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कुंडली कब तक

शासन राजतंत्र में भी चलता था। शासन लोकतंत्र में भी चलता है। बड़ा अंतर यह है कि राजतंत्र में शासन निरंकुश होता है। राजा मनमानी पर उतर जाए तो उसे रोकने वाला कोई नहीं होता। प्रजा त्राहिमाम करके रह जाती है।
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Aug 19, 2016
Gurusharan Chhabra

शासन राजतंत्र में भी चलता था। शासन लोकतंत्र में भी चलता है। बड़ा अंतर यह है कि राजतंत्र में शासन निरंकुश होता है। राजा मनमानी पर उतर जाए तो उसे रोकने वाला कोई नहीं होता। प्रजा त्राहिमाम करके रह जाती है। लोकतंत्र में सरकार की मनमानी रोकने के लिए कई तरह के अंकुश होते हैं। स्वतंत्र न्यायपालिका, स्वतंत्र पत्रकारिता से लेकर लोकायुक्त और सूचना का अधिकार तक। जितने मजबूत ये अंकुश, उतना सुदृढ़ लोकतंत्र।

राजस्थान के साथ अजीब विडंबना है। लोकतंत्र को मजबूत करने वाले पंचायत राज से लेकर सूचना के अधिकार तक जैसे कदमों की पहल में प्रदेश सबसे आगे रहता आया है। पर धीरे-धीरे निष्क्रिय राजनेता और भ्रष्ट नौकरशाहों का गठजोड़ रंग दिखाने लगता है। लोकायुक्त और सूचना के अधिकार जैसे कानूनों तक को शो-पीस बना दिया जाता है। लोकायुक्त कानून बने 43 साल हो गए। पर, इसे आज तक नख-दंतविहीन बनाकर रखा गया है। रिपोर्ट और अनुशंसा के अलावा यह संस्था कुछ नहीं कर पाती। अफसरों को जवाब-तलब के लिए पत्र भेजे जाते हैं तो अफसर उन्हें कूड़ेदानों के हवाले कर देते हैं।

आमतौर पर नौकरशाही में सामंतशाही प्रकृति पनप जाती है। राजस्थान में यह कुछ ज्यादा ही है। वे जनप्रतिनिधियों और मंत्रियों तक को तो भाव देते नहीं फिर अन्य संस्थाओं का अंकुश कैसे स्वीकारेंगे। वर्तमान सरकार के आने के बाद माथुर आयोग की जांच पर व कोटा में छात्रावास की जमीन पर फ्लैट निर्माण पर लोकायुक्त कार्रवाई की सिफारिशें कर चुके हैं। पर कोई कार्रवाई अब तक नहीं हुई। आखिर बड़े अफसर जो फंस रहे हैं। लोकायुक्त को मजबूत बनाने के लिए कानून में संशोधन का मसौदा भी दो साल से अफसरों की अलमारियों में धूल खा रहा है। मध्यप्रदेश में लोकायुक्त के पास पूरा पुलिस बल है। वे सीधे भ्रष्ट अफसरों पर छापे मारते हैं।

कर्नाटक में मुख्यमंत्री तक दायरे में हैं। पर राजस्थान में ऐसे सभी अधिकारों, शक्तियों पर सरकारें कुंडली मारकर बैठ जाती हैं। केन्द्र में लोकपाल संस्था को मजबूत करने की मांग को लेकर अन्ना हजारे के नेतृत्व में जब आंदोलन हुआ तो लाखों युवा जुड़ गए।

राजस्थान में मजबूत लोकायुक्त की मांग को लेकर अनशन कर रहे गुरुशरण छाबड़ा ने प्राण त्याग दिए। लेकिन इस सब का असर भी यहां नहीं हुआ। लोकायुक्त ही क्यों, सुनवाई की गारंटी, सेवाओं में प्रदायगी, विशेष न्यायालय (आय से अधिक सम्पत्ति) कानून आदि जैसे जनता को अधिकार देने वाले सभी कानून भ्रष्ट गठजोड़ का शिकार बन रहे हैं।

राजनेताओं और अफसरों को यह दिवास्वप्न नहीं देखना चाहिए कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के अधिकारों को दबाकर और कानून की पालना टाल वे लोकतंत्र में राजतंत्र कायम कर लेंगे। भारतीय लोकतंत्र ऐसे लोगों से निपटना जानता है।

Published on:
19 Aug 2016 03:22 pm