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म्यांमार में फिर सैन्य शासन के मायने

- पड़ोसी देश म्यांमार में तीसरी बार सैनिक शासन लागू हो जाने की खबर ने चौंका दिया।- सेना शहरों में मार्च कर रही है, टेलीफोन और इंटरनेट सेवाएं बाधित हैं।
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Feb 03, 2021
म्यांमार में फिर सैन्य शासन के मायने
म्यांमार में फिर सैन्य शासन के मायने

संकेत तो पहले से मिलने शुरू हो गए थे, फिर भी सोमवार तड़के तीन बजे भारत के पड़ोसी देश म्यांमार में तीसरी बार सैनिक शासन लागू हो जाने की खबर ने चौंका दिया। नवंबर में हुए आम चुनाव में जीत हासिल करने वाली लोकप्रिय नेता आंग सान सू की और उनकी पार्टी नेशनल लीग ऑफ डेमोक्रेसी (एनएलडी) के अध्यक्ष विन मिंट को हिरासत में ले लिया गया। सेना शहरों में मार्च कर रही है, टेलीफोन और इंटरनेट सेवाएं बाधित हैं। समझा जा सकता है कि लोकतंत्र के अन्य समर्थकों का क्या हुआ होगा। चुनाव में एनएलडी ने फिर अपनी लोकप्रियता साबित कर दी थी और चीन समर्थक समझे जा रहे विपक्ष को हार मिली थी। इसके बाद से ही विपक्ष चुनाव में धांधली का आरोप लगा रहा था, जिसने सेना को मौका दे दिया।

हालांकि, चुनाव कराने और निर्वाचित दल को सत्ता सौंपने के बावजूद म्यांमार में पूरी तरह लोकतंत्र आ गया था, ऐसा कहना उचित नहीं होगा। क्योंकि, सेना का राजनीतिक दखल समाप्त नहीं हुआ था। सेना ने संविधान में ऐसे संशोधन करा लिए हैं जिससे संसद की 25 फीसदी सीटों पर उसका आरक्षण है। इस व्यवस्था को बदलने के लिए भी वहां की संसद में 75 फीसदी सदस्यों की सहमति जरूरी होगी। न सिर्फ विदेश मामलों में बल्कि घरेलू मुद्दों पर भी सेना का हस्तक्षेप बरकरार है। इसके बावजूद, सू की की लगातार बढ़ती लोकप्रियता के कारण सेना प्रमुख मिन आंग लाइंग पूरी तरह आश्वस्त नहीं थे। चुनाव के दौरान सेना के भ्रष्टाचार को उजागर करने का वादा करके सू की ने सीनियर जनरल लाइंग को एक तरह से चुनौती दे दी थी। नतीजा यह हुआ कि चुनाव के बाद सेना सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रपति और चुनाव आयुक्त के खिलाफ धांधली की शिकायत दर्ज करा चुकी है। उसके बाद से ही आशंका जताई जा रही थी कि फिर सैन्य शासन शुरू हो सकता है।

म्यांमार में आगे क्या होगा, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। लेकिन इतना तय है कि सू की को अंतरराष्ट्रीय बिरादरी का पहले जैसा समर्थन शायद ही हासिल हो पाए। रोहिंग्यिा मुस्लिमों पर चीन के अत्याचार के मामले में उनका रुख चीन समर्थक माना जाता है, जिसने म्यांमार की 'राष्ट्रवादीट बहुसंख्यक बौद्ध आबादी के बीच उनकी लोकप्रियता भले ही बढ़ा दी हो, पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय में उनका कद घटा ही है। सू की के हालिया रवैये ने भारत सहित कई मित्र देशों को उलझन में डाल रखा है। हालांकि, लोकतंत्र को कुचलने की किसी कार्रवाई को बेहतर तो नहीं ही माना जा सकता।

Updated on:
03 Feb 2021 06:34 am
Published on:
03 Feb 2021 06:34 am