एमएसएमई: सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के स्वस्थ विकास में ही निहित है समावेशी विकास
अजीत रानाडे
लेखक वरिष्ठ अर्थशास्त्री हैं
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अर्थव्यवस्था और समाज में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों के महत्त्व को समझना हमारे लिए जरूरी है क्योंकि 2030 तक जो सतत विकास के लक्ष्य (एसडीजी) हासिल किए जाने हैं, उनमें इन उद्योगों की भूमिका निर्णायक होगी। संयुक्त राष्ट्र भी इस तथ्य को मान्यता देता है। 2015 में बनाई गई सूची में शामिल सतत विकास के 17 लक्ष्यों को 15 साल की अवधि में हासिल करना तय किया गया था। इनमें पहला लक्ष्य है - गरीबी उन्मूलन। इसके समेत एमएसएमई लक्ष्य संख्या 4, 5, 8, 9 और 10 को पूरा करने में सहायक होंगे। ये अन्य लक्ष्य रोजगार सृजन और आर्थिक विकास, आय, संपत्ति तथा लैंगिक असमानता को कम करने और शिक्षा, अविष्कार तथा कौशल को प्रोत्साहन देने से संबंधित हैं।
दरअसल, एमएसएमई किसी भी फलती-फूलती अर्थव्यवस्था के गुमनाम नायकों की तरह हैं। यूएन के अनुसार, विश्व स्तर पर ये उद्यम सम्पूर्ण व्यावसायिक जगत का 90 प्रतिशत हिस्सा हैं। विश्व का 60 से 70 प्रतिशत रोजगार इन्हीं उद्यमों से सृजित होता है और वैश्विक जीडीपी में इनका योगदान 50 प्रतिशत है। भारत में भी यदि आप केवल एमएसएमई क्षेत्र पर गौर करेंगे तो पाएंगे कि रोजगार, निर्गम तथा निर्यात में इन उद्योगों का योगदान 50 प्रतिशत से अधिक है। पर इन्हें बैंक लोन का 20 प्रतिशत से भी कम मिलता है। इसलिए इन्हें मित्रों एवं परिवार पर या फिर उधार देने वालों पर निर्भर रहना पड़ता है। अक्सर ये एमएसएमई बी2बी उद्यम होते हैं यानी बड़ी कम्पनियों को आपूर्ति करने वाले। इस प्रकार ये अपने चुनिंदा ग्राहकों पर निर्भर होते हैं। अक्सर लघु उद्यमियों को भुगतान में देरी की समस्या से दो-चार होना पड़ता है। यदि छोटे आपूर्तिकर्ता भुगतान विवाद को लेकर अदालत का रुख करते हैं तो उनके ब्लैकलिस्ट होने व ग्राहकों को खो देने की आशंका रहती है।
भारतीय कानून विक्रेताओं को समय पर भुगतान मांगने का अधिकार देता है। वर्ष 2006 के एमएसएमई कानून के अनुसार, 45 दिन से ज्यादा समय तक भुगतान न करना अवैध माना गया हैै। पर ऐसी कितनी बड़ी कम्पनियां हैं, जिन्होंने जुर्माना भरा है? संभवत: शून्य। दिवाला और शोधन अक्षमता कोड (आइबीसी) अधिनियम ने छोटे व्यवसायियों को अधिकार दिया है कि वे भुगतान राशि 1 लाख रुपए या अधिक होने पर बड़ी कम्पनियों के खिलाफ मुकदमा कर सकें। हालांकि कोरोनाकाल के दौरान यह न्यूनतम राशि बढ़ाकर 1 करोड़ रुपए कर दी गई थी। कानूनी सशक्तीकरण के बावजूद एमएसएमई विवाद से बचते हैं, क्योंकि जिस पर उन्हें मुकदमा करना होता है, आजीविका के लिए भी उसी पर निर्भर होते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक ने ‘व्यापार प्राप्तियों’ के माध्यम से भुगतान में देरी की समस्या सुलझाने के उपाय किए हैं, लेकिन आरबीआइ के भरसक प्रयास के बावजूद यह कदम प्रभावी नहीं हो सका है।
कुल मिलाकर, एमएसएमई क्षेत्र में लम्बित भुगतान की समस्या नैतिक है। औद्योगिक चैम्बरों को अपने सभी सदस्यों, खास तौर पर बड़ी कम्पनियों को यह संकल्प लेने के लिए कहना चाहिए कि वे छोटे व्यवसायियों का भुगतान 45 दिन से ज्यादा नहीं रोकेंगे। इस संबंध में राष्ट्रीय अभियान चलाया जा सकता है। प्रधानमंत्री स्वयं इस समस्या के हल के लिए ‘नैतिक दबाव’ नामक अभियान शुरू कर सकते हैं। यदि भारत को अगले दशक में हर साल 1 से 1.5 करोड़ रोजगार सृजित करने हैं तो वे मुख्यत: छोटे उद्यमों से ही आएंगे। एक करोड़ नए रोजगार यानी 5 लाख नए उद्यम। इन उद्यमों के लिए न केवल व्यवसाय करना सुगम बनाना आवश्यक है, बल्कि शुरू करना व खत्म करना भी आसान करना जरूरी है। नए व्यवसायों के लिए शहरी एवं राज्य सरकार से अनुमति लेना व नियमन संबंधी मंजूरी लेना जरूरी है, जबकि प्रक्रिया कितनी लंबी हो सकती है यह बहुत अनिश्चित होता है और भ्रष्टाचार की समस्या अपनी जगह है। वित्तीय और तकनीकी मामलों की जानकारी कम होना भी नए व्यवसायों के पंजीकरण में बाधा बनता है।
भारत में करीब 6.4 करोड़ उद्यम हैं, जिनमें से 99 प्रतिशत छोटे, सूक्ष्म या अतिसूक्ष्म हैं। नीतिगत स्तर पर इनकी मुख्य आवश्यकता है कार्यशील पूंजी (और लंबित भुगतान के चलते पूंजी का प्रवाह रुकने की समस्या से मुक्ति)। बड़े निगमों और एमएसएमई के मुनाफे में बढ़ रहा अंतर न केवल मजबूत अर्थव्यवस्था बल्कि एसडीजी लक्ष्यों की प्राप्ति में भी अवरोध पैदा करेगा। हमें जरूरत है अपनी अर्थव्यवस्था में छोटे व्यवसायों की भूमिका को पहचानने के साथ इसे प्रोत्साहित करने की। समावेशी विकास का अर्थ है एमएसएमई के स्वस्थ विकास में ही निहित है।
(द बिलियन प्रेस)