक्षित रखने चाहिए। जरूरत पडऩे पर विशेषज्ञ की राय और योग्य अधिवक्ता की सलाह लेनी चाहिए। मामले की प्रकृति के आधार पर उपभोक्ता आयोग, संबंधित चिकित्सा नियामक संस्था या उचित स्थिति में आपराधिक कानूनी कार्रवाई जैसे विकल्पों पर विचार किया जा सकता है। सही कानूनी रास्ता मामले के तथ्यों और लागू कानून पर निर्भर करता है।

युवाओं के लिए सलाह
बेस मजबूत करें: एआइ और तकनीक का इस्तेमाल करें, लेकिन पहले विषय की बुनियादी समझ विकसित करें।
हर तथ्य पर ध्यान दें: केस से जुड़े दस्तावेजों और तकनीकी पहलुओं का अध्ययन करें।
तैयारी पूरी रखें: केस दाखिल करने से लेकर सुनवाई तक हर चरण में तैयारी जरूरी है।
धैर्य बनाए रखें: लिटिगेशन में निर्णय आने में समय लग सकता है।
खुद पर भरोसा रखें: मेहनत, समर्पण और निरंतर प्रयास से ही पेशेवर क्षमता निखरती है।