ओपिनियन

एकतरफा दोस्ती

सवा साल पहले जब दिल्ली स्थित पाक उच्चायुक्त ने अलगाववादियों से बात की तब मोदी सरकार ने इसी मुद्दे पर विदेश सचिव स्तरीय बातचीत रद्द कर दी थी।

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Jul 14, 2015
भारत कितना भी दोस्ताना व्यवहार करे, पाकिस्तान हर बार और बार-बार यह सिद्ध करने की कोशिश करता है कि उसे भारत और भारत की दोस्ताना माहौल की पहल से कोई लेना-देना नहीं है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज का ताजा बयान इसका जीता-जागता प्रमाण है।

इस बयान में अजीज ने साफ-साफ कहा है कि 26/11 हमले के मास्टरमाइंड जकीउर रहमान लखवी के खिलाफ उसे और सबूत चाहिए। यानी भारत ने इन हमलों में उसके शामिल होने के अब तक जो सबूत दिए हैं, पाकिस्तान की सरकार उन्हें पर्याप्त नहीं मानती। इससे भी आगे अजीज ने यह भी दो टूक कह दिया है कि जब तक बातचीत के एजेंडे में कश्मीर का मुद्दा शामिल नहीं होगा, पाकिस्तान भारत से कोई द्विपक्षीय बातचीत नहीं करेगा।

चार दिन पहले ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहल पर हुई बातचीत इस अंजाम पर पहुंचेगी, यह सवाल शायद हमारे विदेश विभाग के कर्ता-धर्ताओं ने भी नहीं सोचा होगा। क्या आज उन्हें नहीं लगता कि मोदी की शरीफ से बात करा उन्होंने गलती की। जहां तक सवाल भारत की आम जनता का है, वह तो पूरी तरह आश्वस्त है कि पाकिस्तान के शासक, फिर चाहे वह जिन्ना हों या कैप्टेन अयूब और जुल्फिकार अली भुट्टो हों या जनरल मुशर्रफ कोई भारत का सगा नहीं है।

भारत ही नहीं उनमें से कोई पाकिस्तान और वहां की जनता का भी सगा नहीं है। वे तो केवल और केवल अपनी कुर्सी के सगे हैं। उसे पाने और बनाए रखने के लिए भारत के साथ सम्बंधों को वे हमेशा हथियार की तरह काम लेते हैं। वहां की जनता की भावनाओं से खेलते हैं। यहां महत्वपूर्ण सवाल यह है कि हमारी सरकार और हमारे शासक भारतीय जनमानस की भावनाओं को क्यों नहीं समझते हैं? वे उससे क्यों खेलते हैं?

सवा साल पहले जब दिल्ली स्थित पाक उच्चायुक्त ने अलगाववादियों से बात की तब मोदी सरकार ने, इसी मुद्दे पर विदेश सचिव स्तरीय बातचीत रद्द कर दी थी। उस समय सरकार के इस फैसले की खूब वाह-वाही हुई। जनता को लगा कि अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे लेकिन साल भर में ही हालात यूं बदल जाएंगे, किसी ने नहीं सोचा। पाकिस्तान नहीं बदला। हम फिर बदल गए।

पहले जैसे ही हो गए। कभी क्रिकेट मैच की बधाई, कभी रमजान की बधाई। फिर बातचीत की पहल। यदि पाकिस्तान ने नहीं सुधरने की कसम खा ली है तो हमें तो कम से कम सुधर जाना चाहिए। आखिर कब तक हम दोस्ती के इस जहर को पीते रहेंगे? कभी ना कभी तो हम भी अपनी तीसरी आंख खोलने की सोचें।
Published on:
14 Jul 2015 05:12 am
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