
शहरी यातायात प्रबंधन की खामियों, सडक़ों की बदहाल स्थिति, वाहनों की बढ़ती संख्या और अन्य कारणों से ट्रैफिक सिग्नल्स पर लगने वाले जाम के चलते देश में मोटे अनुमान के अनुसार करीब 34 अरब लीटर पेट्रोल-डीजल बेकार खर्च हो जाता है। मजे की बात यह है कि केवल ईंधन ही नहीं, इन हालातों के कारण देश में औसतन सालाना 100 से 125 घंटे तक का समय भी सडक़ों पर जाम की भेंट चढ़ जाता है। इस तस्वीर का एक पहलू यह भी है कि बेंगलूरु, मुंबई, कोलकाता और दिल्ली जैसे महानगरों में जाम के कारण बर्बाद होने वाला समय राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है। घर से अपने नियत गंतव्य तक पहुंचने में सालाना सर्वाधिक समय गंवाने वाले शहरों में आइटी सिटी बेंगलूरु 168 घंटे की सालाना समय-बर्बादी के साथ शीर्ष पर है। कमोबेश यही हालात देश के अन्य महानगरों के भी हैं। बड़े शहरों में प्रमुख चौराहों पर,खासकर पीक आवर्स के दौरान, एक सिग्नल पार करने के लिए तीन से चार बार लाइट का चक्र पूरा होने का इंतजार करना आम बात हो गई है। देश के अधिकांश शहरों की यातायात व्यवस्था आज लगभग ऐसी ही तस्वीर बयां कर रही है। बीसीजी की हालिया रिपोर्ट भी शहरी यातायात की इस गंभीर स्थिति की ओर इशारा करती है।
ट्रैफिक सेंस की कमी
दरअसल हमारे यहां शहरों में कुछ स्थानों को छोड़ दें तो अभी तक सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था प्रभावी नहीं हो सकी है। इसके अलावा, वाहन खरीदने की होड़ इस कदर हो गई है कि एक ही घर में एक से अधिक चौपहिया वाहन होना असामान्य नहीं रहा। एक नया ट्रेंड अब सामान्य कार की जगह एसयूवी वाहन रखना अपनी हैसियत दिखाना हो गया है। यह अच्छी बात है कि लोगों के पास चौपहियां वाहन हो, यह हमारी समृद्धि को भी दर्शाता है। लेकिन यातायत व्यवस्था और सडक़ों की हालात में सुधार भी उतना ही जरुरी हो जाता है। हमारे देश में एक और समस्या आम है- यातायात नियमों का सख्ती से पालन नहीं होता। दूसरी ओर बड़े शहरों में भी लोगों में ट्रैफिक सेंस की कमी साफ दिखाई देती है।
अकेले दिल्ली में 1.63 करोड़ वाहन पंजीकृत
सवाल यह नहीं है कि कितने ईंधन की बर्बादी हो रही है या औसतन कितना समय जाम की भेंट चढ़ रहा है। नीति नियंता आए दिन बैठकों में शहरों की यातायात व्यवस्था में सुधार पर मंथन करने के लिए जुटते हैं लेकिन कोई दूरगामी सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आ पा रहा है। कहने को तो लंदन और सिंगापुर जैसे शहरों का उदाहरण दिया जाता है जहां यातायात व्यवस्था को बेहतर माना जाता है। कहने को तो लंदन और सिंगापुर जैसे शहरों का उदाहरण दिया जाता है लेकिन इसमें व्यावहारिकता को भी देखना होगा। एक तो सडक़ों पर सडक़ों की क्षमता की तुलना में वाहन कहीं अधिक हैं। अकेले दिल्ली की बात करें तो यहां 1.63 करोड़ वाहन पंजीकृत हैं। जानकारी के अनुसार नोएडा में प्रतिवर्ष एक लाख से अधिक नए वाहनों को पंजीयन होता है। निश्चित रूप से वाहनों की खरीद को लोगों के आर्थिक हालात अच्छे होने का संकेत माना जा सकता है।
स्थायी समाधान नहीं, केवल तात्कालिक उपाय
नई गाड़ी खरीदते समय उसकी पार्किंग के लिए स्थान होने की बात की जाती है, पर यह व्यवस्था कागजी ही मिलेगी। बड़े शहरों की गलियों में मकान के बाहर वाहन पार्क होते हुए आसानी से देखे जा सकते हैं। साथ ही, मल्टीस्टोरी के चलते एक ही स्थान पर अनेक फ्लैट होने से वाहन भी अधिक ही होते हैं। सवाल यह है कि जब यह मल्टीस्टोरी व्यस्ततम स्थानों पर बनती हैं तो उससे समस्या और अधिक गंभीर हो जाती है। इसी तरह से सार्वजनिक परिवहन के उपयोग और वाहनों को साझा करने की बात हवा-हवाई ही रह जाती है। एक तो सडक़ों पर वाहनों की अत्यधिक रेलमपेल और दूसरी ओर यातायात के अत्यधिक दबाव व इंजीनियरिंग दोष या फिर एक बरसात में ही सडक़ों में गड्ढे हो जाना आम है और इसमें समय रहते सुधार नहीं हो पाता है। इसके अलावा, व्यस्ततम चौराहों पर जाम का स्थायी समाधान नहीं खोजकर तात्कालिक उपाय खोजे जाते हैं और इससे हालात सुधर नहीं पाते।
ट्रैफिक सेंस करना होगा विकसित
लंदन, सैन फ्रांसिस्को में पीक टाइम में कंजेशन प्राइसिंग जैसे उपाय किए गए हैं। यही कारण है कि अतिरिक्त टैक्स देकर पीक टाइम में उस रास्ते से बहुत जरूरी होने पर ही कोई जाना चाहेगा। वाहनों के सिग्नल्स पर खड़े रहने के कारण समय, ईंधन और धन की हानि तो होती है, इसके अलावा अच्छा-खासा आदमी तनाव में आ जाता है और केवल हॉर्न बजाने या साइड नहीं दे पाने या जरा सी टच हो जाने पर रोडरेज की घटनाएं आम होती जा रही हैं।
हालांकि समस्या दिन-प्रतिदिन गंभीर होती जा रही है और केवल एक शहर में ऐसा हो रहा हो, ऐसा भी नहीं है। ऐसे में दीर्घकालीन समाधान खोजा जाना जरूरी हो जाता है। शहरीकरण से जिस तरह से गांव सिमटते जा रहे हैं, उसके स्थान पर शहरों के आसपास उपनगर विकसित किए जाएं और उपनगरों में बेहतर नागरिक सुविधाओं के साथ ही बेहतरीन सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था सुनिश्चित की जाती है तो इससे कुछ हद तक राहत मिल सकती है। साथ ही, सडक़ों के रखरखाव पर खास ध्यान देना होगा और एक सेल ऐसा हो, जो सडक़ों को तत्काल दुरुस्त करता रहे। इसी तरह से पीक टाइम में वैकल्पिक रास्तों को भी विकसित किया जाए, ताकि यातायात का दबाव कम किया जा सके। इस सबके साथ ही लोगों में ट्रैफिक सेंस विकसित करना ही होगा व इससे भी ज्यादा जरूरी यातायात नियमों की सख्ती से पालना सुनिश्चित करना होगा। सरकारी संस्थाओं के साथ ही गैरसरकारी संस्थाओं को भी इसके लिए आगे आना होगा और प्रबुद्ध नागरिकों को भी समस्या के समाधान में भागीदारी निभानी होगी। नहीं तो साफ है, ईंधन, समय, धन की बर्बादी के साथ ही प्रदूषण और तनाव मिलेगा ही मिलेगा।