ओपिनियन

सवाल मतदाता सूची का है, सियासत का नहीं

फॉर्म संख्या 6 और 7 को लेकर भी कम भ्रम नहीं फैलाया गया। सच यह है कि फॉर्म 6 के जरिये कोई भी पात्र भारतीय नागरिक किसी भी समय मतदाता सूची में अपना नाम जुड़वा सकता है।
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Oct 15, 2026
sir
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लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी जनता का भरोसा है और उस भरोसे की पहली शर्त है एक शुद्ध मतदाता सूची। जिस सूची में मृत लोग दर्ज हों, एक ही व्यक्ति दो-दो जगह मतदाता हो और जो लोग वर्षों पहले शहर छोड़ चुके हैं उनके नाम अब भी चढ़े हों, उस सूची के आधार पर हुआ चुनाव कितना भी निष्पक्ष हो, सवालों से नहीं बच सकता। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) का मूल उद्देश्य इसी गड़बड़ी को दूर करना है। विडंबना यह है कि सूची को साफ करने की इस कवायद को ही आज सबसे बड़ी साजिश बताने की कोशिश हो रही है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और विपक्ष के कुछ अन्य नेता 'वोट चोरी' का जो माहौल बना रहे हैं, वह राजनीतिक रंगमंच की पटकथा तो हो सकती है, पर कानून और प्रक्रिया की कसौटी पर टिकती दिखाई नहीं देती।

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि चुनाव आयोग चुनाव कराता कैसे है। आयोग की अपनी कोई अलग मशीनरी नहीं है। वह राज्य और केंद्र सरकार के कार्मिकों के सहारे ही पूरे देश में चुनाव संपन्न कराता है। हर राज्य का मुख्य निर्वाचन अधिकारी उसी राज्य के कैडर का वरिष्ठ भारतीय प्रशासनिक सेवा का अधिकारी होता है। हर जिले में निर्वाचन अधिकारी की जिम्मेदारी जिला कलेक्टर निभाते हैं। मतदान दल से लेकर बूथ लेवल अधिकारी (बीएलओ) तक सब सरकारी कर्मचारी होते हैं। यह व्यवस्था आज की नहीं, दशकों पुरानी है और हर दल की सरकार के कार्यकाल में इसी ढांचे से चुनाव हुए हैं। जिस ढांचे से कल तक चुनाव जीते-हारे जाते रहे, उसे आज अचानक संदिग्ध ठहराना राजनीतिक सुविधा का तर्क है, संवैधानिक समझ का नहीं। फॉर्म संख्या 6 और 7 को लेकर भी कम भ्रम नहीं फैलाया गया। सच यह है कि फॉर्म 6 के जरिये कोई भी पात्र भारतीय नागरिक किसी भी समय मतदाता सूची में अपना नाम जुड़वा सकता है। इसके लिए किसी पुनरीक्षण की प्रतीक्षा जरूरी नहीं है। यदि सूची में अपने नाम या अन्य विवरण को लेकर कोई आपत्ति हो, तो फॉर्म 7 के माध्यम से उसका निस्तारण कराया जा सकता है। इसके बाद दावे-आपत्ति की प्रक्रिया है, और निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) के निर्णय से असंतुष्ट व्यक्ति के लिए पहले जिला मजिस्ट्रेट और फिर मुख्य निर्वाचन अधिकारी के पास अपील का रास्ता खुला है।

आयोग का स्पष्टीकरण है कि एसआइआर में फॉर्म 6 में कोई बदलाव नहीं हुआ। केवल एक घोषणा पत्र उसके साथ जोड़ा गया है, ताकि मतदाता को अलग-अलग प्रक्रियाओं से न गुजरना पड़े और ओटीपी सत्यापन दो बार न कराना पड़े। आयोग के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय ने 27 मई 2026 के अपने आदेश में एसआइआर आदेश की वैधता को बरकरार रखा है। यह भी याद रखना चाहिए कि एसआइआर देश के चुनावी इतिहास में पहली घटना नहीं है। मतदाता सूचियों का गहन पुनरीक्षण पहले भी कई बार हो चुका है। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) आयोग को किसी भी समय विशेष पुनरीक्षण का निर्देश देने की शक्ति देती है और संविधान का अनुच्छेद 324 चुनावों के अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण का दायित्व उसी को सौंपता है। यह आयोग का विशेषाधिकार है, किसी की कृपा नहीं। इस बार इसकी आवश्यकता मुख्यत: चार कारणों से पड़ी। पहला, विदेशी घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें भारतीय लोकतंत्र का हिस्सा बनने से रोकना। दूसरा, जिनके पास भारतीय नागरिकता नहीं है या किसी कारण से समाप्त हो चुकी है, उनके नाम सूची से हटाना। तीसरा, एक व्यक्ति का नाम दो जगह दर्ज होने पर केवल एक ही जगह उसका मत वैध रखना और चौथा, दिवंगत मतदाताओं के नाम हटाना।

इस समस्या को समझने के लिए राजस्थान का उदाहरण पर्याप्त है। यहां के बहुत-से निवासी वर्षों से देश के अलग-अलग राज्यों में रह रहे हैं और उन्होंने वहां की मतदाता सूची में नाम दर्ज करा लिया, पर राजस्थान की सूची से उनका नाम नहीं हटा। नतीजा यह कि सूची में उनकी दोहरी मौजूदगी बनी रही। इसका असर केवल मतदान तक सीमित नहीं रहता। जब जनसंख्या और मतदाताओं के आंकड़े मिले हुए हों, तो योजनाओं के आकलन और क्रियान्वयन पर भी उसका प्रभाव पड़ता है। सूची की यह सफाई किसी को बाहर करने के लिए नहीं, आंकड़ों को सच के करीब लाने के लिए है। अब उस आंकड़े की बात, जिसे सबसे ज्यादा उछाला गया, यानी '13 करोड़ लोगों के नाम कट गए।' आयोग के अनुसार यह आंकड़ा अंतिम मतदाता सूची का है ही नहीं। यह प्रारूप चरण का आंकड़ा है, जिसमें प्रविष्टियों को मृत, अनुपस्थित या अप्राप्य, स्थायी रूप से स्थानांतरित और दोहरी श्रेणियों में चिह्नित किया गया था। आयोग के मुताबिक इनमें लगभग 2.8 करोड़ मृत पाए गए, करीब 3 करोड़ अनुपस्थित या अप्राप्य थे, लगभग 6.3 करोड़ स्थायी रूप से कहीं और जा चुके थे और करीब 1 करोड़ प्रविष्टियां एक से अधिक स्थानों पर दर्ज थीं। यानी चिह्नित लोगों में बड़ी संख्या उनकी है जो अब हैं ही नहीं, या जो कहीं और जा बसे हैं, या जिनका नाम दोहरा दर्ज था। सबसे अहम बात यह है कि प्रारूप सूची में चिह्नित होना और अंतिम सूची से हटाया जाना दो अलग बातें हैं। यह सूची लगभग 20 लाख बूथ लेवल एजेंटों (बीएलए) के जरिये सभी राजनीतिक दलों को सौंपी गई और सार्वजनिक भी की गई, ताकि कोई भी व्यक्ति या दल दावा या आपत्ति दर्ज करा सके। इसके बाद किसी नाम को हटाने से पहले नोटिस और सुनवाई की व्यवस्था है। असली अंतिम आंकड़े पूरी प्रक्रिया के समापन पर ही सामने आएंगे, और तब तक अनुमान को तथ्य की तरह परोसना जनता के साथ अन्याय है। नारों से मतदाता सूची शुद्ध नहीं होती, तथ्यों से होती है। चुनाव आयोग पर भी यह दायित्व है कि पारदर्शिता और संवाद के जरिये हर शंका का समाधान करे।

घनश्याम तिवाड़ी, (राज्यसभा सांसद)

Updated on:
15 Oct 2026 03:46 pm
Published on:
15 Oct 2026 03:46 pm