
अंगिरा सिंघवी
अगस्त 2026 में नेपाल-तिब्बत सीमा के निकट ग्लेशियरों के भयावह ढहने के कारण हिमालय में आई आपदा ने एक कठोर कानूनी और नैतिक वास्तविकता को उजागर किया है। इस बाढ़ ने नदी तंत्र के बुनियादी ढांचे को तबाह कर दिया, जलविद्युत परियोजनाओं के नेटवर्क को भारी नुकसान पहुंचाया और हजारों लोगों की जान ले ली। ऐसे में नेपाल सरकार का विदेशी सहायता मांगने के बजाय औपचारिक रूप से जलवायु क्षतिपूर्ति और न्याय की मांग की ओर बढ़ना एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है।
नेपाल की यह मांग किसी आधारहीन दावे पर नहीं है। इसके पीछे पर्यावरणीय न्यायशास्त्र की यह बुनियादी अवधारणा हैं कि जब किसी बाहरी या उच्च-जोखिम वाली गतिविधि के कारण गंभीर नुकसान होता है, तो उस जोखिम को पैदा करने या बढ़ाने वाले पक्षों को उसके लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।
एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ मामले में भारत के सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले ने यह स्वीकार किया था कि आधुनिक दौर की अत्यधिक जोखिम वाली गतिविधियों के लिए पारंपरिक ‘सख्त दायित्व’ का सिद्धांत पर्याप्त नहीं है। न्यायालय ने यह सिद्धांत स्थापित किया कि खतरनाक गतिविधि करने वाली किसी भी संस्था का जनता के प्रति यह न टाले जाने योग्य पूर्ण कर्तव्य है कि वह उस गतिविधि के परिणामस्वरूप होने वाले सभी नुकसानों की भरपाई करे।
हालांकि यह सिद्धांत मूलतः खतरनाक औद्योगिक इकाइयों का संचालन करने वाली कॉरपोरेट कंपनियों के संदर्भ में विकसित हुआ था, लेकिन इस मूल सिद्धांत को सरकारी कार्रवाइयों और नीतियों पर भी समान रूप से लागू किया जाना चाहिए। जब सार्वजनिक प्राधिकरण संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निर्माण की अनुमति देते हैं, किसी क्षेत्र की पर्यावरणीय वहन-क्षमता की अनदेखी करते हैं या अत्यधिक उत्सर्जन वाली नीतियों के जरिए ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ाते हैं, तो उनकी भूमिका महज निष्पक्ष दर्शक की नहीं रह जाती । वे उस व्यवस्थित जोखिम को पैदा करने और बढ़ाने की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार होते हैं।
नेपाल का यह दावा कि वह उन पर्यावरणीय जोखिमों की अनुपातिक रूप से कहीं अधिक कीमत चुका रहा है जिन्हें उसने पैदा नहीं किया, सीधे तौर पर पर्यावरणीय सामाजिक जवाबदेही और जलवायु दायित्व सिद्धांतों के अनुरूप है।
नेपाल जैसे विकासशील देशों का वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में बेहद कम योगदान है। इसके बावजूद उन्हें तेजी से पिघलते स्थायी हिम-क्षेत्रों और अस्थिर होते ग्लेशियरों के विनाशकारी परिणामों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में यदि कमजोर देशों से यह अपेक्षा की जाए कि वे बुनियादी ढांचे के विनाश को महज प्राकृतिक आपदा मानकर चुपचाप सह लें, तो इसका अर्थ होगा कि बड़े उत्सर्जक देश औद्योगिक विकास के लाभ अपने पास रखें, जबकि उससे होने वाली पर्यावरणीय और सामाजिक क्षति का बोझ पूरी दुनिया पर डाल दें।
त्रिशूली नदी घाटी में आई आपदा कोई अबूझ ईश्वरीय कृत्य नहीं थी। तेजी से बढ़ते तापमान ने हिमालय के ऊंचाई वाले ग्लेशियरों को थामे रखने वाली बर्फीली संरचना को कमजोर कर दिया है। दूसरी ओर, नदी तल में विकास गतिविधियों और नदी के आसपास बड़े पैमाने पर खड़े किए गए घने बुनियादी ढांचे ने निचले इलाकों में तबाही को और बढ़ा दिया। जब किसी जोखिम की संभावना पहले से समझी जा सकती हो, तब उसे केवल प्राकृतिक आपदा कहकर जिम्मेदारी से बचने की कोशिश कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं रह जाती।
दशकों से विकासशील देशों में आपदाओं के बाद पुनर्निर्माण का सहारा स्वैच्छिक अंतरराष्ट्रीय राहत पैकेज रहे हैं। लेकिन इन भुगतानों को केवल मदद के रूप में प्रस्तुत करना वास्तविक समस्या को नजरअंदाज करना है। नेपाल की मांग राहत की इस अवधारणा को बदलकर उसे ऐसे नुकसान की क्षतिपूर्ति के रूप में देखने की मांग करती है, जो खतरनाक और व्यवस्थित मानवीय गतिविधियों के कारण पैदा हुआ है। इस अर्थ में नेपाल की मांग पूर्ण दायित्व के सिद्धांत को राष्ट्रीय सीमाओं से आगे ले जाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
सरकारों और बड़े स्तर पर जोखिम पैदा करने वाले संस्थानों को जलवायु तथा विकास संबंधी निर्णयों के लिए जवाबदेह बनाना यह नहीं है कि उन्हें प्राकृतिक मौसम-चक्रों से होने वाली हर क्षति के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया जाए। इसका अर्थ अपरिहार्य प्राकृतिक घटना और मानवीय गतिविधियों से बढ़ी हुई आपदा के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित करना है।
यदि वैश्विक नियामक ढांचे और राष्ट्रीय विकास नीतियां पारिस्थितिक सीमाओं की लगातार अनदेखी करती रहेंगी, तो उनके साथ जवाबदेही भी जुड़नी चाहिए। इसलिए नेपाल द्वारा दान या मदद के बजाय संरचनात्मक क्षतिपूर्ति की मांग एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकती है। यह हमारे लिए सबक है चाहे मामला किसी स्थानीय निकाय के स्तर का हो या वैश्विक स्तर का, टिकाऊ विकास की वास्तविक बुनियाद जवाबदेही ही हो सकती है।