ओपिनियन

संपादकीय: अपराधों में महिलाओं की बढ़ती संलिप्तता चिंताजनक

अमरीका और चीन जैसे विशाल आबादी के देशों से तुलना करें तो हम यह संतोष जरूर कर सकते हैं कि हमारे यहां की जेलों में महिला बंदियों की संख्या अपेक्षाकृत काफी कम है।

2 min read
Jan 02, 2026

महिलाओं में शिक्षा का प्रसार और सशक्तीकरण के दावे उस वक्त मुंह चिढ़ाते नजर आते हैं जब यह तथ्य सामने आता है कि भारतीय जेलों में महिलाओं की संख्या पुरुषों के मुकाबले दुगुनी तेजी से बढ़ रही है। इंस्टीट्यूट फॉर क्राइम एंड जस्टिस पॉलिसी रिसर्च की रिपोर्ट का यह खुलासा चिंताजनक है। इसमें कहा गया है कि भारतीय जेलों में महिलाओं की हिस्सेदारी कम होने के बावजूद जेलों में महिला कैदियों की संख्या दो दशक में १६२ फीसदी बढ़ गई है। रिपोर्ट के अनुसार महिला कैदियों के मामले में दुनिया में भारत का स्थान छठा है। चिंता की बात यह भी है कि जेलों में महिलाओं के अनुकूल सुविधाएं नहीं हैं।


बड़ा सवाल यही है कि महिलाओं का सशक्तीकरण जिस तरह बढ़ा है उसके मुकाबले महिलाएं अपराध से विमुख क्यों नहीं हो रहीं? अपने हकों की लड़ाई में आगे रहने वाली महिलाओं की आखिर आपराधिक प्रवृत्ति क्यों होने लगी है? एक आशंका यह भी सामने आती है कि कहीं खुद के बचाव में पुरुष ही तो महिलाओं को अपराध की दुनिया में धकेलने नहीं लग गए हैं। कई मामलों में जांच के दौरान यह बात सामने आती रही है। खास तौर से मादक पदार्थ और अन्य वस्तुओं की तस्करी में महिलाओं को जोडऩे का दौर बढऩे लगा है। अमरीका और चीन जैसे विशाल आबादी के देशों से तुलना करें तो हम यह संतोष जरूर कर सकते हैं कि हमारे यहां की जेलों में महिला बंदियों की संख्या अपेक्षाकृत काफी कम है। लेकिन महज चार फीसदी संख्या में महिला बंदी होने के बावजूद आपराधिक मामलों में इनकी भागीदारी का लगातार बढऩा कई खतरों की ओर संकेत करता है। सबसे बड़ा खतरा तो बच्चों की परवरिश का है, जिसमें बाधा आती है। गौर करें तो इसकी जड़ें सामाजिक-आर्थिक असमानताओं, पारिवारिक दबावों और लैंगिक पूर्वाग्रहों में हैं, जहां महिलाएं अक्सर गरीबी, घरेलू हिंसा और मानसिक आघात की शिकार होकर अपराध की ओर मुड़ जाती हैं। घरेलू हिंसा से जुड़े मामले जैसे- दहेज हत्या, चोरी, धोखाधड़ी और कभी-कभी हत्या की वारदात तक इनमें शामिल हैं। यह बात सही है कि महिलाओं में आई जागरूकता उन्हें अधिकारों के लिए लडऩे को प्रेरित करती है, लेकिन जब बात आर्थिक असुरक्षा और पारिवारिक दबाव की होती है तो वे अपराध के रास्ते में आसानी से धकेल दी जाती हैं।


उन मामलों में भी सख्ती करने की जरूरत है, जहां खुद के बचाव में पुरुष महिलाओं को मोहरा बनाते हुए चोरी, डकैती व तस्करी जैसे अपराधों को कारित करते हैं। अब चिंता इस बात पर करना जरूरी है कि अपराध की राह पकडऩे वाली महिलाओं के पुनर्वास प्रयासों को गति दी जाए। परामर्श व रोजगार प्रशिक्षण जैसे प्रयासों को गति देने की जरूरत है ताकि जेलों में बंद महिलाएं सजा पूरी होने के बाद पुन: अपराध के दलदल में न फंसे और आत्मनिर्भर होकर अपना सुरक्षित जीवन यापन कर सकें।

Published on:
02 Jan 2026 12:33 pm
Also Read
View All

अगली खबर