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सैनिटरी पैड के कचरे से निपटने के विकल्प खोजने की जरूरत

बाजार में एक सैनिटरी पैड की कीमत गुणवत्ता और ब्रांड के अनुसार कुछ रुपए से लेकर दस रुपए या उससे अधिक हो सकती है। यदि एक महिला हर महीने 12 से 20 पैड इस्तेमाल करती है, तो सालभर का खर्च गरीब परिवारों के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है।
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भारत

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Opinion Desk

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डॉ. चंद्रकांत लहारिया, डॉ. अंजू विरमानी

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Oct 16, 2026

waste

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भारत में हर महीने लगभग एक अरब सैनिटरी पैड इस्तेमाल होते हैं और फिर कचरे में बदल जाते हैं। यानी सालभर में करीब 12 अरब पैड। इनसे लगभग एक लाख टन से अधिक कचरा पैदा होने का अनुमान है। ये पैड कुछ घंटों के इस्तेमाल के बाद फेंक दिए जाते हैं, लेकिन उनमें मौजूद प्लास्टिक और अन्य कृत्रिम पदार्थ दशकों तक पर्यावरण में बने रह सकते हैं। यह एक विरोधाभास है कि महिलाओं की स्वच्छता और स्वास्थ्य की रक्षा के लिए बनाया गया उत्पाद अब पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए नई चुनौती बन रहा है। सवाल यह नहीं है कि सैनिटरी पैड का इस्तेमाल कम किया जाए, बल्कि यह है कि क्या ऐसे विकल्प उपलब्ध कराए जा सकते हैं जो महिलाओं की सेहत और पर्यावरण, दोनों के लिए बेहतर हों?

एनएफएचएस के अनुसार, 15 से 24 वर्ष की लड़कियों और महिलाओं में स्वच्छ मासिक धर्म साधनों का इस्तेमाल वर्ष 2015-16 के 58 प्रतिशत से बढ़कर 2019-21 में लगभग 78 प्रतिशत हो गया। यह सामाजिक जागरूकता, बेहतर उपलब्धता और सरकारी प्रयासों की सफलता है। लेकिन इसी उपलब्धि के साथ इस्तेमाल किए गए सैनिटरी पैड के सुरक्षित निस्तारण की समस्या भी तेजी से बढ़ रही है। अधिकांश डिस्पोजेबल सैनिटरी पैड में प्लास्टिक, सिंथेटिक फाइबर और अत्यधिक अवशोषण करने वाले रसायनयुक्त पदार्थ होते हैं। इस्तेमाल के बाद इन्हें सामान्य घरेलू कचरे में डाल दिया जाता है। कई स्थानों पर ये खुले कूड़ेदानों, नालियों, लैंडफिल और जलस्रोतों तक पहुंच जाते हैं। मासिक धर्म से जुड़ी सामाजिक झिझक के कारण कई महिलाएं इन्हें छिपाकर फेंकती, जमीन में दबाती या जला देती हैं। इस्तेमाल किए गए पैड में रक्त और जैविक पदार्थ होने के कारण उनका सुरक्षित निस्तारण जरूरी है। नियंत्रित तापमान पर वैज्ञानिक तरीके से जलाना एक विकल्प है, लेकिन केवल अधिक इंसिनरेटर लगाने से समस्या हल नहीं होगी। कचरा निस्तारण के साथ कचरे की मात्रा कम करने पर भी ध्यान देना होगा। इस समस्या का दूसरा पहलू आर्थिक है। बाजार में एक सैनिटरी पैड की कीमत गुणवत्ता और ब्रांड के अनुसार कुछ रुपए से लेकर दस रुपए या उससे अधिक हो सकती है। यदि एक महिला हर महीने 12 से 20 पैड इस्तेमाल करती है, तो सालभर का खर्च गरीब परिवारों के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है। सरकार जनऔषधि केंद्रों पर एक रुपए में पैड उपलब्ध कराती है, लेकिन इनकी पहुंच सभी महिलाओं तक नहीं है। गरीब परिवारों में किशोरियों और महिलाओं को अक्सर मासिक धर्म स्वच्छता पर खर्च करने में कठिनाई होती है। ऐसे में कुछ लड़कियां पुराने कपड़ों या अन्य उपलब्ध वस्तुओं का इस्तेमाल करती हैं। समस्या केवल कपड़ा इस्तेमाल करने की नहीं, बल्कि उसका साफ न होना, पर्याप्त रूप से न सूखना या लंबे समय तक इस्तेमाल करना है। हालांकि यह धारणा भी गलत है कि कपड़े का इस्तेमाल हमेशा असुरक्षित और डिस्पोजेबल पैड हमेशा सुरक्षित होते हैं। स्वच्छता और सही इस्तेमाल सबसे महत्वपूर्ण हैं।

ऐसे में दोबारा इस्तेमाल किए जा सकने वाले सैनिटरी पैड एक उपयोगी विकल्प हो सकते हैं। शुरुआती खर्च कुछ अधिक हो सकता है, लेकिन लंबे समय में परिवारों की बचत होगी। भारत में पुन: उपयोग वाले पैड को बढ़ावा देने का एक व्यावहारिक लाभ पर्याप्त धूप की उपलब्धता भी है। पानी, साबुन, पूरी तरह सुखाने की सुविधा और उचित रखरखाव के बिना पुन: उपयोग वाले पैड की सलाह देना सही नहीं होगा। उचित प्रशिक्षण और गुणवत्ता मानकों के साथ गांवों तथा छोटे शहरों में उत्पादन इकाइयां स्थापित की जा सकती हैं। पंचायतें, स्कूल, स्वयंसेवी संस्थाएं और सरकार इनके निर्माण, वितरण और जागरूकता में सहयोग कर सकती हैं। इससे महिलाओं को रोजगार भी मिलेगा। यात्रा, कार्यस्थल, स्कूल, पानी की उपलब्धता और व्यक्तिगत सुविधा के अनुसार महिलाओं की आवश्यकताएं बदलती हैं। इसलिए किसी एक उत्पाद को अनिवार्य बनाने के बजाय सुरक्षित और किफायती विकल्पों की उपलब्धता बढ़ाना अधिक उचित होगा। दरअसल, मासिक धर्म स्वच्छता पर बढ़ती चर्चा किशोरियों और महिलाओं के समग्र स्वास्थ्य को बेहतर बनाने का अवसर भी है।

स्कूलों में केवल पैड बांटना पर्याप्त नहीं है। लड़कियों को मासिक धर्म, खून की कमी, पोषण, असामान्य रक्तस्राव, मासिक धर्म के दौरान अत्यधिक दर्द और व्यक्तिगत स्वच्छता के बारे में भी जानकारी मिलनी चाहिए। स्कूलों और सार्वजनिक स्थानों पर स्वच्छ शौचालय, पानी और निजता की व्यवस्था अनिवार्य होनी चाहिए। भारत में मासिक धर्म स्वच्छता अभियान की सफलता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कितने करोड़ सैनिटरी पैड वितरित किए गए। असली सफलता यह होगी कि हर लड़की और महिला बिना संकोच, बिना आर्थिक बोझ और बिना स्वास्थ्य जोखिम के मासिक धर्म का प्रबंधन कर सके।

डॉ. चंद्रकांत लहारिया,(स्वास्थ्य नीति विशेषज्ञ), डॉ. अंजू विरमानी,(वरिष्ठ चिकित्सक)